आदिवासी योद्धा वीर शहीद थिथिर उरांव लागुड़ नगेसिया..

आजादी से पहले भी आदिवासियों के साथ ऊँची जातियों द्वारा अत्याचार भेदभाव शोषण होता था. इनसे बेगारी कराई जाती थी.

        आज भी सरकार कोई भी हो आदिवासियों को कानी नजर से ही देखा जाता है. आदिवासियों के लिए कागजी योजनायें तो बहुत होती हैं. मगर जमीनी हकीकत कुछ और ही होती है.

       नक्सली आंदोलन सलवा जुडूम हो या नक्सल उन्मूलन के नाम पर चलाये जा रहे मिशन हों.

आदिवासी इसी में पिसता, झुलसता रहा है. नक्सली बताकर मार डाले वाले लोगों में यही आदिवासी होते हैं. कितने ही ऐसे बेगुनाह आदिवासी जेल की सलाखों के पीछे हैं.

    अट्ठारहवीं उन्नीसवीं सदियों के दौरान भी आदिवासी भयंकर शोषण अत्याचार और भेदभाव झेलता रहा है.इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में जनजातीय समूहों ने बदलते कानूनों,पाबंदियों नये करों,ब्याविचारियों,महाजनों, सवर्णों द्वारा किए जा रहे अत्याचार और शोषणों के खिलाफ कई बार बगावत की.1831-32 में कोल आदिवासियों ने और 1857 में संथालों ने बगावत कर दी थी.मध्य भारत में बस्तर विद्रोह 1910 में हुआ.बिरसा मुण्डा जिस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. वह इसी प्रकार का आंदोलन था.

     थिथिर उराँव,लागुड़ नगेसिया का नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा.

टाना आंदोलन से प्रभावित ये आदिवासी योद्धा सवर्णों द्वारा आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए पारंपरिक हथियारों से अत्याचारियों का एक एक करके संहार और हत्या करने लगे.उनके मित्र बिगुड बनिया भी साथ आया.अत्याचारी महाजन व्यापारी इनकी तिकड़ी से थरथर कांपते थे.

बलरामपुर जिले के कुसमी ब्लॉक अंतर्गत ग्राम राजेंद्रपुर निवासी लागुड़ नगेसिया घरजमाई के रूप में पुंदाग गांव में रहते थे। ब्रिटिशकाल में झारखंड के आंदोलनकारी टाना भगत के शहीद होने के बाद उक्त आंदोलन से जुड़े। उनके साथ बिगुड़ और जमीरापाठ के कटाईपारा निवासी थिथिर उरांव अंग्रेजों से लोहा लेने लगे।

       तीनों ने क्षेत्र में अंग्रेजों का साथ देने वालों को भी मार डाला था।

 इसके बाद ब्रिटिश हुकुमत ने थिथिर उरांव को वर्ष 1912-13 में मार डाला और लागुड़-बिगुड़ को पकड़कर ले गए।

इसके बाद अंग्रेजों ने दोनों को खौलते तेल में डालकर मार डाला। लागुड़ का कंकाल तब के एडवर्ड स्कूल जिसे वर्तमान में मल्टीपरपज स्कूल अंबिकापुर के नाम से जाना जाता है वहां विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए रखवा दिया गया।Published from Blogger Prime Android App

            यह दुर्भाग्य ही है कि 109 साल तक इन वीर योद्धाओं के कंकाल परिजनों को नहीं सौंपा गया था. अब जाकर अंतिम संस्कार हो पाया है.Published from Blogger Prime Android App

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