तमसो मा ज्योतिर्गमय...

#तमसो_मा_ज्योतिर्गमय ●●●

प्रकाश आपके मन की एक छोटी सी घटना है। प्रकाश शाश्वत नहीं है, यह सदा से एक सीमित संभावना है क्योंकि यह घट कर समाप्त हो जाती है। हम जानते हैं कि इस ग्रह पर सूर्य प्रकाश का सबसे बड़ा स्त्रोत है। यहाँ तक कि आप हाथ से इसके प्रकाश को रोक कर भी, अंधेरे की परछाईं बना सकते हैं। परंतु अंधकार सर्वव्यापी है, यह हर जगह उपस्थित है। आध्यात्म में सदा अंधकार को एक शैतान के रूप में चित्रित किया है। पर जब आप दिव्य शक्ति को सर्वव्यापी कहते हैं, तो आप स्पष्ट रूप से इसे अंधकार कह रहे होते हैं, क्योंकि सिर्फ अंधकार सर्वव्यापी है!!!!

             यह हर ओर है। इसे किसी के भी सहारे की आवश्यकता नहीं है। प्रकाश सदा किसी ऐसे स्त्रोत से आता है, जो स्वयं को जला रहा हो। इसका एक आरंभ व अंत होता है। यह सदा सीमित स्त्रोत से आता है। अंधकार का कोई स्त्रोत नहीं है। यह अपने-आप में एक स्त्रोत है। यह सर्वत्र उपस्थित है। तो जब हम शिव कहते हैं, तब हमारा संकेत अस्तित्व की उस असीम रिक्तता की ओर होता है। इसी रिक्तता की गोद में सारा सृजन घटता है। रिक्तता की इसी गोद को हम शिव कहते हैं। भारतीय संस्कृति में, सारी प्राचीन प्रार्थनाएँ केवल आपको बचाने या आपकी बेहतरी के संदर्भ में नहीं थीं। सारी प्राचीन प्रार्थनाएँ कहती हैं, “हे ईश्वर, मुझे नष्ट कर दो ताकि मैं आपके समान हो जाऊँ।“ तो जब हम शिवरात्रि कहते हैं जो कि माह का सबसे अंधकारपूर्ण दिन है, तो यह एक ऐसा अवसर होता है कि व्यक्ति अपनी सीमितता को विसर्जित कर के, सृजन के उस असीम स्त्रोत का अनुभव करे, जो प्रत्येक मनुष्य में बीज रूप में उपस्थित है।

     【आप भ्रमित ना हों यह संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए लागू नहीं होता केवल हमारी आकाशगंगा के लिए है. जहाँ सृष्टि से पहले शून्य और अंधेरा था.】

           वहीं दूसरी तरफ लोग अंधेरे में टटोलते हुए #ज्योति की ओर जाने के लिए प्रार्थनाएं भी दोहराते रहे.. #तमसो_मा_ज्योतिर्गमय...

सत्य की खोज में #असतो_मा_सदगमय और इसी छटपटाहट में मृत्यु से भी बचने के लिए #मृत्योर्मा_अमृतं_गमय की रट लगाते रहे.

ऐसा नहीं है कि इन प्रार्थनाओं का जवाब नहीं मिला.

     जवाब मिला भी.#जगत_की_ज्योति_मैं_हूँ।।

सच्ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आनेवाली थी।

यूहन्ना 1:9

   ऐसी ज्योति जो कभी बुझती नहीं.जो लोग अंधकार में बैठे थे उन्होंने बड़ी ज्योति देखी; और जो मृत्यु के क्षेत्र और छाया में बैठे थे, उन पर ज्योति चमकी।”

मत्ती 4:16कि वह अन्यजातियों को सत्य प्रकट करने के लिए एक ज्योति होगा

लूका 2:32

      इस ज्योति के नजदीक उसके प्रभाव में रहने वाला हमेशा ज्योतिर्मय होता है.

इसलिए कहा भी गया..

तुम जगत की ज्योति हो। जो नगर पहाड़ पर बसा हुआ है वह छिप नहीं सकता। और लोग दीया जलाकर पैमाने के नीचे नहीं परन्तु दीवट पर रखते हैं, तब उससे घर के सब लोगों को प्रकाश पहुँचता है। उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के सामने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में हैं, बड़ाई करें।

मत्ती 5:14-16

यह हमारे परमेश्वर की उसी बड़ी करुणा से होगा; जिसके कारण ऊपर से हम पर भोर का प्रकाश उदय होगा। कि अंधकार और मृत्यु की छाया में बैठनेवालों को ज्योति दे, और हमारे पाँवों को कुशल के मार्ग में सीधे चलाए।” (यशा. 58:8, यशा. 60:1,2, यशा. 9:2) 

लूका 1:78-79

     #अंधेरापसंद लोगों ने उसे बुझाना भी चाहा लेकिन वो ज्योति बुझने की नहीं है.आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था। सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई। उसमें जीवन था; और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था। और ज्योति अंधकार में चमकती है; और अंधकार ने उसे ग्रहण न किया।

यूहन्ना 1:1, 3-5

अंधेरे में आप किसी वस्तु को ढूंढना चाहें तो आप ढूंढ नहीं पायेंगे, आप टटोलेंगे अनुभान करेंगे...चलेंगे भी तो लड़खड़ायेंगे.

        इसलिए ज्योति लोगों की जरुरत है.ज्योति में चलने वाला ना लड़खड़ायेगा,ना गिरेगा और ना कोई परेशानी होगी.

लोग आज भी अंधेरे में उन्हें अंधेरा से उजाले में लायेगा कौन?? जरूरत ये है कि आप #ज्योति बनो उनके अंधेरे को मिटाओ.आप दीपक को खाट के नीचे नहीं दीवट पर रखो.

   वो अंधेरे में हैं इसीलिए स्रष्टा की नहीं सृष्टि की महिमा गाते हैं.लड़खड़ाते हैं और गिर जाते हैं. उन्हें संभालने की जिम्मेदारी भी आपकी है.

“तुम पृथ्वी के नमक हो; परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए, तो वह फिर किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? फिर वह किसी काम का नहीं, केवल इसके कि बाहर फेंका जाए और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाए। तुम जगत की ज्योति हो। जो नगर पहाड़ पर बसा हुआ है वह छिप नहीं सकता।Published from Blogger Prime Android App

मत्ती 5:13-14

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