कुरान मे येसु
#कुरान में #यीशु
#परिचय
यह पेज इस रूप में लिखा हुआ है कि ईसा (यीशु) के बारे में मुस्लमानों को, उन्हीं के कुरान के परिप्रेक्ष्य से जानकारी मिले| कृपया आप अपने कुरान से परामर्श लें और निष्कर्षो की पुष्टि करें|
कुरान में यीशु परमेश्वर नहीं हैं, और ना ही परमेश्वर का पुत्र या कोई मनुष्य जो क्रुश पर मरा| कुरान मे यीशु एक भविष्यवक्ता थे जिनके संदेश को यहुदीयों ने अस्वीकार किया| वो मसीहा बुलाये गये, पर इसका मतलब सिर्फ यह था कि वो परमेश्वर के संदेशवाहक थे (कुरान 4:171)| वह यीशु का सुसमाचार ले आये थे (कुरान 57:27)|
यीशु की आश्चर्यजनक उध्दरण
यीशु के जीवन का सबसे प्रमुख पहलू उसके गर्भाधान और जन्म है, कुरान के 19:16–26 में मिला है| यीशु का जन्म चमत्कारिक ढंग से हुआ था,क्योंकि यह एक आदमी के किसी हस्तक्षेप के बिना हुआ था| यीशु के जन्म का चमत्कार कुछ प्रश्नों कि ओर ले जाता है: कि यीशु केवल मनुष्य थे या केवल आत्मिक ? क्या ऐसा नहीं था कि यीशु एक इंसान ही थे क्योंकि वो आदम कि तरह बनाये गये थे| हाँ, वस्तुत: कुरान 3:59 में हम यीशु और आदम के जन्म की समानताओं के बारे में पढ़्ते हैं: परमेश्वर के सामने यीशु कि समानता में आदम; उसने (परमेश्वर ने) उसे (आदम)को मिट्टी से बनाया,और फिर कहा:हो जा और वो हो गया था|
परंतु ,कुरान सिर्फ समानताओं के बारे में ही नहीं ,बल्कि यीशु और आदम के जन्म के बीच के मतभेदों को भी बताता है:
आदम बिना किसी मानवीय पिता या माता के पैदा हुआ (कुरान 2:30;15:28;32:7)|
यीशु एक कुवाँरी से पैदा हुये (कुरान 19:20–22)|
आदम पृथ्वी के तले से बनाया गया: सिर्फ मिट्टी से, इसलिए वह सांसारिक है (कुरान 15:28; 32:7)|
यीशु परमेश्वर के शब्दों से बने, इसलिए वो स्वर्ग के हैं (कुरान 3:45)|
यीशु मरियम को परमेश्वर के एक निर्दोष बच्चे के रुप दिये गये (कुरान 19:19)|
इन तथ्यों के आधार पर, हम कह सकते हैं कि आदम और यीशु के गर्भधारण के विषय में यहाँ कुछ विचारणीय अन्तर हैं | आदम नीचे तले से बनाया गया और यीशु ऊपर बनाये गये| उनका (यीशु) अस्त्तिव कहीं ऊँचा है,क्योंकि वो (यीशु) निर्दोष थे और परमेश्वर के शब्दो से बने थे| हम परमेश्वर के शब्द (कालिमा) और धर्म पुस्तक में परमेश्वर के शब्दो में अंतर कर सकते हैं| परमेश्वर के शब्द और आत्मा अनंत हैं, क्योंकि परमेश्वर कभी भी बिना शब्द या आत्मा के नही हो सकते हैं| कुरान के अनुसार,यीशु ने धरती पर अपने जीवन में कोई गुनाह नहीं किया (कुरान 19:19), जबकि आदम ने धरती के अपने जीवन में परमेश्वर कि आज्ञा को तोड़ा (कुरान 2:36)| आदम वही लक्षण नहीं दिखाता जो यीशु,परमेश्वर के शब्द ने दिखाये|
यीशु की पहचान
फिर, कुरान के अनुसार, यीशु का व्यक्तित्व आत्मिक था| लेकिन जब यीशु परमेश्वर के शब्द के रुप में शरीर मे नहीं हैं, जैसा कि ईसाइ मानते हैं, और जब वो सिर्फ एक मृत्युकारक नहीं हैं, तब यीशु की पहचान क्या है? यदि हम इसे यहाँ पर कुरान में यीशु कि पूर्ण समीक्षा के रुप में शामिल कर सकें? पर यह ऐसा नहीं है| यहाँ कुरान मे कुछ और भी तथ्य हैं:
कुरान में यीशु को किसी भी अन्य प्रभावशाली व्यक्ति से कहीं अधिक मात्रा में महत्व मिला है|
वह एक चिन्ह है (कुरान 19:20;21:91), दया के (कुरान 19:20) और एक गवाही के (कुरान 5:117)|
कुरान में हमेशा यीशु के बारे में श्रद्धा के साथ बोला गया हैं|
कुरान मे यीशु की कोई आलोचना नहीं है|
कुरान मे यीशु परमेश्वर के एक धर्मदूत हैं, परमेश्वर के शब्द(कलिमा) और परमेश्वर की आत्मा (रुह) हैं (कुरान 4:171)|
अरब का शब्द बसहर, कुरान में मृत्युकारक को प्रस्तुत करता है, ना कि आत्मा की दुनिया को| मोहम्मद भी एक साधारण मनुष्य हैं ,जैसा कोई और भी है(कुरान 18:110;41:6)| ऐसा ही दुसरे भाविष्यद्वक्ताओं के साथ भी वैध है| तो यह आश्चर्य की बात है कि शब्द बसहर का यीशु के साथ संबन्ध न पाया जा सका| यह सबसे बड़़ा सबूत है कि यीशु सिर्फ परमेश्वर नहीं मनुष्य थे| अब हमें गम्भीरता के साथ इन प्रश्नों को देखना होगा: क्या यह सम्भव है कि यीशु वास्तविक रुप में भाविष्यद्वक्ता से कहीं अधिक थे| याद है कि कुरान में यीशु के बारे मे क्या कहा गया:
यीशु एक कुवाँरी से पैदा हुये (कुरान 19:20–22)|
यीशु निर्दोष थे (कुरान 19:19)|
यीशु बिमारों के महान चिकित्सक थे (कुरान 3:49;5:110)|
यीशु परमेश्वर के द्वारा स्वर्ग में ले लिये गये (कुरान 4:158)|
यीशु फिर वापस आयेंगे (कुरान 3:45; 43:61)|
पर यही सब कुछ नहीं है| जबकि इससे कहीं अधिक कुरान मे यीशु के बारे में है| कुरान यह स्वीकार करता है कि परमेश्वर के नौकरों के बीच मे कुछ खास अन्तर हैं| यीशु को कुरान में महत्वपूर्ण स्थान मिला है|
यीशु को साबित करने के लिए यह सब परमेश्वर के चिन्ह हैं (कुरान 2:253; 43:63) और यीशु को परमेश्वर की सहायता पवित्र आत्मा के द्वारा मिली (कुरान 2:253)| यीशु दोनो जहाँन, इस दुनिया और उस दुनिया में एक परम भव्य व्यक्तित्व के साथ हैं| सभी टिप्पणिया इस तथ्य से सहमत हैं कि यह पवित्रता और आषिश दोनो से भरा है| केवल यीशु ही निर्माण और जीवन देने के कार्य कर सकते हैं (कुरान 3:49)| किसी भी और भविष्यवक्ता ने कुरान में ऐसा कार्य नहीं किया| इसीलिए यीशु का स्थान सभी मनुष्यों के ऊपर है और उन्होने अपने आप को हर मनुष्य जाति की पहुँच से भी ऊंचा किया है| आप यीशु के बारे मे क्या सोचते हैं? क्या आप यह कह सकते हैं कि वह एक अन्य भविष्यवक्ता था?
👉आगे का अध्ययन
बहुत सारे मुस्लमान इस कल्पित गाथा पर विश्वास करते हैं कि उन्हें सिफर् कुरान, परमेश्वर की आखिरी संसकरण धर्म पुस्तक, पढ़ने की इजाज़त है| वें सोचते हैं कि बाईबिल (तौराह–मुसा के पांच पुस्तक, ज़बुरा–भजन संहिता और इंजिल–यीशु का सुसमाचार) दिलचस्प नहीं है| लेकिन यह कुरान के अनुसार नहीं है| क्यों? क्योंकि कुरान के 3:61 और 3:64 के अनुसार मुस्लमानों को बोला गया है लोगों के साथ इस पुस्तक (बाईबिल) के बारे में चर्चा करें और आमंत्रित हैं कि सत्य के रास्तों को खोजे | तबारी (जिनकी मृत्यु 923 ।क् मे हुयी थी), जो प्रसिद्व मुस्लिम विद्वानो में से एक थे| उन्होंने कुरान की बहुत सारी टिप्पणियां लिखी हैं| जैसे कुरान में 28:82| तबारी पूछतें हैं कि: अब्राहम की गलतीयां क्या थी? वो अब्राहम के तीन झूठ को जोड़ते हैं:
यह कहने के द्वारा कि मैं बिमार हु् मूर्तियों की पूजा से बचने के लिए (कुरान 37:89)| क्या यह सफेद झूठ नहीं था?
जब उसने मूर्तियों के तहस-नहस करने से इन्कार किया, क्यो़ंकि उसने कहा परमेश्वर ने ये किया है (कुरान 21:63)| एक बार फिर एक मासूम झूठ|
जब उसने कहा कि सारा उसकी पत्नी नहीं,उसकी बहन थी|
आप तीसरे नम्बर की घटना को कुरान में नहीं पायेंगे| यह बाईबिल में है, उत्पत्ति 12:11–13|
महान मुस्लिम विद्वान प्रश्नों के उत्तर देने के लिए बाईबल पढ़ते थे|
तबारी की तरह, बहुत सारे मुस्लमान बाईबिल पढ़ते हैं, क्योंकि यह पूर्ण ज्ञान देता है| क्योंकि कुरान में एक बुलावा है जाँचने और एक खुला द्वार है कि यीशु के सुसमाचार के प्रयोग एक स्रोत की तरह हो, हम यह नहीं कह सकते कि कुरान यीशु के बारे में सब कुछ सच बताने का दावा करता है, या उसके जीवन की पूरी कहानी की एक निश्चित राय देता है (कुरान 2:256)| हाँ, निसंदेह, कुरान यीशु के बारे में विश्वास के कथनों का प्रतिपादन करता है, लेकिन इससे जुडे़ मानवीय अध्ययन के उद्देश्य से करता है, नाकि अंतिम उत्तर देने के लिये | दूसरे शब्दों में: प्रत्येक मुस्लमान को चाहिए कि आपने आप को अधिक आँके यह कहने के द्वारा की वह यीशु के बारे में पूर्ण सच को जानता है| जबकि मोहम्मद को यह अधिकार था उन लोगो का मार्ग दर्शक होने का जो उसके सामने धर्म पुस्तक को प्राप्त करते थे:अगर आप (मोहम्मद) संदेह करते हैं कि हमने क्या उद्घाटित किया तो उनसे पूछिए जिन्होने आप से पहले धर्म पुस्तक को पढ़ा है (कुरान 10:94)|
यह मुस्लमानों के लिए अभिमानी होगा कि वो यह मानें कि वे यीशु के बारे में सिफर् सच ही नहीं बल्कि पूरा सच जानते हैं, और कुरान के द्वारा खुले अन्य रास्तों के अनुसरण की गवाही से इन्कार करें|
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