बाईबल माँसाहार पर क्या कहता है?माँसाहार पाप है??


माँसाहार का चलन वैदिक प्राचीन काल से ही है. वेदों में गाय घोड़े आदि को अघन्य घोषित किया गया, इसे नहीं मारने की अपील की गई है. इसका मतलब ये हुआ कि इससे पहले गाय घन्य थी.
तत्समय में अतिथियों को गोहत्यारे के नजरों से देखा जाता था.अतिथि सत्कार में गाय और बछडों की हत्या की अधिकता से दूध की कमियाँ हुई तभी से वेदों में ऐसे अपील और निर्देश हुए.
माँसाहार स्वेच्छाचार है. जोरजबरदस्ती तो है नहीं. बाईबल में माँसाहार के लिए एक कलाम है.
बाईबल में जो था सो है........ भला तो यह है, कि तू न माँस खाए, और न दाखमधु पीए, न और कुछ ऐसा करे, जिससे तेरा भाई ठोकर खाए।
रोमियों 14:21
भोजन हमें परमेश्वर के निकट नहीं पहुँचाता, यदि हम न खाएँ, तो हमारी कुछ हानि नहीं, और यदि खाएँ, तो कुछ लाभ नहीं। परन्तु चौकस रहो, ऐसा न हो, कि तुम्हारी यह स्वतंत्रता कहीं निर्बलों के लिये ठोकर का कारण हो जाए। क्योंकि यदि कोई तुझ ज्ञानी को मूरत के मन्दिर में भोजन करते देखे, और वह निर्बल जन हो, तो क्या उसके विवेक में मूरत के सामने बलि की हुई वस्तु के खाने का साहस न हो जाएगा। तो भाइयों का अपराध करने से और उनके निर्बल विवेक को चोट देने से तुम मसीह का अपराध करते हो। इस कारण यदि भोजन मेरे भाई को ठोकर खिलाएँ, तो मैं कभी किसी रीति से माँस न खाऊँगा, न हो कि मैं अपने भाई के ठोकर का कारण बनूँ।
1 कुरिन्थियों 8:8-10, 12-13
ईसाईयत न कभी मांसाहार को गलत बताती है ना इसे पाप बताती है,बल्कि एक स्पष्ट बात कहती है""इसलिए जो सब कुछ खाता है उसे, उस व्यक्‍ति को नीचा नहीं समझना चाहिए जो सब कुछ नहीं खाता है; उसे दूसरे व्यक्‍ति की बुराई नहीं करनी चाहिए जो सब कुछ खाता है, क्योंकि परमेश्‍वर ने उसे भी स्वीकार किया है। अच्छा यह है, कि न मांस खाया जाए और न शराब पी जाए या ऐसी और कोई वस्तु जिसके सेवन से तुम्हारे भाई-बहन को ठोकर लगे, वह नाराज़ हो जाए या कमज़ोर बने।
रोमियों 14:3, 21
भोजन को लेकर हिन्दू सनातन मत बहुत स्पष्ट रहा है। आपको जिस प्रकार के कार्य करने की आवश्यकता है वैसा ही भोजन आप खाएं। आप एक क्षत्रिय हैं, आपको युद्ध लड़ने हैं तो आप एक प्रकार का भोजन खाएं, आप एक विद्यार्थी हैं तो दूसरे प्रकार का भोजन खाएं, अगर आप एक योगी होना चाहते हैं तो एक अन्य प्रकार का भोजन आपको उचित पड़ेगा।
क्षत्रिय वैदिक काल से ही मांसाहार करते आये हैं. ब्राह्मण भोजन(शाकाहार)सभी पर थोपना जायज नहीं है.श्रीराम जी क्षत्रिय वर्ण से रहे तो क्या उन्होंने मांसाहार नहीं किया होगा?
देश काल और परिस्थियां भोजन के प्रकार तय करते हैं.ईश्वरीय ज्ञान वेद पाने वाला कुत्तों की अंतड़ियां खाकर वेद कहता रहा...
ऐसे में ऐसा खाओ ऐसा ना खाओ कहकर पाप पुण्य धर्म अधर्म बताने वाले लोगों को स्वविवेक पर छोड़े तो बेहतर है.
मांसाहार पाप नहीं है. हाँ अतिसंवेदनशील लोग इसे पाप बताने का धर्म निभाते रहें।

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