कर्ण कुंती पुत्र ही था.
ऋषि दुर्वासा पूरे एक वर्ष के लिए राजकुमारी कुंती के पिता के महल में अतिथि के रूप में ठहरे.कुंती ने एक वर्ष तक उनकी खूब सेवा की.राजकुमारी की सेवा से ऋषि दुर्वासा प्रसन्न हो गए और उन्होंने कुंती को वरदान दिया कि वो किसी भी देवता को बुलाकर उनसे संतान की प्राप्ती कर सकती हैं.
इसी वरदान को परखने के लिए कुंती ने सूर्य देवता को बुलाया और गर्भवती हुई.कर्ण को जन्म दिया और लोकलाज के भय से नदी में प्रवाहित किया.
दयापंथी सवाल खड़े करते हैं. पाण्डु को क्यों नहीं बताया फिर???
कुंती ने जिस लोकलाज से बच्चे का विसर्जन किया था.उसी लोकलाज की वजह से पाण्डु को नहीं बताया.
अंत में माता कुंती ने युद्धिष्ठिर से कहा उसे(कर्ण को)भी जलांजलि दे दो.वह तुम्हारा जेठा भाई है.
माँ की ममता झूठी नहीं हो सकती.
एक माँ अपने मरे हुए बच्चे के लिए झूठ नहीं बोल सकती.

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