महर्षि का अनर्थ कामशास्त्र..
#महा_ऋषि_का_अनर्थ_कामशास्त्र●●●
मुखम्ँ सद्स्य शिर ऽ इत् सतेन जिह्वा पवित्रम् अश्विनासन्त् सरस्वती । चप्यं न पायुर् भिषग् अस्य वालो वस्तिर् न शेपो हरसा तरस्वी ॥ ~यजुर्वेद {१९/८८}
दयानंद इसका अर्थ अपने यजुर्वेदभाष्य में यह लिखते हैं कि—“हे मनुष्यो! जैसे जिससे रस ग्रहण किया जाता है वह वाणी के समान स्त्री, इस पति के सुन्दर अवयवों से विभक्त शिर के साथ शिर करें तथा मुख के समीप पवित्र मुख करें इसी प्रकार गृहाश्रम के व्यवहार में व्याप्त स्त्री पुरूष दोनों ही वर्तें तथा जो इस रोग से रक्षक वैद्य और बालक के समान वास करने का हेतु पुरूष उपस्थेन्द्रिय (लिंग) को बल से करनेहारा होता है वह शान्ति करने के समान वर्तमान मे सन्तानोत्पत्ति का हेतु होवे उस सबको यथावत करे”
लेकिन बाद में स्वामी जी ने सोचा होगा कि उनके नियोगी चैलें उनके इस अर्थ को समझ न सकेंगे इसलिए अपने शिष्यों के वास्ते अर्थ को थोड़ा और आसान बनाने के लिए स्वामी जी भावार्थ में यह लिखते हैं कि--
स्त्री पुरूष गर्भाधान के समय मे परस्पर मिलकर प्रेम से पूरित होकर मुख के साथ मुख, आँख के साथ आँख, मन के साथ मन, शरीर के साथ शरीर का अनुसंधान करके गर्भ का धारण करें जिससे कुरूप और विकलांग सन्तान न होवे,
लेकिन स्वामी जी की अश्लील बुद्धि यही न रूकि, दयानंद अपने इसी कामशास्त्र का विस्तार से वर्णन करते हुए सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में अपने लाडले शिष्यों के लिए फरमाते है कि--
“जब वीर्य का गर्भाशय में गिरने का समय हो उस समय स्त्री और पुरुष दोनों स्थिर और नासिका के सामने नासिका, नेत्र के सामने नेत्र अर्थात् सूधा शरीर और अत्यन्त प्रसन्नचित्त रहैं, डिगें नहीं। पुरुष अपने शरीर को ढीला छोड़े और स्त्री वीर्य्यप्राप्ति समय अपान वायु को ऊपर खींचे, योनि को ऊपर संकोच कर वीर्य्य का ऊपर आकर्षण करके गर्भाशय में स्थित करे, पश्चात् दोनों शुद्ध जल से स्नान करें”
समीक्षक-- वाह रे! इस कामशास्त्र के बनाने वाले, क्या कहना तेरा? दयानंद के इस भाष्य को पढ़कर यह कह पाना मुश्किल है कि दयानंद वेदभाष्य लिख रहा था या फिर कोई अंतर्वावसना, या फिर दयानंद ने ईश्वरीय ज्ञान को इतना तुच्छ और अश्लील समझ रखा है जैसा इस भांड के भाष्यों से प्रकट हो रहा है,
जहाँ तक गर्भाधान विधि का प्रश्न है, यह तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, इसे तो न केवल अनपढ़, गवार मनुष्य जानता है, बल्कि पशु-पक्षी भी जानते है, पशु-पक्षियों को कौन से ‘शास्त्रों का ज्ञान होता हैं? उन्हें भला कौन यह सब सिखाता हैं? इस कारण दयानंद का किया यह अर्थ अशुद्ध है वेदों में ऐसी बातें कही नहीं है, यह शिक्षा करने को तो मनुष्य निर्मित साधारण पुस्तक ही काफी है इसलिए इस वेद श्रुति का यह अर्थ नहीं है, किन्तु इसका अर्थ यह है कि—“इन्द्रदेव के इस विराट शरीर में मुख और मस्तक सत्य से पवित्र है मुख में स्थित जिह्वा सत्य वाणी और सत्य स्वाद से पवित्र है, दोनों अश्वनीकुमारों और देवी सरस्वती के द्वारा इन अंगों के संचालन से पवित्रता व्याप्त हुई, चप्य पायु इन्द्रिय हुई, और बाल शारीरिक दोषों को बाहर निकालने वाले भिषक् (उपचारकर्ता रूप) हुए, और वस्ति तथा विर्य से जननेंद्रिय हुई। इस श्रुति में तो शरीर के विभिन्न अंगों की सृष्टि किस-किस प्रकार हुई यह कथन किया है और इससे पूर्व और बाद के मंत्रों में भी यही कथन किया है”
यह इसका अर्थ है जबकि दयानंद का किया अर्थ इससे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखता, ने जाने स्वामी कामानंद ने यह कपोल कल्पित अश्लील अर्थ किन पदों से निकाला है, इस वेद श्रुति में ऐसा कोई पद नहीं जिससे स्वामी कामानंद जी का लिखा कल्पित अर्थ सिद्ध होता हो, दयानंद ने इस प्रकार का अश्लील अर्थ लिखने से पूर्व एक बार भी यह न सोचा कि विद्वान लोग जब इसे देखेंगे तो उनके बारे में क्या सोचेंगे, भला ईश्वरीय ज्ञान भी इतना तुच्छ हो सकता है क्या? क्या यही वेद विद्या है क्या यही वेदों का सार है? दयानंद ने इन वेद ऋचाओं के अर्थ का जो अनर्थ किया है ऐसा तो कभी किसी ने भी नहीं किया होगा,
मुझे यह समझ में नहीं आता इन समाजीयों को दयानंद द्वारा किये यह अश्लील भाष्य नजर क्यों नहीं आते, क्यों उनकी दृष्टि दयानंद के इन भाष्यों पर नहीं पडती? यह धूर्त समाजी क्यों नहीं दयानंद के इन भाष्यों का विरोध करते हैं? यह तुम्हारा दौगलापन नही तो और क्या है? जब देखों जहाँ तहाँ अश्लीलता ढूंढते फिरते हो यहाँ तुम्हें प्रत्यक्ष है तो भी तुम्हारे नेत्रों से दिखाई नहीं पडता, इन नियोगी दल्लों का दौगालपन तो यही सिद्ध हो जाता है, देखिये प्रथम तो स्वामी कामानंद जी अपने लाडले शिष्यों को गर्भाधान का उपदेश इस प्रकार करते है कि-- (स्त्री पुरूष गर्भाधान के समय मे परस्पर मिलकर प्रेम से पूरित होकर मुख के साथ मुख, आँख के साथ आँख, मन के साथ मन, शरीर के साथ शरीर का अनुसंधान करके गर्भ का धारण करें, इस प्रकार गर्भधारण करने से कुरूप और विकलांग सन्तान उत्पन्न नहीं होती,

Comments
Post a Comment