सत्य और दयानन्द
#जो_जैसा_है_उसे_ठीक_वैसा_ही_कहना_सत्य_है●●●
फिर दयानन्द और दयापंथी संदिग्धज्ञान को ही अंतिम सत्य क्यूँ प्रचारते हैं??
" जिस समय मैने यह ग्रन्थ बनाया था उस समय और उससे पूर्व संस्कॄत भाषण करने ,पठन,पाठन में संस्कॄत ही बोलने और जन्मभूमि की भाषा गुजराती होने के कारण मुझको इस भाषा का विशेष ज्ञान नही था ."
_ स्वामी दयानन्द (द्वितीय संस्करण)
यहाँ यह बात स्पष्ट है कि स्वामीजी को हिंदी का समुचित ज्ञान नही था , जिस समुचित दो भाषा का ज्ञान स्वामीजी को था उनमें गुजराती और क्षेत्रीय भाषा थी और संस्कॄत आम बोलचाल की भाषा नहीं थी.
यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि स्वामीजी ने 'सत्यार्थ प्रकाश ' से पहले हिंदू,जैन, बौद्ध , ईसाई आदि धर्मों की पुस्तकों का अध्ययन किया तो वह किस भाषा में किया ...??
यहां यह भी विचारणीय है कि किसी नई भाषा सीखने वाला व्यक्ति साहित्यिक दृष्टी से संभल कर बोलेगा और लिखेगा न कि उस भाषा की गाली गलौच और अभीष्ट शब्द सीखेगा ..!!!
किसी विद्वान और धार्मिक व्यक्ति की भाषा कभी मर्यादाहीन ,अहंकार पूर्ण और विद्वेष पूर्ण नही होती .
'सत्यार्थ प्रकाश' को पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि यह किसी ज्ञानवान और कुलीन व्यक्ति की लेखनी हो.
समुल्लासों को पढ़कर ऐसा लगता है कि यह किसी दुराग्रही,दम्भी और अल्पज्ञ व्यक्ति की करतूत हो .
उत्तरार्ध्द के समुल्लासों से जाहिर है कथित #महर्षि दयानन्द अल्पज्ञ और संदिग्धज्ञानधारी थे.
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