वेदों में विज्ञान प्रौद्योगिकी कहाँ है??
#वेद_और_विज्ञान ◆◆◆
अक्सर ऐसे भी दावे सुनने को मिलते हैं कि वैदिक काल के दीर्घात्मा ऋषि यह जानते थे कि सूर्य की ऊर्जा का स्रोत ताप नाभिकीय अभिक्रिया है। जयंत विष्णु नार्लीकर अपने एक आलेख में लिखते हैं कि अगर हम इस वर्णन को स्वीकार कर भी लें, तो भी इससे यह पता नहीं चलता कि सूर्य की आंतरिक संरचना कैसी है, किस प्रकार से यह संतुलन में रहता है या किस प्रकार इसकी ऊर्जा इसके केंद्र से सतह तक आती है आदि। इन सारी बातों को जानने के लिए वर्तमान में हम गुरुत्वाकर्षण, विद्युत् और चुम्बकत्व और द्रवस्थैतिकी का सहारा लेते हैं। क्या वेदों में इसका विवरण मिलता है? संक्षिप्त उत्तर है- नहीं।
एक बार डॉ. साहा ढाका गए, तो वहां के एक वकील ने उनकी खोज (तापीय आयनीकरण) के बारे में उनसे जानकारी चाही। साहा उन्हें विस्तार से तारों की संरचना और अपनी नई खोज के बारे में समझाते चले गए। मगर वकील महाशय बीच-बीच में टिप्पणी करते रहे कि, “लेकिन इसमें तो कुछ नया नहीं है, यह सब तो हमारे वेदों में है।”
अंत में साहा ने उनसे पूछा : बताइए कि वेदों में ठीक-ठीक कहाँ पर तारों के आयनीकरण के बारे में लिखा है?
“मैंने स्वयं वेद नहीं पढ़े हैं, किन्तु मुझे पूरा विश्वास है कि जिसे आप नए वैज्ञानिक आविष्कार बताते हैं वे सभी वेदों में विद्यमान हैं।” वकील का जवाब था।

डॉ. साहा ने आगे कई सालों तक वेदों, उपनिषदों, पुराणों और रामायण-महाभारत का अध्ययन किया। उनकी आलोचना करने वालों को उनका उत्तर था: क्यों वह (आलोचक) नहीं जानता कि बौद्ध और जैन धर्मों के उदय के साथ भारतीय संस्कृति के सबसे गौरवशाली युग का आरंभ हुआ था, और दोनों ने ही वेदों को भ्रांतियों का पिटारा कहकर पूर्णतया अस्वीकृत कर दिया था।? क्या वह यह नहीं जानता की लोकायत मत के अनुसार, ‘तीनों वेदों के रचयिता भंड, धूर्त और निशाचर थे’ (त्रयो वेदस्य कर्तारो भण्डधूर्तनिशाचरा:) इन सारी बातों का अर्थ यह है कि ईसा के कुछ समय पहले देश में बुद्धिवादियों का ऐसा एक वर्ग मौजूद था जिसने अनुभव किया था कि वेदों के मन्त्रों का वास्तविक अर्थ जानना अत्यंत कठिन है; केवल कुछ ढोंगी लोग ही वेदों को प्रमाण मानकर गलत विचारों का प्रचार करते हैं। इसलिए वेदों में खोजना करीब-करीब नब्बे प्रतिशत गलत है
P.K.
Continue
Comments
Post a Comment