क्या वेदों में विज्यान है??
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि अधिक दिनों तक पराधीन पिछड़े रहने वाले राष्ट्रों में अपने अतीत काल को लेके ऐसी गौरवमय भावना बैठ जाती है जो सिवाय भ्रम के कुछ नहीं होती ।गौरवमय इतिहास की कल्पना पराधीन राष्ट्र के लोगो को जीने में उत्साह भरता है इससे पराधीन होने की हीनता कम होती है , और देखा जाये गलत भी नहीं।परन्तु यदि राष्ट्र आजाद हो जाता है उसके बाद भी उसी प्रकार की काल्पनिक इतिहास के गुण गाते रहना निश्चित ही उस समाज की मनोदशा पर प्रश्नचिन्न लगा देता है
जब भारत पर इस्लामिक आक्रमणकारी आये तो वे अपने साथ आधुनिक अविष्कार नहीं लाये ,या लाये भी तो नाम मात्र का जैसे की बारूद का प्रयोग ।चुकी ये भारतीय समाज के सभी वर्गों के उपयोग में नहीं था इसलिए इस पर समाज का ज्यादा ध्यान नहीं गया ।चुकी अधिकतर मामलो में भारतीय ज्ञान अरबी ज्ञान से अधिक ही था तो इस्लामिक सत्ता के दौरान पराधीन रह के भी इतनी हीनता का अहसास नहीं हुआ ।
परन्तु जब अंग्रेज भारत आये तो अपने साथ उच्च तकनीक लेके आये , उच्च शिक्षा लेके आये , उच्च अविष्कार लेके आये ।उनकी पराधीनता के दौरान भारतीयो को अहसास हुआ की जिस तथाकथित ज्ञान के बल पर अब तक इस्लामिक सत्ता के पराधीन रह के भी इज्जत बची हुई थी वह ज्ञान वास्तव में कितना न्यून है ।
ऐसे ऐसे आधुनिक अविष्कार जो भारतीयो ने न तो कभी देखे और न ही सुने थे , रेडियो, घड़ी, मोटरकार , हवाई जहाज , टीवी ,आधुनिक हथियार, विज्ञानं के नए फार्मूले , यंहा तक की माचिस और कपडे तक ।बड़ा आस्चर्य हुआ ये सब देख के , आस्चर्य से भरे अविष्कार ।ये तथाकथित विश्वगुरु सोच से परे , अब हीनता बहुत गहरी हो गई ।परन्तु किया क्या जाए ?
तब इस हीनता से उबरने के लिए प्रचारित किया जाने लगा की वेदों में हमने अंग्रेजो से पहले ही हवाई जहाज बना लिया था , महाभारत में ऐसे ऐसे हथियार चले थे की वैसे अंग्रेजो के पास भी नहीं हैं ।
ग्रन्थो में परमाणु खोजा जाने लगा और यह बताया जाने लगा की हमने एटम बम्ब पहले ही बना लिया था, वायरलेस भारत में वैदिक काल में आम था ।
जो भी अंग्रेजो की खोजे हैं वे वेद पुराणों को पढ़ के ही हैं ,उन्हीने हमारे ग्रन्थो को चुरा के और उन्हें पढ़ के ये सब अविष्कार किया !!
बेशक हजारो सालो से वेद पुराण की पोथियाँ रोज रटी जाती थी पर कभी उन्हें पढ़ के एक आलपिन तक नहीं बना सके , अंग्रेज आये और संस्कृत सीख के सब कुछ बना लिया इन पोथियों को पढ़ के ... भारतीयो द्वारा हजारो साल से परमाणु का रट्टा मारने के बाद भी वेदों पुराणों से कभी वह बाहर नहीं आया ।वेदों में हवाई जहाज उड़ाते रहें पर असल में बैलगाड़ी पर चलते रहें , वो तो भला हो अंग्रेजो का जिन्होंने वेद पढ़ के हवाई जहाज का फर्मूला पता कर लिया । वेद पुराण में देवता गण आकाश से उदघोष करते पर उन्हें पढ़ के कोई भी पंडा टेलीफोन तक न जान सका , अंग्रेजो ने पढ़ा और वायरलेस बना डाला !
चलिए अब थोडा नजर डालते हैं की पोथियों में क्या था जिन्हें लेके तथाकथित 'विश्व गुरु ' ये दावा करता था की हमारे ग्रन्थो में अंग्रेजो से पहले ही सब कुछ था ।एक झलक देखते हैं की कितनी वैज्ञानिकता थी जिससे पढ़ के अंग्रेजो ने आधुनिक अविष्कार कर लिए और हम अब तक उनपर गर्व करते हैं की ' जो ग्रन्थो में नहीं वह कंही नहीं '
- 1- पंचविश ब्राह्मण के 16/8/6 में कहा गया है की पृथ्वी से स्वर्ग और सूर्य की दुरी उतनी है जितनी एक हजार गौओं को एक दूसरे पर खड़ा होने पर ऊंचाई बनती है ।
तो ऐसे नापते थे सूर्य और स्वर्ग की दुरी जिसे अंग्रेजो ने पढ़ा और अमल में लाया ।
- 2- महाभारत द्रोण पर्व अध्याय 146 में कृष्ण कहते हैं-योगमत्र विद्यास्मि सुर्यस्यावरण प्रति.....सिंधुराट
अर्थात मैं योग माया से सूर्य को ढक लूंगा इससे केवल जयद्रथ को ही सूर्य छिपा लगेगा ।
किसी भी योग शक्ति में इतनी ताकत नहीं है की वह सूर्य को ढँक ले , फिर यदि किसी स्मोक से ढका भी जायेगा तो वह सभी को ढका दिखेगा न की केवल एक को ।
- 3-यजुर्वेद अध्याय 33 के मन्त्र 43 में कहा गया है की सूर्य रथ पर चढ़ कर आते हैं ।
"आ कृष्णेन...........पश्यन्"
- 4-भास्कराचार्य ने तो पृथ्वी को गतिशील होने की बात को माने से साफ़ इंकार कर देते है और उसे 'अचला' घोषित कर देते हैं । देखें सिद्धांतशिरोमणि , गोलाध्याय 5
- 5-वराह मिहिर कहते हैं की पृथ्वी नहीं घूमती बल्कि सूर्य घूमता है ।
देखें- पञ्चसिद्धान्तिका अध्याय 13
- 6- नक्षत्रवादी अर्थात खगोल विज्ञानिको के बारे में क्या राय थी जरा यह भी पढ़िए ।
" नक्षत्रैयर्सच् ........ विवज्रयेत् ( मनुसमृति अध्याय 3 श्लोक 162 -167
अर्थात- नक्षत्रजीवी लोग निंदित , पंक्ति को दूषित करने वाले और अधम हैं ।
यादि हमारी पोथियाँ भरी थी विज्ञानं के फार्मूलों से और सभी कुछ हमने पहले ही बना लिया था तो यह बात अंग्रेजो के आने के बाद ही क्यों हमें पता चली? अंग्रेजो द्वारा आधुनिक अविष्कारों के बाद ही हमें क्यों ध्यान आया ही ये सब हमारी पोथियों में पहले से मौजूद था ?
दरसल ये हीनता को कम करने का मात्र तरीका भर था /है.....इसरो प्रमुख भी इससे अछूते नही जो कह रहे हैं वेदों में विज्ञान था ।:- संजय कुमार
वेदों में जितना भी विज्ञान है उसमें से ज्यादातर एजेंडाबाज अनुवादकों का खेला गया खेल है.
क्योंकि वेदों में सारी दुनिया का विज्ञान भरा पड़ा है ये एजेंडा पहले ही बना दिया गया है तो अंट -शंट अनुवाद करने में कोई दिक्कत नहीं होती.
वेदों में जबरन विज्ञान खोजने वाले अनुवादकों की एक और महिमा देखिए.
अनुवादक को जबरन ये बताना था कि वेदों में पानी का सूत्र लिखा हुआ है तो उसने कलाकारी की.
अनुवाद करने वाले ने मित्र का अर्थ
ऑक्सीजन बता दिया और वरूण का अर्थ हाइड्रोजन बता दिया है.
वरुण का अर्थ हाइड्रोजन कब से हुआ??
किस संस्कृत भाषा की पुरानी डिक्शनरी में वरुण का अर्थ हाइड्रोजन लिखा है?
हाइड्रोजन की अलग से एक तत्व के रूप में खोज ही 1766 में कैवेंडिस ने की उसके बाद ही हाइड्रोजन को गुब्बारे आदि में भरा जाना शुरू किया गया.
लेकिन क्योंकि ये बताना है कि वेद में पानी का फार्मूला लिखा है वहीं से अंग्रेज उसे चुराकर ले गये तो अनुवाद करते वक्त वरुण का अर्थ हाइड्रोजन कर दिया.और मित्र का अर्थ आक्सीजन कर दिया.
अगर पानी में हाइड्रोजन की जगह सोडियम होता तो वरुण का अर्थ सोडियम कर देते करने में क्या था, अपने मन से अनुवाद ही तो करना था.
19 सदी के कई ऐसे एजेंडाबाज अनुवादकों की वजह से ही वेदों में विज्ञान का शोर जोर पकड़ रहा है.
लोग पांच सौ साल पुराने अनुवाद को तो पढ़ने जाएंगे नहीं और इधर के डेढ़ सौ साल का अनुवाद विज्ञान सम्मत कर दिया तो काम हो गया.
एक षडयंत्र के तौर पर वेदों में विज्ञान को जबरदस्ती ऐसे ही ढूंढा जा रहा है
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