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Showing posts from April, 2022

जन्मना जायते शूद्र:

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Hari Maurya  आजकल कुछ लोग ब्राह्मणों को उपदेश देते है और कर्मणा कर्मणा चिल्लाते है ये पोस्ट उन्हीं के लिए है जिन्हें न तो शास्त्र का ज्ञान है न ही प्रमाण मालूम है समस्त प्रमाण इसीलिए यहां पर डाल दिये गए है जो ब्राह्मण द्रोही और वर्णसंकरता का समर्थक होगा वही शास्त्र प्रमाण कदापि नही मानेगा । वर्ण और जाति अलग अलग नहीं हैं। जैसे आपका शरीर समाज का हिस्सा है, और आपके आंख, कान आदि शरीर के अंग। उसमें भी कोशिका, पुतली, रोम आदि अंगों के भी उपांग हैं। वैसे ही सनातन समाज का हिस्सा वर्ण है और फिर उन वर्णों के अंग तदनुरूप जातियां हैं और जातियों में भी उपजातियां हैं। जैसे घर में अलग अलग कमरे, और कमरों में भी अलग अलग अलमारियों की व्यवस्था है और उनमें भी अलग अलह सांचे बने हैं, वैसे ही समाज रूपी घर में वर्णरूपी कमरे और जातिरूपी अलमारियों की सांचे रूपी उपजातियां हैं। वर्ण समष्टि है और जाति व्यष्टि। कुछ लोग जाति शब्द को संस्कृत का न मानकर यवनों के ‘अल-जात’ शब्द से उसका सम्बन्ध जोड़ देते हैं, उनके भ्रम का निराकरण भी यहीं हो जाएगा। ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह । (श्रीमद्भागवत महापुराण)...

ईसाई धर्म अपनाने वालों के हितों की रक्षा के लिए ब्रिटिश अंग्रेजों ईस्ट इंडिया कंपनी ने क्या किया??

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कुछ खास नहीं... ईसाई मिशनरियों का आधुनिक भारत पर बहुत गहरा प्रभाव है। भारत के सुदूर दक्षिणी भागों में बहुत पहले से ही सीरियाई ईसाइयों की भारी संख्या में उपस्थिति इस बात की द्योतक है कि इस देश में सबसे पहले आने वाले ईसाई मिशनरी यूरोप के नहीं, सीरिया के थे। राजा गोंडोफ़ारस (लगभग 28 से 48 ई.) से संत टामस का सम्बन्ध यह संकेत करता है कि ईसाई धर्म प्रचारकों का एक मिशन सम्भवत: प्रथम ईसवी के दौरान भारत आया था। सन् 1813 ई. में ईसाई पादरियों पर से रोक हटा ली गई और कुछ ही वर्षों के अन्दर इंग्लैण्ड, जर्मनी और अमेरिका से आने वाले विभिन्न ईसाई मिशन भारत में स्थापित हो गए और उन्होंने भारतीयों में ईसाई धर्म का प्रचार शुरू कर दिया। ये ईसाई मिशन अपने को बहुत अर्से तक विशुद्ध धर्मप्रचार तक ही सीमित न रख सके। उन्होंने शैक्षणिक और लोकोपकारी कार्यों में भी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी और भारत के बड़े-बड़े नगरों में कॉलेजों की स्थापना की और उनका संचालन किया। इस मामले में एक स्काटिश प्रेसबिटेरियन मिशनरी अलेक्जेंडर डफ़ अग्रणी था। उसने 1830 ई. में कलकत्ता में जनरल असेम्बलीज इंस्ट्रीट्यूशन की स्थापना की और उसके बाद ...

ईसाई गरीबों अनपढों के पास ही क्यों जाते हैं?

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ईसाईयत है क्या??       आप यह जानते भी नहीं और कुड़कुड़ाये फिरते हो. ईसाईयत गरीबों,जरुरतमंदों, असहायों की मदद का नाम है.          अनपढ़ों जाहिलों तक शिक्षा पहुँचाने का नाम है. ईसाईयत बीमारों अनाथों की सेवा का नाम है. इसीलिए ईसाईयत गरीबों अनपढ़ों, जरुरतमंदों, बीमारों,अनाथों निसहायों तक ज्यादा पहुँचता है. आप क्यों नहीं जाते गरीबों की बस्ती में?? जायेंगे भी क्यों??        गरीबी बीमारी को पिछले जन्म का पाप दण्ड जो समझते हो!! गरीबों की बस्ती में जाकर ईसाईयत उन्हें जब गले से लगाये तो आपको अपनी अमीरी खतरे में नजर आती है.!!😉       आप अनपढ़ों के पास शिक्षा की ज्योति लेकर क्यों नहीं जाते?? ईसाईसाईयत यदि अनपढ़ों को मुफ्त शिक्षा दे तो आपको डर लगता है कि आपकी विद्वता की पोल ना खुल जाये!!!😎       गरीब अनपढ़ बीमारों की गंदी झुग्गियों में कभी झांकने गए नहीं और ईसाईयत वहाँ अपना धर्म निभाये तो आपके धर्म खतरे में चले जाते हैं.!!🙄🙄    ...

अंजीर के पेड़ को क्यों श्राप दिया?

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Rajkumar Kumar जी ये आपकी जिज्ञासा है या दुराग्रह??        अगर जिज्ञासा है तो आपने शायद बाईबल पढ़ी हो तो पूरे अध्याय को पढ़ा होगा?? ध्यान दें ईसा अंजीर के पेड़ के पास बगैर फल के मौसम में गए और फल की आशा रखी.अब आप कहेंगे ईसा इतने बेवकूफ थे कि बिना मौसम के फल चाह रहे थे!??            ईसा दृष्टांत में अपनी बात कहते थे. यही उनकी शैली थी.बाईबल में नौ फल बताये गए हैं. ,प्रेम,आनंद शांति, धीरज कृपा भलाई...विश्वास नम्रता और संयम... इंसानों में ये फल लगने चाहिए.      बाईबल में दृष्टांत है जो पेड़ फल नहीं लाते वे काट डाले जायेंगे.... यह विषय विस्तृत है. संक्षेप में इस वाकये से यह समझा जाता है कि ईसा लोगों के निष्फल होने पर क्रोधित हुए.. पेड़ो में सिर्फ हरियाली थी और पेड़ निष्फल थे.     नौ फल जो ऊपर बताया गया है वह हर इंसान में हर मौसम में लगे यही ईसा चाहते थे. इस अध्याय का सार यही है.             आप सत्यार्थप्रकाश की बेतुके अर्द्ध सत्य मिथक को पढ़कर ऐसे दुराग्रह करते हैं. आप स्वध्याय करें तो जवाब मिल ...

ईसा ने कहा "पूरा हुआ.."क्या पूरा हुआ?/

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#पूरा_हुआ●●● ईसा के विरोधी ईसा की दाढ़ी नोचकर खुश हो रहे थे उन्हें जलील कर मुंह पर थूक रहे थे. तमाचे जड़कर खिल्लियां कर रहे थे.  बदन की मांस नोचने वाले कोड़े बरसा रहे थे.  इस बीच परमेश्वर की महान योजना पूरी हो रही थी.  वे इस बात से खुश हो रहे थे कि अब ईसा की कहानी हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो रही है.  अब ईसा के मरने के साथ ही ईसा की तालीमें नेस्तनाबूद हो जायेंगी.  ईसा असहनीय पीड़ाओं से गुजर रहे थे और परमेश्वर की योजना शनै:शनैः चर्मोत्सर्ग पर थी. गिनती पर लोग परमेश्वर से कुड़कुड़ाने लगे थे,उनपर जहरीले सांपों का कहर बरपा. मूसा ने पीतल का सर्प बनाकर ऊंचे पर लटकाया कि जो भी उस सर्प को आंख उठाकर देखे,मृत्यु से बच जाये.. गिनती 21:9 []सो मूसा ने पीतल को एक सांप बनवाकर खम्भे पर लटकाया; तब सांप के डसे हुओं में से जिस जिसने उस पीतल के सांप को देखा वह जीवित बच गया।.परमेश्वर ने इस घटना को प्रतीक ठहराया था. ठीक वैसा ही ईसा को ऊंचे पर चढ़ाया जाना सुनिश्चित था.ईश विरोधी ईसा को सूली पर लटकाते हुए खुश हो रहे थे कि ईसा अब मर जायेगा.  लेकिन ईसा ने इन्हें भी सूली पर से माफ किया और "पूर...

जागते रहो..

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#जागते_रहो●●● *जीसस को सोये हुए लोगों ने इसलिए सूली पर लटका दिया क्योंकि जीजस उनकी नींद में खलल थे. जीजस का कसूर इतना था कि वो जागे हुए थे और सोये हुओं को जगाते थे.*            *जीवन बीत जाता है और आनंद की झलक भी नहीं मिलती। आदम जात को होश में नहीं कहा जा सकता है.वह अलसाया है* *दुख,चिंता,पीड़ा,चिंता,उदासी,ईर्ष्या द्वेश और पागलपन से जूझ रहा.*         *लोगों अपने पागलपन का नींद में होने पता इसलिए नहीं चलता क्योंकि उनके चारों तरफ भी उन्हीं के जैसे ही सोए हुए लोग हैं। और कभी अगर एकाध जागा हुआ इंसान पैदा होता है, तो सोए हुए लोगों को इतना क्रोध आता है कि लोग बहुत जल्द ही उस इंसान की हत्या कर देते हैं। लोग ज्यादा देर तक उसे बर्दाश्त नहीं करते। सोए हुए लोगों को जाग्रित देखकर सोये हुए लोग परेशान होते हैं.जागने वालों की मौजूदगी सोये हुओं की नींद में बाधा डालती है।इसीलिए सोनेवाले अंधेरा पसंद लोग हत्या की षड्यंत्र रचते हैं.लोग आज भी जगाने वालों से चिढ़ते हैं.नींदी लोग जागे हुए आदमियों के साथ वही व्यवहार करते हैं, जो पागलों की बस्ती में उस आदमी के साथ...

कुरान मे येसु

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#कुरान में #यीशु #परिचय यह पेज इस रूप में लिखा हुआ है कि ईसा (यीशु) के बारे में मुस्लमानों को, उन्हीं के कुरान के परिप्रेक्ष्य से जानकारी मिले| कृपया आप अपने कुरान से परामर्श लें और निष्कर्षो की पुष्टि करें| कुरान में यीशु परमेश्वर नहीं हैं, और ना ही परमेश्वर का पुत्र या कोई मनुष्य जो क्रुश पर मरा| कुरान मे यीशु एक भविष्यवक्ता थे जिनके संदेश को यहुदीयों ने अस्वीकार किया| वो मसीहा बुलाये गये, पर इसका मतलब सिर्फ यह था कि वो परमेश्वर के संदेशवाहक थे (कुरान 4:171)| वह यीशु का सुसमाचार ले आये थे (कुरान 57:27)| यीशु की आश्चर्यजनक उध्‍दरण यीशु के जीवन का सबसे प्रमुख पहलू उसके गर्भाधान और जन्म है, कुरान के 19:16–26 में मिला है| यीशु का जन्म चमत्कारिक ढंग से हुआ था,क्योंकि यह एक आदमी के किसी हस्तक्षेप के बिना हुआ था| यीशु के जन्म का चमत्कार कुछ प्रश्नों कि ओर ले जाता है: कि यीशु केवल मनुष्य थे या केवल आत्मिक ? क्या ऐसा नहीं था कि यीशु एक इंसान ही थे क्योंकि वो आदम कि तरह बनाये गये थे| हाँ, वस्तुत: कुरान 3:59 में हम यीशु और आदम के जन्म की समानताओं के बारे में पढ़्ते हैं: परमेश्वर के सामने यीशु क...

अंधेरे सूरज से परेशान है

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#मैं_मृत्यु_सिखाता_हूँ. जीवन क्या है, मनुष्य इसे भी नहीं जानता है। और जीवन को ही हम ना जान सके, तो मृत्यु को जानने की तो कोई संभावना शेष नहीं रहती। जीवन ही अपरिचित और अज्ञात हो, तो मृत्यु परिचित और ज्ञात नहीं हो सकती है। सच तो यह है कि चूंकि हमें जीवन का पता नहीं, इसलिए ही मृत्यु घटित प्रतीत होती है। जो जीवन को जानते हैं, उनके लिए मृत्यु एक असंभव शब्द है, जो न कभी घटा, न घटता है, न घट सकता है। जगत में कुछ शब्द बिल्कुल ही झूठे हैं, उन शब्दों में कुछ भी सत्य नहीं है। उन्हीं शब्दों में मृत्यु भी एक शब्द है, जो नितंत असत्य है। मृत्यु जैसी घटना कहीं भी नहीं घटती। लेकिन हम लोगों को तो रोज मरते देखते हैं, चारों तरफ रोज मृत्यु घटती हुई मालूम होती है। गांव गांव में मरघट हैं। और ठीक से हम समझे तो ज्ञात होगा कि जहां-जहां हम खड़े हैं, वहां वहां ना मालूम कितने मनुष्यों की अर्थी जल चुकी है। जहां हम निवास बनाए हुए हैं, वे भूमि के साथ स्थल मरघट रह चुके हैं। करोड़ों करोड़ों लोग मरे हैं, रोज मर रहे हैं, और अगर मैं यह कहूं कि मृत्यु जैसा झूठा शब्द नहीं है मनुष्य की भाषा मैं, तो आश्चर्य होगा। एक फकीर था त...

सारे ईसाई अवैध संतान हैं..

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#ईसाईयों_का_परमेश्वर_भाई_बहन_के_बीच_अनैतिक_संबंध_करवाया!! सारे ईसाई अवैध संतान हैं.. #दयापंथी बंधुओं दुराग्रह नहीं चलेगा. यमी भी तड़प तड़पकर कह रही है हे मेरे भाई आओ मुझे बाहों में कस लो.जैसे लता पेड़ों से चिपटती है. तुम आओ मुझमें प्रवेश करो.मेरे लिए संतान उत्पन्न करो. हमारे पूर्वज अमृत पुत्र देवता आदि भी ऐसा ही करते थे. तुम शरमाओ मत आओ लिपटो... यमी भी बाईबल की बातों की तस्दीक कर रही है. इससे साबित हुआ के सारे मानव जाति के आदि माँ बाप एक ही हैं. हजारों युवा नर नारी धरती के गर्भ से निकले यह अवधारणा ध्वस्त हुई.      सहोदर संबंध तब परिस्थितियों वश जायज थे.अतः अनैतिकता जैसे सवाल ही बेकार हैं. मानव जनसंख्या बढ़ने के बाद नजदीकी रिश्तेदारों से वैवाहिक संबंध नहीं करने की आज्ञा हुई. यह तो बाईबल और वेद दोनों से स्पष्ट है जाहिर है. यम ने यमी के झाँसे में ना आकर आज्ञा पालन किया.बाईबल भी यही कहता है. नजदीकी रिश्तेदारों से वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं होने चाहिए. “तुम में से कोई अपनी किसी निकट कुटुम्बिनी का तन उघाड़ने को उसके पास न जाए। मैं यहोवा हूँ। अपनी माता का तन, जो तुम्हारे पिता का तन ...