जन्मना जायते शूद्र:
Hari Maurya आजकल कुछ लोग ब्राह्मणों को उपदेश देते है और कर्मणा कर्मणा चिल्लाते है ये पोस्ट उन्हीं के लिए है जिन्हें न तो शास्त्र का ज्ञान है न ही प्रमाण मालूम है समस्त प्रमाण इसीलिए यहां पर डाल दिये गए है जो ब्राह्मण द्रोही और वर्णसंकरता का समर्थक होगा वही शास्त्र प्रमाण कदापि नही मानेगा । वर्ण और जाति अलग अलग नहीं हैं। जैसे आपका शरीर समाज का हिस्सा है, और आपके आंख, कान आदि शरीर के अंग। उसमें भी कोशिका, पुतली, रोम आदि अंगों के भी उपांग हैं। वैसे ही सनातन समाज का हिस्सा वर्ण है और फिर उन वर्णों के अंग तदनुरूप जातियां हैं और जातियों में भी उपजातियां हैं। जैसे घर में अलग अलग कमरे, और कमरों में भी अलग अलग अलमारियों की व्यवस्था है और उनमें भी अलग अलह सांचे बने हैं, वैसे ही समाज रूपी घर में वर्णरूपी कमरे और जातिरूपी अलमारियों की सांचे रूपी उपजातियां हैं। वर्ण समष्टि है और जाति व्यष्टि। कुछ लोग जाति शब्द को संस्कृत का न मानकर यवनों के ‘अल-जात’ शब्द से उसका सम्बन्ध जोड़ देते हैं, उनके भ्रम का निराकरण भी यहीं हो जाएगा। ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह । (श्रीमद्भागवत महापुराण)...