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Showing posts from August, 2022

मैं यीशु पर विश्वास नहीं करता, क्या मैं दोषी हूँ?

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मेरे अजीज आर्य बंधु Shashank Sharma जी द्वारा पूछा गया सवाल.         "#मैं_यीशु_पर_विश्वास_नहीं_करता_क्या_मैं_दोषी_हूँ?               क्योंकि बाईबल कहती है जो यीशु पर विश्वास नहीं करता वह दोषी ठहराया जा चुका है....            शशांक भाई यदि यह आपकी जिज्ञासा है तो हमारा उत्तर यह है.  शशांक जी आपके सवालों का जवाब अगले आयत में ही है. आप यीशू में विश्वास क्यों नहीं करते??      यीशु ने कहा है बीमारों को वैद्य की जरूरत नहीं होती. यदि आप बीमार नहीं तो वैद्य की जरूरत नहीं है.    यीशु ने यह भी कहा है मैं धर्मियों को नहीं विधर्मियों, पापियों को राह दिखाने आया हूँ.     यदि आप पाप रहित हैं,  यदि आप निष्पाप,निष्कलंक हैं तो यीशु की कोई जरूरत आपको नहीं हैं.      दोषी वह है जो अंधेरे में रहकर रोशनी को ठुकराता है, दोषी वो है जो अधर्म नहीं छोड़ता. दोषी वो है जो विधर्मी है.दोषी वह ठहराया जायेगा जो गुनाहों से तौबा नहीं करता.       आप तो नेक हैं, जन्म से लेकर आजतक आपने कोई पाप नहीं किया है, आप अधर्म नहीं करते, आप धर्म के राही हैं, आप अपने पड़ोसी को अपने समान प्रेम करते हैं, आप अपने बैरियों से भी मुहब्बत ...

https://www.hmoob.in/wiki/Genealogy_of_Jesus

https://www.hmoob.in/wiki/Genealogy_of_Jesus

यीशु दाऊद की संतान कैसे??

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            भविष्यवाणी के अनुसार मसीहा दाऊद के घराने से होगा.यीशु का परिवार ऐतिहासिक रूप से दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ था: सभी स्पष्ट प्रारंभिक ईसाई स्रोत इसकी पुष्टि करते हैं (रोम 1:3); हेगेसिपस एक फिलीस्तीनी परंपरा की रिपोर्ट करता है जिसमें रोमन अधिकारियों ने दाऊद के वंश के लिए यीशु के भाई के पोते से पूछताछ की (यूसेब। एचई 3.20); जूलियस अफ्रीकनस ने दाऊद के वंश का दावा करने वाले यीशु के रिश्तेदारों को प्रमाणित किया (लेटर टू अरिस्टाइड्स); और, शायद अधिक महत्वपूर्ण रूप से, गैर-ईसाई यहूदी नीतिशास्त्रियों ने कभी भी इसका खंडन करने की कोशिश करने की जहमत नहीं उठाई (यिर्मयाह 1969: 291)। वही लेखक जो यीशु के कुँवारी जन्म के बारे में स्पष्ट रूप से बोलते हैं, ठीक वैसे ही उसके दाऊद के पुत्र होने के बारे में स्पष्ट रूप से बोलते हैं (मत्ती 1:1, 17-25; 9:27, 21:9, आदि)। उन्हें यहां कोई विरोधाभास नहीं मिला। उसकी माँ के पति - यीशु के गर्भ धारण करने से पहले उनकी जासूसी की गई थी - और वह व्यक्ति जो सभी मामलों में शाब्दिक जन्म के बाहर उसके सांसारिक पिता के रूप में कार्य करता था, दाऊद के पास वापस जाकर सिंहासन...

कर्ण कुंती पुत्र ही था.

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ऋषि दुर्वासा पूरे एक वर्ष के लिए राजकुमारी कुंती के पिता के महल में अतिथि के रूप में ठहरे.कुंती ने एक वर्ष तक उनकी खूब सेवा की.राजकुमारी की सेवा से ऋषि दुर्वासा प्रसन्न हो गए और उन्होंने कुंती को वरदान दिया कि वो किसी भी देवता को बुलाकर उनसे संतान की प्राप्ती कर सकती हैं.        इसी वरदान को परखने के लिए कुंती ने सूर्य देवता को बुलाया और गर्भवती हुई.कर्ण को जन्म दिया और लोकलाज के भय से नदी में प्रवाहित किया.            दयापंथी सवाल खड़े करते हैं. पाण्डु को क्यों नहीं बताया फिर???         कुंती ने जिस लोकलाज से बच्चे का विसर्जन किया था.उसी लोकलाज की वजह से पाण्डु को नहीं बताया.     अंत में माता कुंती ने युद्धिष्ठिर से कहा उसे(कर्ण को)भी जलांजलि दे दो.वह तुम्हारा जेठा भाई है. माँ की ममता झूठी नहीं हो सकती. एक माँ अपने मरे हुए बच्चे के लिए झूठ नहीं बोल सकती. #कर्ण_कौन्तेय_था.

कर्ण सूतपुत्र नहीं कौन्तेय था.

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#कर्ण_सूतपुत्र_नहीं_कौन्तेय_था. महाभारत युद्ध के दसवें दिन पितामह भीष्म अर्जुन की बाण वर्षा (शिखंडी की ओट से) से घायल होकर शरशय्या पर लेटे हुये होते हैं, तब कौरव और पांडव पक्ष के सभी लोग उनके पास आए। उनके चले जाने के उपरांत कर्ण पितामह को एकांत में देखकर उनसे मिलने जाता है। पितामह को इस अवस्था में देख कर्ण सभी बैर भुलाकर भावुक हो जाता है, जिससे उस समय कर्ण की आखों में आंसू छलक आये होते हैं और अश्रुगद्गदगण्ठ होकर उसने पितामह को निद्रावस्था के समान बंद आँखों को देखकर पुकारा - पितामह भीष्म! ‘भीष्म! भीष्म! महाबाहो! कुरुश्रेष्ठ! मैं वही राधापुत्र कर्ण हूं, जो सदा आपकी आंखों में गड़ा रहता था और जिसे आप सर्वत्र द्वेषदृष्टि से देखते थे।’ मैं आपसे मिलने आया हूँ। पितामह ने आंखे खोलकर कर्ण को देखा और सहर्ष उसके हाथ को स्पर्श कर बोले, तुम राधेय नहीं हो, तुम्हारे पिता अधिरथ नहीं हैं, ना तुम राधेय हो। तुम कुंती के पुत्र कौन्तेय हो। यह बात कर्ण भी पहले से जानता था कि वो सूतपुत्र नहीं है, किन्तु वह यह नहीं जानता था कि यह बात पितामह भी जानते हैं। जब उसे इस बात का पता चला तो वो आश्चर्यचकित होकर पितामह स...

माँसाहार और सनातन धर्म

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ईसाईयत न कभी मांसाहार को गलत बताती है ना इसे पाप बताती है,बल्कि एक स्पष्ट बात कहती है""इसलिए जो सब कुछ खाता है उसे, उस व्यक्‍ति को नीचा नहीं समझना चाहिए जो सब कुछ नहीं खाता है; उसे दूसरे व्यक्‍ति की बुराई नहीं करनी चाहिए जो सब कुछ खाता है, क्योंकि परमेश्‍वर ने उसे भी स्वीकार किया है। अच्छा यह है, कि न मांस खाया जाए और न शराब पी जाए या ऐसी और कोई वस्तु जिसके सेवन से तुम्हारे भाई-बहन को ठोकर लगे, वह नाराज़ हो जाए या कमज़ोर बने। रोमियों 14:3, 21     भोजन को लेकर हिन्दू सनातन मत बहुत स्पष्ट रहा है। आपको जिस प्रकार के कार्य करने की आवश्यकता है वैसा ही भोजन आप खाएं। आप एक क्षत्रिय हैं, आपको युद्ध लड़ने हैं तो आप एक प्रकार का भोजन खाएं, आप एक विद्यार्थी हैं तो दूसरे प्रकार का भोजन खाएं, अगर आप एक योगी होना चाहते हैं तो एक अन्य प्रकार का भोजन आपको उचित पड़ेगा।       क्षत्रिय वैदिक काल से ही मांसाहार करते आये हैं. ब्राह्मण भोजन(शाकाहार)सभी पर थोपना जायज नहीं है.श्रीराम जी क्षत्रिय वर्ण से रहे तो क्या उन्होंने मांसाहार नहीं किया होगा?     देश काल और परिस्थियां भोजन के प्रकार तय करते हैं....

ईसाईयों का परमेश्वर क्रोध करनेवाला मनोविकारी है.

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ईसाइयों के ईश्वर क्रोध करनेवाले हैं!!! यह तो मनोविकार है..              गुनाह के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता उसकी विशिष्ट हस्ती है; परमेश्वर का क्रोध उसका विशिष्ट स्वभाव है; परमेश्वर का प्रताप उसकी विशिष्ट हस्ती है। परमेश्वर के क्रोध के पीछे का सिद्धान्त उस पहचान और हैसियत को दर्शाता जिसे सिर्फ उसने धारण किया है।        ईश्वर के धर्मी स्वभाव के प्रदर्शन का एक पहलू है, फिर भी परमेश्वर का क्रोध अपने लक्ष्य के प्रति विवेकशून्य या सिद्धान्तविहीन बिलकुल भी नहीं है। इसके विपरीत, परमेश्वर क्रोध करने में बिलकुल भी उतावला नहीं है, न ही वह अपने क्रोध और प्रताप को जल्दबाजी में प्रकट करता है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर का क्रोध विशेष रूप से नियन्त्रित और और नपा-तुला होता है.          परमेश्वर का स्वभाव उसकी स्वयं की अंतर्निहित हस्ती है,जो अद्वितीय है. यह समय के गुज़रने के साथ बिलकुल भी नहीं बदलता है, उसका अंतर्निहित स्वभाव उसकी स्वाभाविक हस्ती है। इसके बावजूद कि वह किसी पर अपने कार्य को क्रियान्वित करता है, क्योंकि उसकी हस्ती नहीं बदलती है, न ही उसका धर्मी स्वभाव बदलता है।

ईसाइयों के ईश्वर के पुत्र हैं तो पत्नी भी होगी ससुर ससुर भी होंगे??

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👹ईसाइयों से ये पूछना चाहिए कि ईश्वर के बेटे कौन हैं?       👿ईसाइयों के ईश्वर की पत्नी, सास,श्वसुर, साला और संबंधी कौन हैं.?      उत्पत्ति6:1-4 के संदर्भ में दुराग्रही तत्वों द्वारा अक्सर यही सवाल किये जाते हैं. बाईबल हरेक इंसान को ईश्वर की संतान बताती है.             और तुम्हारा पिता हूँगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियाँ होंगे; यह सर्वशक्तिमान प्रभु परमेश्‍वर का वचन है।” (2 शमू. 7:14, यशा. 43:6, होशे 1:10) 2 कुरिन्थियों 6:18                 देखो, पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है, कि हम परमेश्‍वर की सन्तान कहलाएँ, और हम हैं भी; इस कारण संसार हमें नहीं जानता, क्योंकि उसने उसे भी नहीं जाना। 1 यूहन्ना 3:1             बाईबल सारी मानव जाति को ईश्वर की संतान कहती है. इसका मतलब ये नहीं कि उसकी कोई बीवी है.या सैकड़ों वीवियां रही होंगी. हाँ संतानें बुरी या अच्छी हो सकती हैं. अच्छी संतानें पिता की कद्र जानती है और बुरी पिता के विरुद्ध चलती हैं.         उत्पति 6:1-4 परमेश्वर के पुत्र और मनुष्यों की पुत्रियों का उल्लेख करता है। परमेश्वर के पुत्र कौन थे? और क्यों उनकी सन्तानें जो मनुष्यों की पुत्रियों...

बाईबल माँसाहार पर क्या कहता है?माँसाहार पाप है??

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माँसाहार का चलन वैदिक प्राचीन काल से ही है. वेदों में गाय घोड़े आदि को अघन्य घोषित किया गया, इसे नहीं मारने की अपील की गई है. इसका मतलब ये हुआ कि इससे पहले गाय घन्य थी. तत्समय में अतिथियों को गोहत्यारे के नजरों से देखा जाता था.अतिथि सत्कार में गाय और बछडों की हत्या की अधिकता से दूध की कमियाँ हुई तभी से वेदों में ऐसे अपील और निर्देश हुए. माँसाहार स्वेच्छाचार है. जोरजबरदस्ती तो है नहीं. बाईबल में माँसाहार के लिए एक कलाम है. बाईबल में जो था सो है........ भला तो यह है, कि तू न माँस खाए, और न दाखमधु पीए, न और कुछ ऐसा करे, जिससे तेरा भाई ठोकर खाए। रोमियों 14:21 भोजन हमें परमेश्वर के निकट नहीं पहुँचाता, यदि हम न खाएँ, तो हमारी कुछ हानि नहीं, और यदि खाएँ, तो कुछ लाभ नहीं। परन्तु चौकस रहो, ऐसा न हो, कि तुम्हारी यह स्वतंत्रता कहीं निर्बलों के लिये ठोकर का कारण हो जाए। क्योंकि यदि कोई तुझ ज्ञानी को मूरत के मन्दिर में भोजन करते देखे, और वह निर्बल जन हो, तो क्या उसके विवेक में मूरत के सामने बलि की हुई वस्तु के खाने का साहस न हो जाएगा। तो भाइयों का अपराध करने से और उनके निर्बल विवेक को चोट देने से तु...

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उन्‍नीस सौ चालीस के दशक के आखिरी सालों में, पैलिस्टाइन में मृत सागर के पास कुछ गुफाओं में चर्मपत्रों का एक बेहतरीन संग्रह पाया गया। ये चर्मपत्र मृत सागर चर्मपत्र (डॆड सी स्क्रोल्स्‌) के नाम से मशहूर हैं। माना जाता है कि इन्हें सा.यु.पू. 200 और सा.यु. 70 के बीच किसी वक्‍त लिखा गया था। इनमें सबसे जाना-माना है, यशायाह किताब का चर्मपत्र जो टिकाऊ और मज़बूत चमड़े पर, इब्रानी भाषा में लिखा हुआ है। इस चर्मपत्र पर यशायाह की लगभग पूरी किताब लिखी है और इसके पाठ और मसोरा-हस्तलिपियों के पाठ में बहुत मामूली-सा फर्क है, जबकि मसोरा-हस्तलिपियाँ इन चर्मपत्रों के लिखे जाने के 1,000 साल बाद लिखी गयी थीं। इस तरह यह चर्मपत्र इस बात का सबूत देता है कि बाइबल का पाठ हम तक बिना किसी फेर-बदल के बिलकुल सही-सही पहुँचाया गया है। 2 यशायाह के मृत सागर चर्मपत्र के बारे में गौर करने लायक एक बात यह है कि इसके एक भाग के हाशिये पर “X” निशान लगा हुआ है जो स्पष्ट तरीके से लिखा नहीं गया। इस भाग को हम आज की बाइबल में यशायाह के 32वें अध्याय में पाते हैं। हम नहीं जानते कि नकलनवीस ने यह निशान क्यों लगाया, लेकिन हम इतना ज़रूर जान...

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14 अब, मृत सागर के पास मिले चर्मपत्रों के सबूत पर गौर कीजिए। ये चर्मपत्र प्राचीन लेख हैं, जो यीशु के ज़माने से भी पहले लिखे गए थे। en Dead Sea Scroll hi मृत सागर चर्मपत्र en Writer Barry Hoberman even said: “No archaeological discovery, not even that of the Dead Sea Scrolls, has had a more profound impact on our understanding of the Bible.”—The Atlantic Monthly. hi लेखक बैरी होबरमन ने तो इस खोज के बारे यहाँ तक कहा कि “इससे बाइबल की समझ हासिल करने में इतनी मदद मिली है जो अभी तक पुरातत्वविज्ञानियों की दूसरी खोजों, जी हाँ, मृत सागर के खर्रों से भी नहीं मिली।”—दी एट्लांटिक मंथली। en The Dead Sea Scrolls have confirmed the value of both the Septuagint and the Samaritan Pentateuch for textual comparison. hi मृत सागर के पास मिले खर्रों से यह भी साबित हो गया है कि अलग-अलग बाइबलों की तुलना करने में सेप्टूअजिंट और सामरियों के पंचग्रन्थ काफी मददगार हैं। en The Dead Sea Scrolls help us to a degree to understand the context of Jewish life during the time that Jesus preached. hi हमें मृत सागर के पास...