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Showing posts from February, 2022

सावरकर वीर या माफी वीर..??

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सावरकर के मामले में कुछ बातें मोटे तौर पर जान लेनी चाहिए। वह योद्धा नहीं था, स्वतंत्रता आंदोलन में जेल नहीं गया था बल्कि कायर था, डरपोक था, हत्यारा था, भगोड़ा था। पहली बार कर्जन वईली की हत्या में उसका नाम आया, फिर 1910 में नासिक कलेक्टर की हत्या के मामले में लंदन में उसकी गिरफ्तारी हुई। गिरफ्तारी के बाद उसे पानी के रास्ते भारत लाया जा रहा था, लेकिन वो कपड़े उतारकर जहाज़ के शौचायल पोर्ट होल के रास्ते पानी में कूद गया। कूदने के बाद वो तैरकर तट पर पहुंचा, फिर भागने लगा। कुछ ही दूर जाने के बाद उसे चोर समझ के पकड़ लिया गया, नंगा सावरकर फ्रांस में पहुंच चुका था। अब फ्रांस के संप्रभुता का मामला था, मामला बहुराष्ट्रीय हो चुका था। फिर जैसे तैसे उसे भारत लाया गया। महाराष्ट्र में पेशी हुई, दो हत्याओं के मामले में उसे दोषी पाया गया, भगोड़ा साबित हुआ। कोर्ट ने दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई, प्रशासन ने उसके अतीत को देखते हुए सुरक्षित जेल चुना। अंडमान का जेल, कोठरी नंबर 52. अब 25+25 साल जेल में बिताने थे, लेकिन वो महज 9 साल में छूट गया। 11 जुलाई 1911 को सावरकर अंडमान पहुंचा और डेढ़ महीने के भीतर, 29 ...

वैदिक काल में तिरस्कृत नारियां..

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पति की मृत्यु हो जाने पर विधवा स्त्री स्वयं भी शान के साथ जल जाया करती थी या जला दी जाती थी। अथर्ववेद में इस प्रथा का उल्लेख है। यद्यपि ऋग्वेद में इसका प्रमाण नहीं मिलता, किन्तु यह अवश्य मिलता है कि पत्नी मृत पति की चिता के पास लेट जाती थी- उदीर्व्व नार्यभि जीवलोकं गतासुपेतमुप शेष एहि। हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ।।1 कभी-कभी माता-पिता धन के लोभ में अपनी पुत्रियों का वृद्ध पुरूषों से भी विवाह कर देते थे।2 भ्रातृहीन कन्याओं की सामाजिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी। उन्हें वर प्राप्ति में कठिनाई होती थी और युवक इस भय से ऐसी कन्याओं से विवाह नहीं करते थे कि कहीं उससे उत्पन्न पुत्र को वधू का पिता न ले ले। ऋग्वेद में भ्रातृहीन कन्याओं को इधर-उधर घूमने वाली कहा गया है तथा उनकी उपमा असत्यभाषी, (अनृता) एवं पापी लागों से की गयी है।3 ऐसा भी हो सकता है कि भाई के न होने के कारण वे प्रायः दुष्ट लोगों के चंगुल में फंसकर वैश्यावृत्ति अपनाने के लिए विवश हो जाया करती हों।4 यही कारण था कि मैक्डॉनल ने यह अभिमत दिया था कि भ्रातृहीन कन्याओं को गणिकाओं की भाँति जीवन-यापन करना पड़ता था।5 वेदो...

आरक्षण

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वर्तमान सरकार Lateral entry के नाम पर धीरे धीरे आरक्षण खत्म कर रही है.. #आरक्षण ले लो..आरक्षण।।     आईये,जिन जिन को आरक्षण चाहिए,आईये और अपना अपना आरक्षण ले जाईए. आखिर तो रोटी एक ही है और उसका आकार भी वैसा ही है. इसके जितने टुकड़े आप कर सकें, कर लीजिए. हम तो कहते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय 50प्रतिशत की अपनी लक्ष्मण रेखा भी मिटा दे.फिर तो सब कुछ सबके लिए आरक्षित हो जाये....     फिर आप पायेंगे कि आरक्षण के इस जादुई चिराग को रगड़ने से भी हाथ में कुछ नहीं आया. ना जीविका ना अजीविका!!!रोटी तो एक ही है और हममें से कोई नहीं चाहता कि रोटियां कई हों और उसका आकार भी बड़ा होता रहे ताकि आरक्षण की भीख मांगने की जरूरत ना हो.सब चाहते यही हैं कि जो है उसमें से"हमारा"हिस्सा आरक्षित हो जाये....         आरक्षण की व्यवस्था पहले एक विफल समाज के पश्चाताप का प्रतीक हुआ करता था. आज यह सरकारों की विफलताओं की घोषणा करता है. हर तरफ से उठ रही आरक्षण की मांग बताती है कि देश चलाने वाली तमाम सरकारें सामान्य सवैंधानिक मर्यादाओं में बंधकर ना तो देश चला सक रही है. ना बना पा रही है. जब ह...

पुनर्जन्म और इसकी संभावनाएं..

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       पुनर्जन्म पर कई कहानियां लिखी गयी होंगी, कई फिल्में बनी होंगी और कम से कम भारत में तो यह कांसेप्ट बेहद जाना पहचाना है और इस पर ईमान लाने वाले करोड़ों मिलेंगे लेकिन क्या यह वाकई होता है? आइये इसकी संभावना को टटोलते हैं।            वैसे तो कुछ लोग इसे यूं भी मानते हैं कि इंसान चौरासी लाख योनियों में जन्म लेता है तो हो सकता है कि आज जो इंसान था वह अगले जन्म में कुत्ता हो, या जो पिछले जन्म में बंदर था वह इस जन्म में इंसान हो गया, है तो यह भी पुनर्जन्म ही लेकिन टेक्निकली इसे इंसान के ही दोबारा जन्म लेने के बारे में कहा जाता है। अब किसी इंसान ने दुबारा जन्म लिया है यह कैसे साबित हो.. पिछले जन्म की कोई स्थापित पहचान ले कर तो पैदा होता नहीं तो इस बात को प्रमाणित करने के लिये कुछ ऐसे लोगों के उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं जिन्हें पिछले जन्म के बारे में याद हो और उन्होंने उस बारे में बताया हो। अब यहीं से टेक्निकल नजरिये से बात उलझ जाती है। याद क्या है.. पहले तो इसे समझें। हम बचपन से जो भी देखते, सुनते, समझते, महसूस करते हैं वह सब हमारी दिमा...

पुनर्जन्म और आवागमन पर कन्फ्यूज दयानंद

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आम नीम का पर्यायवाची कैसे हो सकता है!!?   पुनर्विवाह, पुनर्निमाण, पुनर्जागरण वैसे ही पुनर्जन्म.चतुर्थ समुल्लास में दयानंद ने मनुस्मृति के कुछ श्लोकों द्वारा परलोक के सुख हेतु कुछ उपाय बताये हैं.यहाँ स्वामी ने परलोक और पुनर्जन्म दोनों को एक ही अर्थ में लिया है. मनुस्मृति के जो श्लोक उन्होंने उद्धृत किये हैं. वे परलोक की सफलता पर केंद्रित है न कि आवागमनीय पुनर्जन्म पर.स्वामी की धारणाओं और तथ्यों में विरोधाभास बहुत है.वेद विषयों में दयानन्द के संदिग्ध और अप्रमाणिक ज्ञान है. अंत में दयानन्द ने कह दिया. पुनर्जन्म अनुमान ही है. इसी अनुमान को सत्य मान लो...

दयानंद सत्यार्थप्रकाश और हिंदुत्व

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#महर्षि_सत्यार्थ_प्रकाश_और_हिंदुत्व सिमटते सनातन धर्म और संस्कृति को सहेजने में विक्रमादित्य जी का योगदान छोटा नहीं कहा जा सकता. आज भारत में सनातन परंपरा बच.पाई है तो विक्रमादित्य जी के कारण ही. अशोक मौर्य के बौद्ध धर्म स्वीकार कर लेने के बाद. मौर्य ने बौद्ध धर्म अपना कर 25वर्षों तक शासन किया. मौर्य शासन काल में सनातनी परंपरायें और धर्म विधान लगभग समाप्ति के कगार पर थी. रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ खो गए थे. महाराजा विक्रमादित्य ने ही पुनः खोज करवा कर स्थापित किया. भगवान विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये. सनातन संस्कृति को बचाये रखने की जद्दोजहद की.विक्रमादित्य के नौ रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम को लिखकर अपनी वैक्तिक विचारों को भी जोड़ा. अगर विक्रमादित्य नहीं होते तो सनातन संस्कृति तो क्या भगवान विष्णु, राम, कृष्ण आदि भी खो चुके होते. हिन्दू धर्म में आज जो ज्योतिष गणना होती है हिन्दी सम्वंत,वार,तिथियां, राशि, नक्षत्र, गोचर आदि भी उन्हीं को समर्पित है.           कुछ जानकर तभी से हिंदू शास्त्रों एवं ग्रंथों में मिलावट की संभावनाओं को मानते हैं....

आदिवासी योद्धा वीर शहीद थिथिर उरांव लागुड़ नगेसिया..

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आजादी से पहले भी आदिवासियों के साथ ऊँची जातियों द्वारा अत्याचार भेदभाव शोषण होता था. इनसे बेगारी कराई जाती थी.         आज भी सरकार कोई भी हो आदिवासियों को कानी नजर से ही देखा जाता है. आदिवासियों के लिए कागजी योजनायें तो बहुत होती हैं. मगर जमीनी हकीकत कुछ और ही होती है.        नक्सली आंदोलन सलवा जुडूम हो या नक्सल उन्मूलन के नाम पर चलाये जा रहे मिशन हों. आदिवासी इसी में पिसता, झुलसता रहा है. नक्सली बताकर मार डाले वाले लोगों में यही आदिवासी होते हैं. कितने ही ऐसे बेगुनाह आदिवासी जेल की सलाखों के पीछे हैं.     अट्ठारहवीं उन्नीसवीं सदियों के दौरान भी आदिवासी भयंकर शोषण अत्याचार और भेदभाव झेलता रहा है.इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में जनजातीय समूहों ने बदलते कानूनों,पाबंदियों नये करों,ब्याविचारियों,महाजनों, सवर्णों द्वारा किए जा रहे अत्याचार और शोषणों के खिलाफ कई बार बगावत की.1831-32 में कोल आदिवासियों ने और 1857 में संथालों ने बगावत कर दी थी.मध्य भारत में बस्तर विद्रोह 1910 में हुआ.बिरसा मुण्डा जिस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. वह इसी प्रकार...

गाँधीजी और स्त्रियाँ..

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गांधी और स्त्रियां ................... इस पोस्ट के साथ एक तसवीर लगी है. सोशल मीडिया पर यह तसवीर अक्सर दिख जाती है. अमूमन इस तसवीर के साथ लिखा रहता है, अय्याश गांधी. न भी हो तो पोस्ट करने वालों के भाव यही रहते हैं. वैसे पहली नजर में यह लग जाता है कि यह तसवीर गांधी की नहीं है. क्योंकि न तो गांधी इस तरह धोती पहनते थे, न उनकी मांसपेशियां इतनी उभरी हुई थीं. फिर भी, अगर यह तसवीर गांधी की ही होती, तो इसमें बुरा लगने या संकोच करने की बात नहीं थी. यह बहुत सहज और सुंदर तसवीर है, आपको भी लगेगी अगर आपके मन में महिला, प्रेम और सैक्स को लेकर कुंठा न हो. मैं गांधी जी के जीवन के आखिरी वर्ष के बारे में सिलसिलेवार तरीके से पढ़ता रहा हूं. गांधी वांग्मय में उनके रोज की गतिविधियों का ब्योरा है. फिर उनके सचिव प्यारेलाल नैयर, उनकी पोती मनुबेन गांधी और नोआखली में उनके दुभाषिया रहे निर्मल बोस की किताबें हैं. इन तमाम किताबों में उनके पल-पल का ब्योरा है. नोआखली से लेकर दिल्ली में उनकी हत्या तक कई महिलाएं उनके साथ और आसपास रहीं. इनमें मनु बेन गांधी, डॉ सुशीला नैयर, आभा गांधी, सुचेता कृपलानी, सुशील पै, अम्तुस सलाम...

विनाश का पुत्र 32

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☦विनाश का पुत्र🔯👹👿👿👿👿👹 Vol:32 *पशु का प्रकटन(महाक्लेश काल का पूर्वाद्ध)* *आईये कुछ दर्शनों को देखें..'"एक स्त्री जो सूर्य ओढ़े हुए थी,और चांद उसके पाँवों तले था.और उसके सिर पर.......**वह गर्भवती हुई और चिल्लाती थी।"*(प्र.वाक्य12)      *एक पशु समुद्र में से निकला जिसके दस सींग और सात सिर थे. उसके सिरों पर परमेश्वर की निंदा के नाम लिखे थे. यह भयानक पशु समुद्र में से निकला.प्रका.वाक्य के 17वें अध्याय में वर्णित पशु जंगल से निकला. यहाँ जंगल से आशय अधर्म, बुराई और शैतानी हरकतों से है. परमेश्वर की निंदा करनेवाला पशु समुद्र से निकला. समुद्र जाति और राष्ट्र को दर्शाता है. वह पशु छदम वेशी होगा. वह संसार में राष्ट्र और जाति का प्रतिनिधि बनकर प्रकट होगा. समुद्र एक सांकेतिक शब्द है जो राष्ट्र, जाति और विभिन्न भाषा-भाषी के लोगों को इंगित करता है. जबकि जंगल उस बियाबान कंटीले प्रदेश का प्रतीक है जो परमेश्वर की महिमा से रहित प्रदेश* (यशा.35)        *पशु के दस सींग,सात सिर,भयंकर शारीरिक बनावट चीते के समान, पंजे रीछ के और मुख सिंह के जैसे. इसका विस्तृत खुलासा मैंन...

क्रिप्टो करेंसी पर टैक्स लेना बड़ी क्रांति लायेगी..न्यू वर्ल्ड ऑर्डर

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न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का सबसे अहम ओर सबसे घातक हथियार आज सामने आ गया है  आज मोदी सरकार के यूनियन बजट में देश की पहली डिजिटल करेंसी जारी करने की घोषणा कर दी गई है भारत का रिजर्व बैंक हमारे समय की अब तक की सबसे महत्वपूर्ण परियोजना को शुरू कर रहा है और वह है 2022 में डिजिटल मुद्रा की शुरूआत ........ दरअसल कोरोना महामारी ने वैश्विक समाज के सभी क्षेत्रों, खासतौर पर अर्थव्यवस्था में जिन कमजोरियों को उजागर किया है। उससे पूंजीवाद के वर्तमान रूप क्रोनी कैपटलिज्म पर एक बड़ा संकट आ खड़ा है.....ओर इस संकट को दूर करने के लिए पूरे विश्व के विभिन्न देशों के रिजर्व बैंकों के बीच डिजिटल मुद्रा की दौड़ शुरू हो गई है।...... यह कदम एक क्रांतिकारी परिवर्तन साबित होने जा रहा है अभी तक हम जिस जीवनशैली को जानते हैं उसमें नगदी यानी कागजी मुद्रा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है लेकिन अब पूरी व्यवस्था ही बदलने जा रही है   इस दुनिया के ताकतवर लोग अच्छी तरह से जानते है अधिकतम लोगों पर अधिकतम नियंत्रण स्थापित करने के लिए, नकदी को समाप्त करना होगा। पेपर मनी को डिजिटल मनी द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा, जो टेक्नोक्रेट ...

बाईबल पर आत्मा के लिए ईशारे...

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आत्मा” क्या है अब आइए देखें कि बाइबल में शब्द “आत्मा” का इस्तेमाल किस अर्थ में किया गया है। कुछ लोग सोचते हैं कि “आत्मा,” “प्राण” के लिए ही इस्तेमाल होनेवाला दूसरा शब्द है। मगर यह सच नहीं है। बाइबल साफ दिखाती है कि “आत्मा” और “प्राण” शब्दों का अलग-अलग मतलब है। इन दोनों में क्या फर्क है? सबसे बड़ा फर्क यह है कि बाइबल के लेखकों ने “आत्मा” के लिए, इब्रानी शब्द  रूआख  या यूनानी शब्द  न्यूमा  का इस्तेमाल किया था, न कि  नीफेश  और  साइखी।  बाइबल को जाँचने पर  रूआख और  न्यूमा  का मतलब साफ समझ में आता है। मिसाल के लिए, भजन 104:29 कहता है: “तू [यहोवा] उनकी सांस [ रूआख ] ले लेता है, और उनके प्राण छूट जाते हैं और मिट्टी में फिर मिल जाते हैं।” और याकूब 2:26 कहता है: “देह आत्मा [ न्यूमा ] बिना मरी हुई है।” तो फिर, इन आयतों में शब्द “सांस” या “आत्मा” का मतलब वह चीज़ है जो शरीर को ज़िंदा रखती है। इसके बगैर शरीर मरा हुआ है। इसलिए, कई बाइबलों में शब्द  रूआख  का अनुवाद न सिर्फ “आत्मा” किया गया है बल्कि “जीवन का श्‍वास” या जीवन-शक्ति भी ...