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Showing posts from December, 2021

घड़ा कुम्हार से बगावत करे तो??

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#घड़ा_कुम्हार_से_बगावत_करे_तो●●●●●                    सारी सृष्टि का कर्त्ता यहोवा(ईश्वर)ही है.और सभी सृष्टियों का धर्म एक ही है. हां भिन्न भिन्न मतों, संप्रदायों के बीच मतभेद जरूर हैं मगर समानताएं भी हैं. समाधान इसी में है कि मतभेद की समस्याओं को चिन्हित कर हल ढूंढा जाये..सृष्टि ही सृष्टिकर्ता की खिलाफत करे तो सृष्टि के कर्त्ता को सृष्टि को चेताने का हक भी है. घड़ा कुम्हार से बगावत करे तो कुम्हार क्या करे?                मानव जाति ईश्वर की अनुपम कृति है. मानव अपने सृष्टि कर्त्ता को छोड़ मूर्ति पहाड़, नदी पत्थर, पेड़ आदि सृष्टि को सजदा करे तो ईश्वर का हक है कि अपनी कृति पर क्रोध करे.ताड़ना दे और बदला ले कि वे फिरें...             बाईबल ईश्वर को देर से क्रोध करनेवाला अति करुणामय परमेश्वर बताती है. संतान कुचाल चले तो बाप छड़ी चलायेगा. डांट डपट करेगा. इसका मतलब ये कतई नहीं कि बाप की दुश्मनी बेटे से है. ईश्वर को बाईबल बाप बताती है. और हरेक इंसान उसकी ही संतानें हैं. और अपनी संतान...

पुनर्जन्म झूठ है..

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#पुनर्जन्म_तथ्य_सत्य?? पुनर्जन्म जैसी कोई तथ्य सत्य नहीं है. पुनर्जन्म शब्द लाक्षणिक अलंकारिक शब्द है. पुनर्जन्म(reborn)फिर से जन्म अर्थात नई जिंदगी से है. पुनर्जन्म का मतलब फिर से हमल होकर जन्मना नहीं है. वेदों में इस शब्द को शाब्दिक अर्थों में ही लिया गया है जबकि यह लाक्षणिक अलंकारिक शब्द है.वेद भाष्यकारों पुनर्जन्म को यहाँ समझने में फेर की है.वेदों में फिर से जन्म लेने या पुनर्जन्म का जिक्र नहीं है.           दरअसल पुनर्जन्म न ब्यवहारिक है न वास्तविक है. पुनर्जन्म खुद में बदलाव लाना,जीवनशैली या पद्धति बदलना है, इसी जीवन के पुराने बुरे कर्मों से तौबा कर नये नेकी के कर्मों का अख्तियार करना है.    #ऊँट_का_सुई_के_छेद_से_निकलना.      भावार्थ कुछ और ही है. शाब्दिक अर्थों में यहाँ गड़बड़ होगी. उसी तरह पुनर्जन्म के शाब्दिक अर्थ लेकर चलें तो अनर्थ होगा. पुनर्जन्म तथ्य है सत्य नहीं.                श्रीकृष्ण ने पर्वत को उंगली पर उठाया यह तथ्य है सत्य नहीं. हनुमान जी हवा में उड़कर पर्वत को उठाकर लाया यह तथ्य ह...

बाईबल का ईश्वर माँसाहारी है..

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दयापंथी बंधुओं आपने अभी भी पूर्वाग्रह दुराग्रह रहित स्वध्याय शूरु नहीं किया है! सुनी सुनाई बातों और बाईबल के चन्द खण्डित आयतों से आप आक्षेप कर बुराई कर दोगे. यही सत्य नहीं है.     आप बाईबल को संदर्भ सहित समझकर स्वध्याय करें. बाईबल के अनुसार परमेश्वर पवित्र आत्मा या पाके रुह है.        आत्मा के शरीर नहीं होते, शरीर नहीं तो मुँह और पेट नहीं होंगे. ऐसे में यह आक्षेप कि ईसाइयों का परमेश्वर माँसाहारी या आदमखोर है. यह कहना गलत साबित हुआ.. देखें..ख़ुदा रूह है, और ज़रूर है कि उसके इबादतघर रूह और सच्चाई से इबादत करें।” यूहन्ना 4:24 1:ईसा की कुर्बानी तक बलियों का प्रचलन यहूदियों और इस्रायलियों में था.आज भी यहूदी और मुसलमान बलियाँ देते हैं.पहली उपज या पहला फल तब परमेश्वर की कृतज्ञता के लिए समर्पित किये जाते थे. कैन और हासिल ने भी वही किया. चूंकि हाबिल भेड़ बकरियाँ चरानेवाला था. उसने उत्तम भेड़ को समर्पित किया.      इसका मतलब ये नहीं हुआ कि परमेश्वर भेड़ बकरियाँ या अनाज खाने वाला हुआ.!!      ईसा की बलि के बाद ईसाइयों में यह प्रथा नहीं है. ...

भगवान कौन है?? जीजस!!

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जवाब देनेवाले ने ठीक ठीक जवाब दिया है. लीजिए दयापंथियों के कुतर्कों और उनकी विद्वता का रस भी लें. #समाजी सवाल:— भगवान (God) कौन है ? ईसाई:— जीसस है।      जवाब ठीक ही है क्योंकि भारतीय दर्शन भी भगवान को इस प्रकार परिभाषित करती है जिसने पांचों इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है तथा जिसकी पंचतत्वों पर पकड़ है उसे भगवान कहते हैं।वह व्यक्ति जो पूर्णत: मोक्ष को प्राप्त हो चुका है और जो जन्म मरण के चक्र से मुक्त होकर कहीं भी जन्म लेकर कुछ भी करने की क्षमता रखता है वह भगवान है। सवाल:— क्या जीसस, मैरी का बेटा है ? ईसाई:— हां, जीजस मैरी का बेटा है. जोज़फ उसका संसारिक बाप है और परमेश्वर उसका आत्मिक पिता है. #दयापंथी सवाल:— तो फिर मैरी को किसने बनाया ? ईसाई:— भगवान ने बनाया यह कहना गलत होगा.ईश्वर और भगवान में भेद है. 😊सवाल:— OK, तो फिर भगवान कौन है ? ईसाई:— जीसस है। यह सवाल भगवान और ईश्वर के बीच भेद नहीं जानने का परिणाम है या फिर जानबूझकर दुराग्रह है..... ☺सवाल:— क्या जीसस का जन्म हुआ था ? ईसाई:— हां, हुआ था।      बेशक हुआ था. सवाल:— तो जीसस के पिता कोन हैं ? इसका जवाब...

क्या ईश्वर पाप क्षमा करते हैं??

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#पाप_क्षमा... क्या ईश्वर पाप क्षमा करते हैं?? #बिल्कुल_नहीं..    फिर कोई ईश्वर की संंगति या भक्ति क्यों करे? फिर वेदों की इन प्रार्थनाओं का क्या मतलब है? #हे_ज्ञान_स्वरुप_परमेश्वर_हम_विद्वान_तेरे_ही_बन_जाएँ।  #हमारा_पाप_तेरी_कृपा_से_सर्वथा_नष्ट_कर_दे - ऋग्वेद १/९७/४        फिर तो ये प्रार्थना निर्रथक हुई?? ईश्वर जो दण्ड दे रहे हैं इसका प्रयोजन क्या हैं ? #सुधार_करना_है.     बिना अपराध बोध के दण्ड से सुधार कैसे संभव है??               #पिशाचों_द्वारा_किये_हुए_पाप"_को_दूर_करने_वाली, ब्राह्मणों के शाप को विनष्ट करने वाली तथा देवताओं द्वारा उत्पन्न होने वाली वीरुध् (दूर्वा ओषधि) हमारे समस्त शापों को उसी प्रकार धो डालती है, जिस प्रकार जल समस्त मलों को धो डालता है ॥१॥ - अथर्ववेद      क्या वेदों के ये मंत्र भी प्रक्षिप्त हैं? क्या वेदों में भी मिलावट हुई है? जो अनन्य भाव से भगवान के शरणागत होते हैं उनके संपूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं. सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मो...

समस्या के गर्भ में ही समाधान है..

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समस्या के गर्भ में ही समाधान है.।। कुछ लोग थोड़ी विपरीत परिस्थितियों को समस्या की तरह देखते हैं.इनकी अशांति का कारण भी यही है. दरअसल प्रत्येक समस्या सगर्भा होती है और वह अपने गर्भ में समाधान को लिये रहती है. बस थोड़ा धैर्य रखने की जरूरत है, समस्या के उदर से ही समाधान निकलेगा. समस्या के लिए तमाम शिकवे हैं, कुड़कुड़ाहट है परंतु समाधान के लिए तनिक भी सब्र नहीं है. हमारे भीतर समाधान की प्यास जगानी होगी. समस्याओं में चिंता की नहीं चिंतन की जरूरत होती है मगर अफसोस हम चिंतन की जगह चिंता करते हैं और हाथ लगता है विषाद ही.           अगर हम नेक और सही राह पर हैं तो परमात्मा भी हमारे साथ है. परंतु पुरूषार्थ तो हमें ही करना है. गुलाब के साथ कांटे हैं तो समस्या नहीं है बस देखने का नजरिया ठीक हो. हम देखें कि कांटों के बीच गुलाब कैसा मुस्कुरा रहा है.          "आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उन को खिलाता है; क्या तुम उन से अधिक मूल्य नहीं रखते। तुम में कौन है, जो चिन्ता करके अपनी ...

क्रिशमस क्या है??

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क्रिसमस की सच्चाई।।         25 दिसम्बर ईसा की जन्म जयंती नहीं है. क्रिसमस रोम के सम्राट कोंस्टेन्टाइन ने 336 A.D में क्रिसमस नाम का त्यौहार मनाने की शूरूआत की जिसमें प्रजा खुशियों को आपस में साझा करती,मिलबांट कर खाती थी और तारीख 25 दिसम्बर रखी। इसी त्यौहार को रोमन कैथोलिक प्रधान पोप जूलियस प्रथम ने  यीशु के सांकेतिक जन्म दिन के रूप बदला.इसी दिन से ईसाई आपस में और समाज में ईसा के धरती पर आने का सुसमाचार, ईसा के दया, क्षमा,प्रेम और परोपकार को साझा करते हैं और एकदूसरे से हाथ मिलाकर, एकदूसरे के लिए, दुर्बलों, लाचारों, दीन दुखियों,बीमारों के लिए दुआ, प्रार्थना की जाती है                       रोम में 25 दिसम्बर को सूर्य देवता का जन्म दिन मनाया जाता था जिसे बाद में ईसा के सांकेतिक जन्म दिन के रूप में मनाया जाने लगा. सबसे पहली बार क्रिसमस 354 A.D के बाद मनाया गया। क्रिसमस यह नहीं कि एक {बूढ़ा आदमी सैंटा क्लॉस} लाल टोपी और कपड़े पहन के सबको गिफ्ट बांटे क्रिसमस यह भी नहीं कि उस दिन हम खूब मदिरे पिए जायें और इंजॉ...

दयानंद और शैतानी मण्डली फ्रीमासॉन..

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#मूलशंकर_और_शैतानी_मण्डली◆◆◆ वैश्विक शैतानी शक्तियों को भारत  में शैतानी मण्डली के लिए मोहरे की तलाश थी.आस्तिकता से हताश निराश दयानंद नामक मोहरा उन्हें मिल ही गया.       दयानन्द को इस शैतानी मण्डली का पिट्ठू बनाया गया. अब दयानंद एक FREEMASON था. ‘MASONIC शैतान’ माने जाने वाले हेनरी स्टील ओल्काट और मैडम हेलेना ब्लाव्स्की ने 1875 में दयानंद और अपने कई प्लांटेड चेले चपाटों के साथ मिलकर ‘आर्य समाज’ की स्थापना की, आर्य समाज की स्थापना भारत के किसी धार्मिक केंद्रों के बजाय मुंबई में हुयी, जो कि FREEMASONS का केंद्र भी हुआ करता था               ज्यादातर लोग जानते होंगे 1870 के दशक में मुंबई से थोड़ी दूर पर स्थित ‘कार्ला की रहस्यमय गुफायें’ जिसे आजकल ‘KARLA CAVES’ कहा जाता है, तांत्रिक शैतानों का अड्डा हुआ करती थीं, कार्ला गुफाओं के बारे में यह भी कहा जाता है कि यह तंत्र मंत्र और सिद्धियों के लिए बेहतरीन जगह है जहाँ ऐसे कार्य जल्दी सिद्ध होते हैं,कार्ला गुफाओं में MASONS ने ऐसे कई ‘टेलिपैथी मास्टर्स’ INSTALL किये गये थे जिनके जरिये भारत के क...

बहुत समय पहले की बात है...

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👉बहुत समय पहले की बात है। देश आजाद नही हुआ था। न कोई संविधान बना था। और न ही कोई आरक्षण था। तब हमारे पुष्पक विमान उड़ते थे। हमारे पास मिसाइलों की भरमार थी। इंटरनेट था। बच्चे कभी हवा से, पानी से, तो कभी मछली से बच्चे पैदा कर लिए जाते थे। उस समय हमारी महिमा इतनी थी कि , हमने तो खीर से भी बच्चे पैदा किये थे। 👉एक ऐसा रामराज्य था, जहाँ डाल- डाल पे सोने की चिड़िया रहा करती थी। रामराज्य में औरते खुश थी। साधु - ऋषि सबको ज्ञान ही ज्ञान था , चारो तरफ ज्ञान की नदियां बह रही थी। गणेश जी चूहे पे बैठ के उड़ जाया करते थे। मनु का विधान चलता था। जिसमे औरते और शूद्र सब खुश थे। चारो तरफ खुशहाली ही खुशहाली थी। 👉फिर देश आजाद हो गया और अब मनु का विधान बंद हो गया। संविधान लागू हो गया। अब शूद्रों को आरक्षण मिल गया। बस यहां से देश बर्बाद होना शुरू हो गया। संविधान/आरक्षण की वजह से  पुष्पक विमान के पहिये पंचर हो गये, अब वो उड़ नही पा रहा है।  संविधान/आरक्षण की वजह से मिसाइलों में जंग लग गई है। संविधान/आरक्षण की वजह से अब बच्चे हवा और पानी से पैदा नही हो रहे हैं। संविधान/आरक्षण की वजह से मछली को अपने पेट ...

एलीशा ने बच्चों को श्राप क्यों दिया था??

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दरअसल ये छोटे बच्चे नहीं बेतेल शहर के विधर्मी पुरुष और जवान थे.प्राचीन इब्रानी शब्द #נוֹעַר का अनुवाद यहाँ के युवाओं का अर्थ बहुत व्यापक अर्थों में युवा पुरुषों से है। यह शब्द यूसुफ पर तब लागू होता था जब वह 39 वर्ष का था (उत्पत्ति 41:12), अबशालोम के लिए एक वयस्क के रूप में (2 शमूएल 14:21; 18:5), और सुलैमान के लिए जब वह 20 वर्ष का था (1 राजा 3:7)।  ये युवक बेथेल से थे जिन्हें कई अनुवादों छोटे बच्चे कहा गया है और उनकी उपहासपूर्ण उपस्थिति बेथेल में एक सच्चे भविष्यवक्ता के प्रति निरंतर विरोध को दर्शाती है, जो मूर्तिपूजक बछड़े की उपासना का मुख्य केंद्र है।” ऊपर जाओ,(मर जाओ)एलियाह की तरह चले जाओ.तुम गंजे हो! इन दोनों ने एलीशा को उसके स्पष्ट गंजेपन के कारण, बल्कि भविष्यवक्ता एलिय्याह के साथ उसके संबंध के कारण भी मज़ाक उड़ाया। " ऊपर जाओ " शब्दों के पीछे का विचार यह था कि एलीशा को एलिय्याह की तरह स्वर्ग जाना चाहिए । इसने एलीशा, उसके गुरु एलिय्याह और उस परमेश्वर का उपहास किया जिसकी उन्होंने सेवा की थी।          संदर्भ से यह समझना चाहिए ऊपर जाओ; ऊपर जाना कहाँ है?कि एल...

कन्फ्यूज दयानंद

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#सर्वे_ते_नरकं_यांति_दृष्टवा_कन्यां_रजस्वलाम●●      उस रजस्वला को देखकर उसकी माता पिता भाई,मामा और बहन सब नर्क जाते हैं.      【सत्यार्थप्रकाश चतुर्थ समुल्लास, पृष्ठ संख्या 56 संस्करण:अप्रैल 1989】      इसी समुल्लास में परलोक के सुख मनुस्मृति के श्लोकों में बताये गए हैं. (पेज नं.73)           दयानन्द ने परलोक शब्द लिखने के बाद #परजन्म लिखा है.#पुनर्जन्म नहीं. दयानन्द जानते थे कि वेदों में आवागमन नहीं है. बल्कि #स्वर्ग_नरक की बात है.     कठोपनिषद १/१/१२ में भी ऐसा है. #स्वर्गे_लोक_न_भयं......मोदते स्वर्गलोके।।      स्वर्ग में ना भय है ना मृत्यु है और ना बुढ़ापा है. वहाँ भूखप्यास को पारकर शोक या दुख से निवृत्त होकर आनंद को प्राप्त करते हैं.      अथर्ववेद १८/४/६४के भाष्य भी इसकी तस्दीक करते हैं लेकिन दयापंथी यहाँ भी चालाकी से डामेज कंट्रोल कर गए हैं

दयानंद समाज सुधारक या समाज नाशक!?

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 दयापंथी बाईबल में भी नियोग खोदकर #नियोग को पुण्य कर्म साबित करने की कोशिश में हैं.बाइबिल में बड़ा लंबा कानून है  पति धर्म निभाना पड़ता है.          नियोग नियोगियों के लिए बड़ी सुविधाएं मुहैया कराती है कि उस में पति धर्म निभाना ही नहीं पड़ता ....         #नियोगी मौज लेते रहें जब गर्भ ठहरे निकल लें...!!      ऐसा तो बाईबल में कतई नहीं है. जिनके महर्षि और स्वामी ने ऋषियों को देवर की भूमिका निभाने वाले बताते हैं वो भला ऐय्याशी मानसिकता कहाँ छुपा पायेंगे.           नियोग वह कार्य है जहाँ पुण्य का पुण्य, मज़े का मज़ा!!! न भोग्या स्त्री की कोई Responsibility न होने वाले बच्चे की.विध्वा जिसके पति की चिता अभी बुझी भी नहीं है और उसे नियोग के लिए उठाया जाता है हे विध्वे उठ!!रोना धोना बंद कर नियोग कर....!!! घोर आश्चर्य! आर्य (अ)सभ्यता सच मुच बड़ी सुविधा जनक है | मगर #दयापंथियों को शर्म नहीं आती बेशर्मी से सेरोगेसी को नियोग का नया संस्करण बताते है...

ईसाईयों का परमेश्वर तीन सींगों वाला है

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#ईसाइयों_का_परमेश्वर_तीन_सिरोंवाला_राक्षस_है.. #बाईबल_ईश्वर_पक्षपाती_है. #बाईबल_ईश्वर_की_वाणी_नहीं_है.. यह गपोड़ है.... #वेद_ईश्वर_की_वाणी_है●●●    #चाण्डाल_भंगी_चमार से दूर रहो..!!    हे ईश्वर आप गंजे, काले रंग वाले पुरुषों को दूर हमसे कीजे...!! दयानंद सरस्वती अपने यजुर्वेद  वेद भाष्य  30/21लिखते है कि :-  हे परमेश्वर आप!  बंदर की छोटी सी आंखो वाले शीतप्राय देशी मनुष्य को ( पिडलम) पीली आंखो को उतपन्न किजिए----( चाण्डालम) भंगी को ( खलतिम) गंजे को---( कृष्णम) काले रंग वाले पिडाक्षम) पीले नेत्रों से युक्त पुरूष को दूर कीजिये । भावार्थ = भंगी के शरीर से आया वायु दुर्गंध होने से सेवन योग्य नहीं इस कारण दूर भगावे ।                                #ईशवाणी_ऐसा_तो_नहीं_हो_सकता!!? मनु.(९/६०,६१) भी देखें यहाँ पुत्र प्राप्ति की ही बात है.    #दयापंथियों की विद्वता और श्रेष्ठता का यही स्तर है कि ये सामने वाले को जीभरकर भला बुरा कहते हैं, झूठ के बल पर आक्षेप करते हैं....

सत्य बोलने के लिए तैयारी नहीं करनी होती..

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सत्य का अनुसरण करो और वर्तमान क्षण में जियो, अस्तित्व सत्य है.     "सत्यवान बनो" इस वाक्यांश का अर्थ केवल सत्य बोलना नहीं है, बल्कि अपने समग्र जीवन से सत्य को व्यक्त करना है.      यदि कोई नेत्रहीन है और आप उससे कहें"तुम अंधे आदमी हो"तो आप सत्य तो बोल रहे हैं मगर सुनने वाला चोटिल महसूस कर रहा है.         सच बोलें और हमेशा सत्य बोलें लेकिन सुखकर सत्य बोलें. यदि मरीज कुछ ज्यादा ही बीमार है तो वैद्य भले के लिए झूठ भी कहे तो यह पाप नहीं है. यदि वैद्य कहे "अब तुम्हारी बीमारी बढ़ गई है मुश्किल है कि तुम बच पाओगे"     ऐसे में दो चार दिन और जीने वाला इसी क्षण मर जायेगा. व्यक्ति किताबी ज्ञान या स्थूल ज्ञान को ही आधार मानकर व्यवहार करने लगता है. इसमें बड़ी भूल है. यही आध्यात्म विकास में बड़ी विफलता का कारण है.इसमें पड़कर व्यक्ति तर्क के बजाय कुतर्क ज्यादा करता है.        हरेक कली चटकने और विकसित पुष्प बनने में समय लेती है. कली को फूल बनने पर जोर मत डालें. उचित समय की प्रतीक्षा करें.. अपने भीतर के संपूर्ण पुष्प के लिए.   ...

पुनर्जन्म तर्क पूर्ण अवधारणा नहीं है..

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#पुनर्जन्म  इसपे कई कहानियां लिखी गयी होंगी, कई फिल्में बनी होंगी और कम से कम भारत में तो यह कांसेप्ट बेहद जाना पहचाना है और इस पर यकीन करने वाले करोड़ों मिलेंगे लेकिन क्या यह वाकई होता है? आइये इसकी संभावना को टटोलते हैं। वैसे तो कुछ लोग इसे यूं भी मानते हैं कि इंसान चौरासी लाख योनियों में जन्म लेता है तो हो सकता है कि आज जो इंसान था वह अगले जन्म में कुत्ता हो, या जो पिछले जन्म में बंदर था वह इस जन्म में इंसान हो गया, है तो यह भी पुनर्जन्म ही लेकिन टेक्निकली इसे इंसान के ही दोबारा जन्म लेने के बारे में कहा जाता है। अब किसी इंसान ने दुबारा जन्म लिया है यह कैसे साबित हो.. पिछले जन्म की कोई स्थापित पहचान ले कर तो पैदा होता नहीं तो इस बात को प्रमाणित करने के लिये कुछ ऐसे लोगों के उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं जिन्हें पिछले जन्म के बारे में याद हो और उन्होंने उस बारे में बताया हो। अब यहीं से टेक्निकल नजरिये से बात उलझ जाती है। याद क्या है.. पहले तो इसे समझें। हम बचपन से जो भी देखते, सुनते, समझते, महसूस करते हैं वह सब हमारी दिमाग रूपी हार्ड डिस्क में स्टोर होता जाता है और यह सारी इनफार्...

वैदिक अवधारणा यहाँ ध्वस्त होता है...

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स्वामी दयानंद ने लिखा है कि वेदों का अवतरण ऋषियों की मातृभाषा में न होकर संस्कृत भाषा में हुआ। संस्कृत भाषा उस समय किसी देश अथवा जाति की भाषा नहीं थी।  कारण यह लिखा है कि अगर ईश्वर किसी देश अथवा जाती की भाषा में वेदों का अवतरण करता तो ईश्वर पक्षपाती होता, क्योंकि जिस देश की भाषा में वेदों का अवतरण होता उसको पढ़ने और पढ़ाने में सुगमता और अन्यों को कठिनता होती। (7-89) (7-92)   जैसा कि मूल शंकर जी ने लिखा है कि वेद आदि ग्रंथ हैं। सृष्टि के आदि में परमात्मा ने मनुष्यों को उत्पन्न करके अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा आदि चारों महर्षियों को चारों वेदों को ग्रहण कराया। (7-87) यहां सवाल यह पैदा होता है कि वेदों से पहले चारों ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा आदि की मूलभाषा कौन सी थी?  दूसरा सवाल यह कि सृष्टि के आदि में पृथ्वी पर कितने देश और क़ौमे थी और उनमें कितनी भाषाएं बोली जाती थी?  तीसरा सवाल यह कि वेदों के समय पृथ्वी पर विदेशी अगर थे और वे न ऋषियों की भाषा जानते थे और न ही संस्कृत जानते थे और न ही ऋषि विदेशियों की भाषा जानते थे तो ऋषियों ने उन्हें वेदों का ज्ञान किस प...