रामायण काल में आर्य नारियों की दशा..
रामायण की व्याख्या में महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि वानरों तथा राक्षसों की स्त्रियाँ अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छन्द हैं। वे अपने पतियों रावण तथा बालि को राजनैतिक परामर्श भी देती हैं, परन्तु आर्य स्त्रियों को सीमित स्वतन्त्रता है। कैकेयी को छोड़कर अन्य किसी स्त्री को स्वतन्त्रता नहीं दिखती। वास्तव में अयोध्या की नारियाँ पुरूषों के प्रति आज्ञाकारिता की डोर में बँधी हुई हैं। सीता राम की छाया बनकर सर्वत्र उनका अनुसरण करती देखी जा सकती हैं। उनका सब कुछ राम का है। राम से अलग सीता का कोई अस्तित्व नहीं है लेकिन राम ऐसी एकनिष्ठ पतिपरायणा सीता को बिना किसी अपराध के अग्नि परीक्षा देने के लिए विवश करते हैं। लंका विजय के पश्चात् सीता जब पालकी में बैठकर राम के पास आती हैं, तो राम इन शब्दों से उनका अभिनन्दन करते हैं- ‘‘कः पुमास्तु कुले जातः स्त्रियाँ परिगृहीषिताम्। तेजस्वी पुनराद्दयात् सुहल्लोचन चेतसा। रावणांघ परिभ्रष्टा दुष्टां दुष्टां दुष्टेन चक्षुषा। कव्य त्वा पुनरादधा कुल व्यवदिशन्महत।। नास्ति में त्वप्यामिष्वंग को यथेष्ट गम्यतामिति।।‘‘ अर्थात् ‘‘कौन ऐसा कुलीन पुरूष होगा, जो तेजस्वी होकर भी दूसरे के घर ...