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Showing posts from January, 2022

रामायण काल में आर्य नारियों की दशा..

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रामायण की व्याख्या में महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि वानरों तथा राक्षसों की स्त्रियाँ अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छन्द हैं। वे अपने पतियों रावण तथा बालि को राजनैतिक परामर्श भी देती हैं, परन्तु आर्य स्त्रियों को सीमित स्वतन्त्रता है। कैकेयी को छोड़कर अन्य किसी स्त्री को स्वतन्त्रता नहीं दिखती। वास्तव में अयोध्या की नारियाँ पुरूषों के प्रति आज्ञाकारिता की डोर में बँधी हुई हैं। सीता राम की छाया बनकर सर्वत्र उनका अनुसरण करती देखी जा सकती हैं। उनका सब कुछ राम का है। राम से अलग सीता का कोई अस्तित्व नहीं है लेकिन राम ऐसी एकनिष्ठ पतिपरायणा सीता को बिना किसी अपराध के अग्नि परीक्षा देने के लिए विवश करते हैं। लंका विजय के पश्चात् सीता जब पालकी में बैठकर राम के पास आती हैं, तो राम इन शब्दों से उनका अभिनन्दन करते हैं- ‘‘कः पुमास्तु कुले जातः स्त्रियाँ परिगृहीषिताम्। तेजस्वी पुनराद्दयात् सुहल्लोचन चेतसा। रावणांघ परिभ्रष्टा दुष्टां दुष्टां दुष्टेन चक्षुषा। कव्य त्वा पुनरादधा कुल व्यवदिशन्महत।। नास्ति में त्वप्यामिष्वंग को यथेष्ट गम्यतामिति।।‘‘ अर्थात् ‘‘कौन ऐसा कुलीन पुरूष होगा, जो तेजस्वी होकर भी दूसरे के घर ...

चूने के फायदे

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चूना जो पान में लगा के खाया जाता है , उसकी एक डिब्बी ला कर घर में रखे .यह सत्तर प्रकार की बीमारियों को ठीक कर देता है . गेहूँ के दाने के बराबर एक गिलास पानी में मिलाकर पिलाने से बहुत जल्दी # पीलिया ठीक हो जाता है . चूना #नपुंसकता की सबसे अच्छी दवा है - अगर सुबह गर्म पानी के साथ ले तो. #शुगर रोज़ सुबह ख़ाली पेट एक गिलास पानी में एक छोटे चने के बराबर चुना मिलकर पीने से शुगर जड़ से ख़त्म हो जाती हैं ( समय समय पर जाँच करवाते रहे..  ) #विद्यार्थीओ के लिए चूना बहुत अच्छा है जो # लम्बाई बढाता है - गेहूँ के दाने के बराबर चूना रोज पानी में मिला के लेना चाहिए,  - इससे लम्बाई बढने के साथ साथ स्मरण शक्ति भी बहुत अच्छी होती है । जिन बच्चों की बुद्धि कम है ऐसे मतिमंद बच्चों के लिए सबसे अच्छी दवा है चूना . जो बच्चे बुद्धि से कम है, दिमाग देर में काम करता है, देर में सोचते है हर चीज उनकी स्लो है उन सभी बच्चे को चूना खिलाने से अच्छे हो जायेंगे । #बहनों को अपने #मासिक_धर्म के समय अगर कुछ भी तकलीफ होती हो तो उसका सबसे अच्छी दवा है चूना । मेनोपौज़ की सभी समस्याओं के लिए गेहूँ के दाने के बराबर चूना हर...

ईसाइयों के चमत्कार पाखंड हैं. क्या चमत्कार हुआ आदिवासियों दलितों के लिए कि ईसाई बन गए.

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 #ईसाईयत_कमजोर_है_तार्किक_नहीं_है। इसीलिए ईसाई नास्तिक बन रहे हैं चर्च निलाम हो रहे हैं...                    मेरे भाई इसीलिए कमजोर तबके का इशाईयत में जाना सबसे अच्छा है।क्योंकि इशाइयों में सर्वाधिक नास्तिकता की सुविधा है।ईसाइयत से लचीला पंथ और कोई नहीं है.कमजोरों दलितों,पिछडों आदिवासियों को सदियों से मुख्यधारा से अलग शिक्षा संस्कारों से बंचित उपेक्षित समझा गया ऐसे ही लोगों को इशाईयत समाज के मुख्यधारा में ला रही है।उनके शैक्षणिक सामाजिक आर्थिक विकास का समुचित व्यवस्था कर रही है।जब लोग शिक्षित हो जाएंगे तो स्वयं निर्णय ले लेंगे। इशाईयत के तर्कनिष्ठ लोगों ने इशाईयत के कमियों को खारिज कर वैज्ञानिक उन्नति का साहस भी किया है। आप में नास्तिक होने की प्रवृत्ति भी नहीं है। इशाईयत तरलता बदलाव बगावत में विश्वास करती है।       ईसाईयत परिवर्तनों और नई कोपलों का भब्य स्वागत करता है।आप समाज को कट्टरपंथी बना रहे हैं।        #चंगाई_और_चमत्कार_के_नाम_पर_ईसाईयत_फैला_रहे_हो चमत्कार नहीं होता तुमलोग गरीबों दलितों के ल...

तुम ईसाई क्यों बने??

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#आलोक_कनखजूरे_तुमने_ईसाईयत_क्यों_स्वीकारा? 👉सच सच बताओ तुम्हारे साथ कौन से चमत्कार हुए थे? 👉तुम्हें कितने पैसे मिले?ईसाई बनाने के कितने पैसे मिलते हैं? 👉दो बोरी चावल और पैसे में तुमने धर्म बदल दिया!!थू है तुम पर....सच्चाई बताओ???            हम कैथोलिक ईसाई परिवार में ही जन्मे और बड़े हुए. ताऊ पादरी भी हैं.लेकिन कभी हमारा लगाव ईसाईयत से नहीं रहा.मैंने कभी बाईबल ढंग से नहीं पढ़ी.विशेष त्यौहारों में ही घरवालों के कहने पर ही बेमन से चर्च जाता था.              संगीत प्रेमी होने के कारण गाँव और दूर से भी रामायण मण्डली के लोग मुझे आमंत्रित करते थे.हम ढोलक और तबले पर संगति करते करते रामचरित मानस के टीके भी कहने लगे.            वहाँ मुझे बड़ा सम्मान मिलता था और लोग तारीफ भी करते कि देखो इसके ताऊ पादरी हैं और ये रामायण के टीके कहता है, ढोल तो अच्छा बजाता ही है. इतनी तारीफ सुनकर मुझे अच्छा लगता..       हर टीके के बाद चिलम घुमाया जाता,बीच बीच में मुनक्के की चाय बंट जाती.     ...

तो फिर भगवान कौन है??

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जवाब देनेवाले ने ठीक ठीक जवाब दिया है. लीजिए दयापंथियों के कुतर्कों और उनकी विद्वता का रस भी लें. #समाजी सवाल:— भगवान (God) कौन है ? ईसाई:— जीसस है।      जवाब ठीक ही है क्योंकि भारतीय दर्शन भी भगवान को इस प्रकार परिभाषित करती है जिसने पांचों इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है तथा जिसकी पंचतत्वों पर पकड़ है उसे भगवान कहते हैं।वह व्यक्ति जो पूर्णत: मोक्ष को प्राप्त हो चुका है और जो जन्म मरण के चक्र से मुक्त होकर कहीं भी जन्म लेकर कुछ भी करने की क्षमता रखता है वह भगवान है। सवाल:— क्या जीसस, मैरी का बेटा है ? ईसाई:— हां, जीजस मैरी का बेटा है. जोज़फ उसका संसारिक बाप है और परमेश्वर उसका आत्मिक पिता है. #दयापंथी सवाल:— तो फिर मैरी को किसने बनाया ? ईसाई:— भगवान ने बनाया यह कहना गलत होगा.ईश्वर और भगवान में भेद है. 😊सवाल:— OK, तो फिर भगवान कौन है ? ईसाई:— जीसस है। यह सवाल भगवान और ईश्वर के बीच भेद नहीं जानने का परिणाम है या फिर जानबूझकर दुराग्रह है..... ☺सवाल:— क्या जीसस का जन्म हुआ था ? ईसाई:— हां, हुआ था।      बेशक हुआ था. सवाल:— तो जीसस के पिता कोन हैं ? इसका जवाब...

मतभेद वैमनस्य लाता है.

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हर धार्मिक मतों,शास्त्रों में मतभेद कम समानताएं ज्यादा हैं. हमें मतभेदों पर नहीं समानताओं पर विमर्श करके मतभेद कम करना चाहिए. समस्या तब पैदा होती है जब हम मतभेदों पर बहस करते हैं.यही बहस और मतभेद इंसान और इंसान के बीच दरार लाता है,खाईयां लाता है,वैमनस्य पैदा करता है. वेद भी पहले मनुष्य बनने पर बल देता है और बाईबल बैरियों से भी मुहब्बत करना सिखाता है. इस्लाम ईश्वर के प्रति वफादार बनना सिखाता है. हमें चाहिए कि हम समस्या नहीं बल्कि समाधान बनें.हर कर्म के पीछे कारण होता है. आध्यात्म में उसी कारण को ईश्वर कहा गया है. ईश्वर को किसी ने नहीं देखा पर ईश्वर कर्मों के द्वारा अपना वजूद जाहिर करता है. हमारे काम ऐसे होने चाहिए जिससे ईश्वर का स्वभाव झलके.    इंसान का स्वभाव ही है कि ईर्ष्या करे,बैर करे,गलौच करे,बुराई करे पाप करे....मगर ईश्वरीय स्वभाव इसके उलट है.....    हरेक इंसान का अंतिम लक्ष्य मोक्ष और उद्धार पाना है. आखिर मोक्ष है क्या..?? मोक्ष की तीन कड़ियाँ आपस में जुड़ी हैं.  पहला मन का परिवर्तन,  दूसरा स्वभाव का बदलना और तीसरा आत्मा का परमात्मा से मिलन.   ...

बूचड़खानों के अधिकतर मालिक हिंदू.

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क्या आपको मालूम है कि देश का सबसे बड़ा बूचड़खाना तेलंगाना के मेडक ज़िले में रूद्रम गांव में स्थित है 400 एकड़ में फैले इस बूचड़खाने के मालिक सतीश सब्बरवाल हैं. यह केवल एक नहीं ऐसे कई है और भी हैं, जैसे अल दुआ, अल नूर,,,,अरेबियन exports,,,,इनके नाम सुन चौंकिए मत ये भाषाई महब्बत सिर्फ धंधा चमकाने के लिए है असल में इन सबके मालिक हिन्दू हैं,,,,, जहां धड़ल्ले से पूरी निर्दयता के साथ, विधिवत् ,,, पूर्णतया वैध तरीके से,, गौकसी होती है ,,, इनकी कृपा से आज भारत दुनिया में बीफ एक्सपोर्ट का सिरमौर बना हुआ है!इनका रुतवा इस कदर है,,, किसी कट्टरवादी की मज़ाल नहीं इनपर उंगली उठाने की,,, क्यूँकि ये हुकूमत ए हिंद की सरपरस्ती में चलते हैं,,,, अब जाओ Google पर फंला पार्टी के फायर बॉन्ड Mla संगीत सोम का नाम इन बूचड़खानो से इनके वैध रिश्तों को खोजिए,,, और गौ सेवा के तरीके सीखिए या किसी बेचारे गरीब डोसे बाले ,,, या किसी चूडी बाले पर माथा फोड़िये,,,

आपने कहा तुम भटके हुए हो..

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आपने कहा तुम सब भटके हुए हो.लालच और तलवार की डर से ईसाई बने हो वेदों की ओर लौटो!!!        मेरे भाई वेद(ईश्वरीय ज्ञान) से विमुख और वेद से कभी दूर हम गए ही नहीं फिर वेद की ओर लौटने का आह्वान कैसा?    हम किस तरह वेदों की ओर लौटें.?हमें सिखाया गया #तमसो_मा_ज्योतिर्गमय हमने पाया #मैं_जगत_की_ज्योति_हूँ..   हमें पढ़ाया गया #असतो_मा_सदगमय्.. हमने जाना #सत्य_मैं_हूँ.. हमें रटाया गया.#मृत्योर्मा_अमृतं_गमय् हमने समझ लिया #अनंत_जीवन_मैं_हूँ...हमें तमाम लीक सुझाये गए.      हमने #मार्ग_सत्य_जीवन_और_ज्योति पा लिया है.       हमें कोई लालच नहीं दिया गया ना ही हम तलवारों से डरते हैं. हम वेद विमुखी भी नहीं हैं. आपको यह गलत पढ़ाया गया है कि लोग लालच में दो बोरी गेहूँ से या तलवार की धार से ही ईसाई बनते हैं.           आज हम तलवार से नहीं प्यार से दुनिया जीतना चाहते हैं. तलवार, जहर,नफरत हमारे नहीं हैं.

गाँधीजी और विदेशी समानों का बहिष्कार..

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ये तस्वीर 1931 के दौर की है। जब भारत में महात्मा गाँधी के आह्वान पर विदेशी माल के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने के नारे खूब चल रहे थे। इस आह्वान का असर इंग्लैंड के कई उद्योगों पर पड़ रहा था क्योंकि भारत में उनके माल की खपत लगातार कम हो रही थी। महात्मा गांधी इंग्लैंड के दौरे पर थे। उन्हें वहां के कपड़ा मिल चलाने वाले डेविस घराने ने अपने यहां आमंत्रित किया। गांधी के विदेशी माल के बहिष्कार के आह्वान का असर डेविस घराने पर भी पड़ रहा था, उनकी हालत दिन प्रतिदिन बद से बद्तर हो रही थी। मिल की स्थिति इतनी खराब हो रही थी कि अब मजदूरों की छटनी होनी शुरू हो गई। डेविस घराना महात्मा गांधी को उन मजदूरों से मिलवाना चाहता था, जिनकी नौकरी गांधी जी के आह्वान के बाद खतरे में पड़ रही थी, ताकि गांधी जी अपने आह्वान को वापस ले और मिल व मजदूरों दोनो की हालत दुरुस्त हो। मिल मालिक को लगा कि गांधी जी उन से मिलने नहीं आयेंगे, क्योंकि उन से मिल कर गांधी जी और उनके आंदोलन को कोई फायदा नहीं होना था। वो अगर "दुश्मन देश" के इन मजदूरों से नहीं भी मिलते तो, इस का असर गांधी की शख्सियत पर रत्ती भर भी नहीं पड़ता।  और...

चार वेद अपौरुषेय कैसे है??

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निवर्तमान सद्गुरु भी जीवित वेद हैंं.सद्गुरु पूर्वाग्रह रहित ईश्वरीय वाणी कहता है.            विज्ञान का अर्थ है विशेष ज्ञान. पांचों इंद्रियों से हम जो कुछ समझ सकते हैं वह ज्ञान है. जो समझ नहीं पाते, फिर भी उसका बोध किया जा सकता है उसे विशेष ज्ञान कहा जा सकता है. विज्ञान एक ऐसा तरीका है.जिसमे सिद्धता कंपल्सरी है.          वेद का अर्थ ही ईश्वरीय ज्ञान है. ज्ञान नैमित्तिक है. इसे साधना और तप और अभ्यास से हासिल किया जा सकता है. हमारे पूर्वजों, ऋषियों नबियों पैगंबरों ने अपने साधना और अभ्यास से इसे हासिल किया और स्मृतियों में संग्रहित किया.लिपिबद्ध किया. इसका लाभ लोगों को लेना चाहिए. और पूर्वजों को शुक्रिया कहना चाहिए.       ईश्वरीय ज्ञान हासिल करने के लिए किसी गुरुकुल या महाविद्यालय से डिग्रियां लेना जरूरी नहीं है. वेद चारों ओर बिखरे हुए हैं. बस बटोरने की योग्यता हासिल करनी है. वेद स्वानुभव से हासिल किया जा सकता है. हमारे पूर्वजों ने जो बताया है वह परानुभव है. इसमें हमारा अपना स्व अनुभव नहीं है.

भीष्म पितामह और पुनर्जन्म के किस्से.

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#पुनर्जन्म_तथ्य_या_सत्य?? भाग :2              महाभारत के युद्ध में शरशैय्या पर लेटे भीष्म पितामह का पिछले जन्म का दोष यह था कि उसने पूर्व जन्म में सर्प को कांटेदार झाडियों में फेंका था जिससे सर्प बड़ी पीड़ा के साथ मर गया था. भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर भीष्म पितामह ने उस घटना को शरशैया पर याद करने की कोशिश की मगर याद नहीं कर पाये. फिर उन्हें एक युग पीछे की घटनाओं को याद दिलाया गया. तब उन्हें यह घटना स्मृत हो पाया.....      आईये जरा समीक्षा करें. ध्यान रहे यह समीक्षा किसी के धार्मिक मान्यताओं पर आघात करने.के लिए नहीं बल्कि समीक्षा के तार्किक खंडन या मंडन के लिए प्रस्तुत है.             आप अपने जीवन का प्रत्येक काम अपने शरीर के अंगों से करते हैं चाहे वह चलना हो, खाना हो, पीना हो, देखना हो अथवा मल त्याग करना। इन तमाम कामों में आपकी आत्मा का कोई हस्तक्षेप अथवा योगदान नहीं होता है। तो इतना और मान लीजिए कि जिस प्रकार आप अपने शरीर के अंगों द्वारा खाते-पीते और दैनिक कर्म करते हैं, उसी प्रकार अपनी जिंदगी की तमाम बातों क...

भीष्म पितामह और पुनर्जन्म के किस्से

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#पुनर्जन्म_तथ्य_या_सत्य?? भाग :2              महाभारत के युद्ध में शरशैय्या पर लेटे भीष्म पितामह का पिछले जन्म का दोष यह था कि उसने पूर्व जन्म में सर्प को कांटेदार झाडियों में फेंका था जिससे सर्प बड़ी पीड़ा के साथ मर गया था. भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर भीष्म पितामह ने उस घटना को शरशैया पर याद करने की कोशिश की मगर याद नहीं कर पाये. फिर उन्हें एक युग पीछे की घटनाओं को याद दिलाया गया. तब उन्हें यह घटना स्मृत हो पाया.....      आईये जरा समीक्षा करें. ध्यान रहे यह समीक्षा किसी के धार्मिक मान्यताओं पर आघात करने.के लिए नहीं बल्कि समीक्षा के तार्किक खंडन या मंडन के लिए प्रस्तुत है.             आप अपने जीवन का प्रत्येक काम अपने शरीर के अंगों से करते हैं चाहे वह चलना हो, खाना हो, पीना हो, देखना हो अथवा मल त्याग करना। इन तमाम कामों में आपकी आत्मा का कोई हस्तक्षेप अथवा योगदान नहीं होता है। तो इतना और मान लीजिए कि जिस प्रकार आप अपने शरीर के अंगों द्वारा खाते-पीते और दैनिक कर्म करते हैं, उसी प्रकार अपनी जिंदगी की तमाम बातों को याद रखने का काम भी अपने शरीर के एक महत्वपूर्ण अंग दिमाग के द्वारा करते हैं। आ...

दयानंद या पद्मपुराण??

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#दयापंथियों_समाज_महर्षि_की_सुने_या_पद्मपुराण_की??  "यदि स्त्री का पति परदेश जाए तो वह स्त्री सास ससुर के समीप रहे शयन करे” पद्मपुराण वहीँ दूसरी ओर सत्यार्थ प्रकाश के चौथे समुल्लास में महर्षि उवाच है कि “पति धर्म के अर्थ परदेश गया हो तो आठ वर्ष, विद्या और कीर्ति हेतु गया तो ६ वर्ष, धनादि कामना हेतु गया तो पत्नियां तीन वर्ष बाट जोहले.यदि लौटने में देरी हो जाये तो अपनी जिस्मानी भूख मिटा नियोग करके संतान उत्पत्ति कर ले.!!!              अब एक किताब कह रही स्त्री का पति परदेश गया हो तो सास ससुर के समीप रहे अन्य किसी के पास न जाए और दूसरी तरफ आर्यसमाज की पुस्तक कह रही की परदेश गया तो एक निश्चित समय तक इंतज़ार करने के बाद किसी के साथ अपनी ज्वाला शांत कर ले!!!          लोग महर्षि उवाच पर अमल करें या पद्मपुराण की??                  अब आप पर निर्भर करता है कि आप अपने समाज की महिला कैसी चाहेंगे ??       #दयापंथियों से सवाल:- (१) क्या दयापंथियों की महिलाएं महर्षि के आदेशों का प...

सृष्टि कितने बरस की है?

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सबके पूर्वज एक ही हैं..

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जेन्दावेस्ता / अवेस्ता के बहुत से हिस्सो और अथर्ववेद के मंत्रों के बीच भाषा, उच्चारण और कथ्य की जबरजस्त समानताएं मौजूद हैं। जरथुस्त्र के पिता का नाम पौरुषास्प् और उनके काबिले का नाम स्पितामा( पितामह) था । अवेस्ताई देवताओं के नामो में भी आश्चर्यजनक समानता है जैसे इंद्र का आंद्र, मित्र( सूर्य) का मिथ्र आदि। जेन्दावेस्ता उन लोगो की कृति है जो ईरानियों से भिन्न थें और कंही दूसरी जगह से आ कर बसे थें।  पश्चिमी इतिहासकारो के अनुसार ईरान के पश्चिमी उत्तर में  वह जातीय समुदाय आ बसा था जो मिश्र / काला सागर के पश्चिम से आकर बसा था, जिसके कोई आधी सहस्राब्दि के जरथुस्त्र हुए थे। ईसा के करीब एक हजार से नौ सौ साल पहले जरथुस्त्र का होना बताया जाता है अर्थात वह समुदाय दूसरी सहस्राब्दि ईसापूर्व ईरान आया होगा । यह जातीय समुदाय मीडियन या मीडी था , अब्राहम के मिश्र की पत्नी के बेटे।ओल्ड टेस्टामेंट में मीडियन जातीय समुदाय का काफी जिक्र है । खुद मूसा ने मीडियानो के तांत्रिक नेता की बेटी से शादी की थी, मूसा ने अपने तंत्र या जादू से मिस्र के शासक को पराजित किया था।मीडियान अग्नि पूजक थें। ओल्ड टेस्टामे...

आर्य समाज का जनक वह चूहा..

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#आर्य_समाज_का_जनक_है_वह_चूहा:  जिसको लड्डू खाते देखकर महर्षि दयानंद सरस्वती के मन मे यह भाव आया कि जो भगवान अपनी रक्षा नहीं कर सकता वह मेरी क्या रक्षा करेगा? दयानंद जिद्दी किस्म के व्यक्ति थे। बचपन से ही जिद्दी थे। बाद में भी रहे।  शिवरात्रि की पूजा थी। पिता बड़े भक्त थे। बेटे को भी पूजा में बिठाया।  रात्रि भर का जागरण था। दयानंद रात भर बैठे रहे। पिता सो गए। वह जागते रहे। और जो हुवा उसने उनकी जिंदगी बदल दी। हुवा यह कि एक चूहा शिवलिंग पर चढ़ाए गए लड्डू खाने लगा। यही नहीं वह तो शिवलिंग पर चढ़ गया। शिवजी पर बैठकर मस्ती से इधर उधर देखने नाचने लगा। बस दयानंद के मन से सारी श्रद्धा चली गयी।  कि ये क्या शिव जी चूहे को भी नही भगा सकते। जो एक चूहे को नही भगा सकता वह हमारी क्या रक्षा करेगा। यदि तीक्ष्ण बुद्द्धि व्यक्ति हो तो यही होगा।  यदि दयानंद को पहले भीतर जाना सिखाया गया होता, बाहर की पूजा न सिखाया गया होता तो यह नहीं होता।  आर्य समाज ने जो उपद्रव खड़ा किया वह न होता। बच्चों को पहले ध्यान में ले जाना चाहिए। बच्चे बूढों से अधिक आसानी से ध्यान में उतर जाते हैं. बालमन है...