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Showing posts from October, 2021

क्षमा पाप दोहराने का लाईसेन्स नहीं है..

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#क्षमा_पाप_दोहराने_लाईंसेस_नहीं_ईश्वरीय_अनुग्रह_है.●●●● क्षमा इसलिए नहीं की जाती कि पाप या गलतियां फिर से दोहराई जायें.रिहाई इसी बिना पे होती है कि दोबारा गुनाह न करो.जहाँ क्षमा का विकल्प नहीं है वहाँ निर्ममता है, दयालुता नहीं. और ईश्वर दयालु है कृपालू है. क्षमा ईश्वर के न्यायी होने पर प्रश्नचिह्न खड़ी नहीं करता. क्योंकि ईश्वर के पास सारे उपाय और हल हैं.         हमने देखा है रेप पीड़ित मसीही बहन को सजा याप्ता गैर मसीही भाई को जेल में राखी बांधते हुए. उसे माफ करते हुए.               कर्मों का फल निश्चित है मगर हमारे यहाँ प्रायश्चित और क्षमा का विकल्प भी है. क्षमा को गुनाह करने लाईसेंस समझना बेईमानी है.         .  बाईबल ईश्वर को देर से क्रोध करनेवाला अति करूणा मय बताती है. यशायाह 30:18 तौभी यहोवा इसलिये विलम्ब करता है कि तुम पर अनुग्रह करे, और इसलिये ऊंचे उठाये कि तुम पर दया करे। क्योंकि यहोवा न्यायी परमेश्वर है; क्या ही धन्य हैं वे जो उस पर आशा लगाए रहते हैं॥         जैसा को तैसा, आंख के बाद...

आर्य अनार्य

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#आर्य आनार्य. आज से ५,००० वर्ष पूर्व जब भारत के पश्चिमोत्तर-प्रदेश में एक ऐसी सभ्यता थी, जिसमें लोहा गलाना, ईंट के मकान बनवाना, नहर ख़ुदवाना, संगमरमर का काम करना, कला, शिल्प-ज्ञान और शीशे का प्रयोग प्रचलित था, उस समय भारत के अन्य भागों में भी ऐसी सभ्यता रही होगी जो इस सभ्यता से लाभ उठा सकती थी या इसे अपने अधिकार में रख सकती थी। इस १९२३ ई. के आविष्कार की जो सबसे बड़ी महत्ता है, वह यह है कि उस समय भारत में लिपि प्रचलित थी। इससे योरपीय पण्डितों का यह कहना कि भारतवासी ख्रीष्टाब्द से कुछ ही सौ वर्ष पहले लिखना नहीं जानते थे, बिलकुल असत्य और निराधार प्रमाणित हो जाता है। परन्तु एक बात, जो बहुत ही खटकती है, यह है कि यह सभ्यता आर्यों की नहीं, प्रत्युत अनार्यों की है। इस सिद्धान्त का आधार यह है कि यहाँ आविष्कृत पदार्थों में ऐसे चित्रफलक (Pictograms) और लिंग (Phallus) तथा पूर्ण (Complete) एवं अर्द्ध (Partial) समाधियां हैं जो आर्यों की कला से नहीं मिलतीं। ये पदार्थ मेसोपोटेमिया, मिश्र और क्रेट के तत्कालीन सम्बन्ध के द्योतक बताये जाते हैं। हिन्दू-युनिवर्सिटी के इतिहासाध्यापक श्री आर्. डी. बनर्जी, एम...

स्वर्ग पर दयानंद और दयापंथियों का कन्फ्यूजन..

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स्वर्ग नरक कोई स्थान विशेष नहीं है:दयानंद स्वामी या तो दयानंद जी कन्फ्यूजन में थे या आर्षग्रंथ झूठ बता रहे हैं.स्वर्ग नर्क का जिक्र वेदों समेत पुराणों, मनुस्मृति और तमाम पौराणिक ग्रंथों में है. ऐसे में दयानन्द स्वामी का अवैदिक अपूष्ठ संदिग्ध ज्ञान लोगों को भी कन्फ्यूज करता है. अथर्ववेद में भी कहा गया है. स्वर्गा लोका अमृतेन विष्ठा।।(१८/४/४) मने स्वर्ग लोक में अमरत्व प्राप्त हो जाता है. स्वर्गलोका अमृतत्वं भजयंते..कठो० शोकातिगो मोदते स्वर्ग लोके!![कठो०] शोकादि दुखों से पार पाया हुआ मनुष्य स्वर्ग लोक में आनन्द से रहता है. स्वर्गे लोके न भयं किन्चिनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति।। [कठो०] अर्थात स्वर्गलोक को प्राप्त करने वाले को भय तथा बूढ़ापादि नहीं होते. त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यु।। 【कठो०】 यज्ञ,अध्ययन तथा दान करनेवाले जन्ममृत्यु को पार कर लेता है.पुनर्जन्म नहीं होता. यस्मिन् स्वर्गे देवानां पतिरिन्द्र: एक: सर्वानुपरि अधिवसति।।मुण्डको०१-२-५ स्वर्ग लोक में देवों का स्वामी ईन्द्र सर्वोपरि है. #सर्वे_ते_नरकं_यांति_दृष्टवा_कन्यां_रजस्वलाम●● उस रजस्वला को देखकर उसकी माता पिता भाई,मामा और बहन...

स्वर्ग...

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#स्वर्ग●●● स्वर्ग का राज्य एक ज़मींदार के समान है जो सुबह सवेरे अपने अंगूर के बगीचों के लिये मज़दूर लाने को निकला। उसने चाँदी के एक रुपया पर मज़दूर रख कर उन्हें अपने अंगूर के बगीचे में काम करने भेज दिया। “नौ बजे के आसपास ज़मींदार फिर घर से निकला और उसने देखा कि कुछ लोग बाजार में इधर उधर यूँ ही बेकार खड़े हैं। तब उसने उनसे कहा, ‘तुम भी मेरे अंगूर के बगीचे में जाओ, मैं तुम्हें जो कुछ उचित होगा, दूँगा।’ सो वे भी बगीचे में काम करने चले गये। “फिर कोई बारह बजे और दुबारा तीन बजे के आसपास, उसने वैसा ही किया। कोई पाँच बजे वह फिर अपने घर से गया और कुछ लोगों को बाज़ार में इधर उधर खड़े देखा। उसने उनसे पूछा, ‘तुम यहाँ दिन भर बेकार ही क्यों खड़े रहते हो?’ “उन्होंने उससे कहा,‘क्योंकि हमें किसी ने मज़दूरी पर नहीं रखा।’ “उसने उनसे कहा,‘तुम भी मेरे अंगूर के बगीचे में चले जाओ।’ “जब साँझ हूई तो अंगूर के बगीचे के मालिक ने अपने प्रधान कर्मचारी को कहा ‘मज़दूरों को बुलाकर अंतिम मज़दूर से शुरू करके जो पहले लगाये गये थे उन तक सब की मज़दूरी चुका दो।’ “सो वे मज़दूर जो पाँच बजे लगाये थे, आये और उनमें से हर किसी को...

दयापंथी कृप्टो नास्तिक ही हैं...

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#दयापंथी_कृप्टो_नास्तिक_ही_हैं◆◆◆◆ #दयापंथी नास्तिकता फैलाने और ईश्वर के प्रति अनास्था लाने का धीमा डोज दे रहे हैं...     #ईश्वर सबकुछ नहीं कर सकता...  अपने आप को मार नहीं सकता.. अपने जैसा दूसरा ईश्वर नहीं बना सकता!! ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो खुद को मारकर अपने जैसा दूसरा ईश्वर क्यों नहीं बनाता??           ★★हद है ईश्वर खुद को दयापंथियों की शंकाएं मिटाने के लिए खुद को मारे और उन्हें संतुष्ट करने के लिए आत्महत्या करे और अपने जैसा दूसरा ईश्वर भी बनाये!!    ईश्वर खुद को क्यूँ मारे? ईश्वर अपने जैसा दूसरा ईश्वर क्यूं बनाये?  ऐसी नौबत क्यूँ आये? समाजी इसका जवाब दें.         ईश्वर कोई चाबी से चलने वाला खिलौना है ???दयापंथी चाबी घुमायें और वह नाचने लगे!!      #ईश्वर असंभव कार्यों को नहीं कर सकता!!!   ■■■√ दयापंथी ये स्पष्ट करें कि वेद ईश्वर को सर्वशक्तिमान क्यूँ बताता है?    #ईश्वर भक्त की नहीं सुनता बल्कि भक्त ईश्वर के वश में रहना चाहता है!क्यूँ???    ¶¶¶√ईश्वर भक्त की नहीं सुनता तो...

प्रार्थना..

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🌹प्रार्थना🌹 🌸🌸🌸🌸🌸 जीवन की निजी समस्याएं ऐसी होती हैं जिसका हल केवल परम सत्ता के पास हैं दरअसल प्रार्थना वह कली है जो ईमान की पौधे पर अंतिम छोर पर खिलता है. इस पौधे को परोपकार के खाद और प्रेम के जल से सींचना होता है,वरना कली निष्फल मुरझा जायेगी.          प्रार्थना अनन्य भावमुक्त ह्रदय से किया गया ऐसा अंतर्नाद है जिसका ब्यक्ति के अवचेतन मन पर तात्कालिक व सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।          सच्चे और खेदित मन से, श्रद्धा, आस्था व निष्ठापूर्वक की गई प्रार्थना से ब्यक्ति के मन में आत्मविश्वास व इच्छाशक्ति का जागरण होता है. प्रार्थना से अंत: स्थापित ब्यवधान,ब्याधियां,असाध्य रोग,चिंतायें भागने लगती है.          दरअसल प्रार्थना पूजा पाठ का कोई विधी विधान नहीं,धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि नि:स्वार्थ प्रेम,त्याग और समर्पण से अभिभूत होकर सर्व जन हिताय यहां तक की बैरियों के लिए भी  सुख की कामना, याचना के लिए उस सत्ता से तारतम्य स्थापित करने की विशुद्ध भावना है जिस विराट के ईशारे मात्र से प्रलय और रचना संभव है.

विनाश का पुत्र ऐसे समय में प्रकट होगा..

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@विनाश का पुत्र🔯:2 👹👹👹👹👹 यूहन्ना1:1-5आदि में वचन था,और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।यही आदि में परमेश्वर के साथ था।सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ, और जो कुछ उत्पन्न हुआ है उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न नहीं हुई।उसमें जीवन था और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था।ज्योति अंधकार में चमकती है, और अंधकार ने उसे ग्रहण न किया। विनाश का पुत्र(ईश विरोधी) ऐसे बिषम हालातों में प्रकट होगा. जिसका जिक्र मैंने पहले भाग में किया है।उसके प्रकट होने पर संसार के जाति जाति के लोग और भिन्न भिन्न राष्ट्रों के शाशक दोनों हाथ उठाकर उसका स्वागत करेंगे. क्योंकि उन्हें यह विश्वास होगा कि यही वैश्विक अशांति को हरेगा. ईसा ने कहा था"मैं पिता के नाम से आया हूँ और तुम मुझे ग्रहण नहीं करते, यदि कोई और अपने ही नाम से आये त़ो उसे ग्रहण कर लोगे"यूहन्ना5:43 ईसा ने यह कथन इसी संदर्भ में कही थी.                   वह संसार का विनाश करने आयेगा परंतु संसार उसे उद्धारक के रूप में ग्रहण करेगा. जबकि ईसा जगत को बचाने आये. परंतु दुनिया ने उसे ग्रहण नहीं किया। अं...

न्यू एकोनॉमिक ऑर्डर भविष्य वाणी बाईबल की....

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☠विनाश का पुत्र⚛ कड़ी:43 👹👹👹👹👿👿 अंतिम दिनों की पांचवीं बड़ी निशानी या लक्षण "धन संचय'"है।आईए हम इस विषय पर बाईबल के हवाले से गौर करें... आज हम देख रहे हैं लोगों में धन जोड़ने की होड़ सी मची है. बेशर्मी से खुलेआम अनैतिक तौर से धन बटोरा जा रहा है. अखबारों, न्यूज चैनलों में आये दिन भ्रष्टाचार, कमीशन खोरी के खबर आते ही रहते हैं. भ्रष्टाचार निचले स्तर से ऊपर तक इतना व्यापक है कि टेबल के नीचे का लेन देन,रिश्वत हक जैसा आवश्यक हो गया है. भ्रष्टाचार रोकने के लिए नीतियां तो बनती हैं लेकिन इन्हीं नीतियों को ठेंगा दिखा कर अनाप शनाप कमाई करनेवाले जुगाड़ लगा ही लेते हैं. अरबपतियों और करोड़पतियों की सूचियों में बेहताशा वृद्धि होती जा रही है.           आज यह समझने की आवश्यकता है कि क्यों धन बटोरना इतना व्यापक हो गया है. बाईबल बताती है यह अंत के दिनों की निशानी है. धन पर भरोसा, सांसारिक भौतिक सुखों की वस्तुओं पर मन लगाना, विलासिता का जीवन एक दिन लोगों की आत्मिक और शारिरिक दोनों जीवनों में क्षति का कारण होगा. (याकूब 5:1-3) "हे धनवानों सुन तो लो; तुम अपने आने वाले क्लेशों पर चिल्ल...

सत्य-३

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।।सत्य।।              पीलातुस ने प्रश्‍न किया, "सत्य क्या है?" यह प्रश्‍न अभी तक के इतिहास में गूँज रहा है।  पूरी वास्तविकता यह है कि पिलातुस ने दो हज़ार वर्ष पहले सुबह के समय सभी तरह के सत्यों की उत्पत्ति करने वाले के मुँह के ऊपर सीधे ही देखा था। गिरफ्तार होने के कुछ समय के पश्चात् और राज्यपाल के पास लाए जाने से पहले, यीशु ने एक सरल वक्तव्य "मैं सत्य हूँ" (यूहन्ना 14:6) दिया था, जो अपेक्षाकृत एक अविश्‍वसनीय कथन था। कैसे एक साधारण व्यक्ति सत्य हो सकता था? यदि यह नहीं हो सकता था, यदि वह एक मनुष्य से बढ़कर नहीं होता, परन्तु यही तो वह था, जिसका वह दावा कर रहा था। सच्चाई यह है कि यीशु का दावा उस समय वैध ठहरा जब वह मृतकों में से जीवित हो उठा (रोमियों 1:4)।

सत्य-२

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।।सत्य।। गिरफ्तार होने के पश्चात् सत्य को पहले हन्ना नाम के एक व्यक्ति के सामने ले जाया गया, जो यहूदियों का पूर्व में एक भ्रष्ट महायाजक था। हन्ना ने जाँच पड़ताल के समय कई यहूदी व्यवस्थाओं को तोड़ा, जिसमें उनके घर पर ही मुकदमा चलाने, प्रतिवादी के विरूद्ध आत्म-आरोपों को प्रेरित करने और प्रतिवादी को मारने का प्रयास किया जाना इत्यादि सम्मिलित है, जो उस समय कुछ नहीं करने का दोषी था। हन्ना की जाँच के पश्चात्, सत्य को उस समय के शासन करते हुए महाजायक कैफा के सामने ले जाया गया, जो हन्ना का ही दामाद था। कैफा और यहूदी महासभा सन्हेद्रीन के सामने, बहुत से झूठे गवाह सत्य के विरूद्ध गवाही देने के लिए आ खड़े हुए, तथापि, वे कुछ भी प्रमाणित नहीं कर सके और कुछ भी गलत किए जाने के प्रति कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। कैफा ने सत्य पर दोष लगाने के प्रयास में कम से कम सात व्यवस्थाओं को तोड़ दिया :  (1) जाँच पड़ताल को गुप्त में किया गया; (2) इसे रात में किया गया;  (3) इसमें रिश्‍वत का उपयोग किया गया; (4) प्रतिवादी की ओर से अपने बचाव के लिए किसी को बोलने नहीं दिया गया  (5) 2-3 गवाहों की शर्तें प...

सत्य।।

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।। सत्य।।         सत्य और पिलातुस के मध्य में एक बहुत ही दिलचस्प वार्तालाप हुआ। "तब पीलातुस फिर किले के भीतर गया और यीशु को बुलाकर उससे पूछा, 'क्या तू यहूदियों का राजा है?' यीशु ने उत्तर दिया, 'क्या तू यह बात अपनी ओर से कहता है या दूसरों ने मेरे विषय में तुझ से कही?' पीलातुस ने उत्तर दिया, 'क्या मैं यहूदी हूँ? तेरी ही जाति और प्रधान याजकों ने तुझे मेरे हाथ सौंपा। तू ने क्या किया है?' यीशु ने उत्तर दिया, 'मेरा राज्य इस संसार का नहीं; यदि मेरा राज्य इस संसार का होता, तो मेरे सेवक लड़ते कि मैं यहूदियों के हाथ सौंपा न जाता: परन्तु मेरा राज्य यहाँ का नहीं।' पीलातुस ने उस से कहा, 'तो क्या तू राजा है?' यीशु ने उत्तर दिया, 'तू कहता है कि मैं राजा हूँ; मैं ने इसलिये जन्म लिया और इसलिये जगत में आया हूँ कि सत्य पर गवाही दूँ। जो कोई सत्य का है, वह मेरा शब्द सुनता है।' पीलातुस ने उस से कहा, 'सत्य क्या है?'" (यूहन्ना 18:33–38)।

मसीहियत धर्म नहीं क्रांति है..

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🔥 #मसीहियत_धर्म_नहीं_क्रांति_है●●● कुछ क्रांतियां विश्व प्रसिद्ध हैं , जिनमें हथियार,अस्त्रशस्त्र और सेनाओं का जमकर उपयोग हुआ और हज़ारों लोगों का ख़ून बहाया गया.#महाभारत का युद्ध ऐसा ही युद्ध है जिसे #धर्मयुद्ध कहा जाता है.#क्रूसेड जिसे #पवित्रयुद्ध कहा गया है. ईसा मसीह पूरे इतिहास में एक नई क्रांति लेकर आये.इस क्रांति में कोई हताहत नहीं हुआ. यहाँ तलवार नहीं प्यार से युद्ध लड़ा गया. इस क्रांति ने सारी दुनियां को एक नई दिशा दी...नई  राह प्रशस्त किया. इस क्रांति के लिए मसीह को किसी हथियार की ज़रूरत नहीं पड़ी. इस क्रांति यज्ञ में भी खून बहाया गया,ईसा मसीह का कतरा कतरा लहु निचोड़ा गया. इस महान यज्ञ में हव्य ईसा मसीह थे.मसीह ने शैतानी बादशाहत को उखाड़ फ़ेंकने के लिए , सलीबी मौत की राह चुनी? राजनैतिक क्रांति हो , या कि सामाजिक और धार्मिक क्रांति ; क्रांति का मतलब है परिवर्तन. शैतानी राज्य को जड़ से उखाड़ फ़ेंकने के लिए मसीहियों में क्रांति का जज़्बा होना चाहिए. इस क्रांति में दुश्मनों का नहीं,विश्वासियों का खून बहाया जाता है. दुश्मनों से मुहब्बत , इस क्रांति का पहला सिद्धांत हैं. मत्ती 5:44 में लिख...

हथौडा नहीं चाबी बनो

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*हथौड़ा नही चाबी बन जाओ*    *किसी गाँव में एक ताले की दुकान थी,ताले वाला रोजाना अनेकों ताले तोडा  करता और अनेकों चाबियाँ भी बनाया करता था।*    *ताले वाले की दुकान में एक बच्चा भी रोज काम सीखने आया करता था।*    *बच्चा रोज देखा करता कि छोटी सी चाबी इतने मजबूत ताले को भी कितनी आसानी से खोल देती है।*    *एक दिन बच्चे ने ताले वाले से पूछा कि हथौड़ा ज्यादा शक्तिशाली है और हथौड़े के अंदर लोहा भी  ज्यादा है और आकार में भी चाबी से बड़ा है लेकिन फिर भी हथौड़े से ताला तोड़ने में बहुत समय लगता है और इतनी छोटी चाबी बड़ी ही आसानी से मजबूत ताला कैसे खोल देती है* ।   *दूकानदार ने मुस्कुरा के बच्चे से कहा कि हथौड़े से  तुम  ताले पर ऊपर से प्रहार करते हो और उसे तोड़ने की कोशिश करते हो लेकिन चाबी ताले के अंदर तक जाती है, उसके अंतर्मन को छूती है  और घूमकर ताले के अंतर्मन को बिना चोट किए स्पर्श करती है और ताला खुल जाया करता है।*     *प्रेम गहराई और अंतर्मन को तरंगित करता.प्रेम भीतर जाकर तोड़ता है इसके तोड़ने पर आवाज नहीं होता*.   ...

वेद और विज्ञान

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#वेद_और_विज्ञान◆◆◆ दरअसल जिसे वेद समझा गया है वह प्राचीन ऋषियों के निजी साधना अनुभवों, याचनाओं, प्रार्थनाओं, प्रवचनों आयुर्ज्ञानादि का काव्य संकलन मात्र है.हमारे देश के स्वघोष विद्वानों(दयापंथियों)को वेदों के बारे में बड़ी गलतफहमी है। स्वघोष विद्वान ये मानते हैं कि वेद विज्ञान के अक्षय भंडार हैं, परंतु हमें याद रखना चाहिए कि वेद लगभग साढ़े तीन हजार साल पहले की कृतियाँ हैं। इनमें उतना ही ज्ञान है जितना की तत्कालीन मानव समाज ने खोजा था। यदि यह मान भी लें कि वेदों में विज्ञान का अक्षय भंडार समाया हुआ है, तो यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अब तक हम क्या कर रहे थे? तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि अब तक वेदों के जो टीकाकार, भाष्यकार हुए वे सभी अज्ञानी थे!!!  क्योंकि उनको विज्ञान के इस अक्षय भंडार के बारे में पता ही नहीं चला?! उन्होंने वेदों का अध्ययन करके कोई वैज्ञानिक आविष्कार किया ही नहीं? विज्ञान के जिस अक्षय भंडार को स्वयं आदि-शंकराचार्य, यास्क से सायणाचार्य तक के वेदज्ञ, आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे गणितज्ञ-ज्योतिषी नहीं खोज पाए, उसको खोजने का दावा आधुनिक शंकरा...

प्यास●●●

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अगर मैं फिर से कहूँ... प्यास न हो तो कोई पानी क्यूँ पिये?धर्म की प्यास न हो तो नेकी,ईमान धर्म छोड़ दीजिए. अभी नेकी ईमान का वक्त नहीं आया है, अभी जायदाद जोड़ लीजिए, मकान के ऊपर मकान खड़ी कर लीजिए और जलसे, और मजे कर लीजिए.                          ...क्या साथ जायेगा आपके साथ?आपके बटोरे जायदाद?क्या अपने?क्या बेगाने?जिंदगी तो चार दिन की है..सोचिए आगे फिर क्या होगा...अभी जितनी आग लगानी है लगा लीजिए आग पानी में. एक दिन ऐसा वक्त भी आयेगा कि इंसान खून की आँसू रोयेगा. ऐ इंसा संभल..... जरा सी दौलत क्या जोड़ लिया तू मगरूर बन बैठा है. अकड़ कर चलने वाले याद रख एक दिन तू सहारा ढूंढता फिरेगा.          अभी थोड़ा और भटक लीजिए, अभी थोड़ा और दु:ख पा लें.अभी दु:ख को और मांजने दें.अभी दु:ख आपको और निखारेगा. कौन सी जल्दी पड़ी है आपको?अभी तो खेलने, खाने,पीने, कमाने के दिन पड़े हैं. जल्दबाजी क्या है!!?            अभी बाजार में रहें,अभी परमेश्वर की तरफ पीठ रखिये. क्योंकि जब तक आप थकेंगे नहीं, बोझ से लद...

उफ् ये बाजार...

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बाजार... उफ् ये बाजार खरीद फरोख्त भी एक कला ही है, अगर आप इस कला में पारंगत हैं तो आप शमशान का खाक भी बेच सकते हैं। यहाँ सब सबकुछ बिकाऊ है।नैतिकता को छोड़कर।दरअसल उसके खरीददार नहीं मिलते और मिलते भी हैं तो फरेब के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते.इस बाजार में साधु अपनी महानता की बोली लगाते दिख जायेगा. महानता के खरीद फरोख्त में काफी मुनाफा है. जिन लोगों के पास पर्याप्त रोटी नहीं होती वे इसके मंहगे खरीददार होते हैं.महानता की ऊंची ऊंची कीमत यही गरीब अदा कर रहा है जिनके पास ओढ़ने बिछाने को सिर्फ आदर्श ही बचा है.     इस बाजार में नेता, अभिनेता,खबर, नमक, मिर्च, मसाले, आदर्श, विचार, धर्म, कर्म, मर्म,....... सब बिकाऊ हैं. इसके विज्ञापन बकायदा बाजारों में सजते हैं.ईमान तो बाजार इस बाजार में पुरानी चीज है। कहीं राम बिकेंगे तो कहीं रहीम के विज्ञापन सजेंगे. कहीं राधे बाजारों में बिकाऊ हैं कहीं बड़े आदर्शों की निलामी चल रही..यहीं आज ईसा, बुद्ध को भी बिकवाली में.छोड़ रख्खा है. नैतिकता के खरीददार कम हुए. आज इसके बाजार मंदी में हैं.....कौन उबारे??कौन तारे?

मैं आग लगाने आया हूँ...

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🔥आग🔥 येशू ने कहा , मैं आग़ लगाने आया हूं|  मत्ती १०.३४-३५  में लिखा है ---यह ना समझो कि मैं प्रथ्वी पर , मिलाप कराने आया हूं ; मैं मिलाप कराने नहीं , पर तलवार चलवाने आया हूं|मैं तो आया हूं की , इंसान को उसके बाप से , और बेटी को उसकी माँ से और बहू को उसकी सास से अलग कर दूं| येशू ने इन अल्फाज़ों के द्वारा , अपने आने का उद्देश्य , स्पष्ट कर दिया था| ये वैचारिक युद्ध है| अलगाव का सिद्धांत उत्पति से चला आ रहा है| उत्पत्ति १.४ में लिखा है ---पर्मेश्वर ने रौशनी को अच्छा कहा, और उसने रौशनी को अन्धकार से अलग किया| दरअसल  वचन का ज्ञान रखने वाले और इंसानी परम्पराओं को धर्म समझने वाले , साथ नहीं रह सकते| एक वो हैं जो अंधकार में चल रहे हैं , दूसरे वो हैं जो वचन और ईश्वरीय ज्ञान की रौशनी में जीते हैं| वैचारिक तलवार चलनी ही चाहिए| अंधकार को मिटाने के लिए ,जंग ज़रूरी है| लूका १२.४९ में येशू एक बहुत बड़ा दावा करता है –मैं ज़मीन पर आग़ लगाने आया हूं , और क्या चाहता हूं केवल यह कि अभी सुलग जायें | येशू ने , शास्त्रियों,फ़रीसियों,मक्कारों, पाखंडियों,झूठे धर्म गुरुओं और याजकों से समझौता नहीं किया|...

आज का दुख काफी है..

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#आज_के_लिए_आज_ही_का_दुख_काफी_है*◆◆◆     *जीने के तीन आयाम हैं अतीत, भविष्य और वर्तमान. अतीतजीवी "क्यों"में फंसकर दु:ख को न्यौता देता है. भविष्य में जीने वाला संभावनाओं से चिंताग्रस्त होकर डर डरकर जीता है. सुखद जीवन जीने के लिए एक ही आयाम बचता है वर्तमान. वर्तमान में क्यों के लिए जगह नहीं बचता."कैसे" वर्तमान के लिए तात्कालिक योजना है. वर्तमान और भविष्य के चंगुल से निकलकर वर्तमान में जीने की प्रेरणा ली जा सकती है. मां बाप,भाई बहन,दोस्त, शिक्षक, अभिनेता,नेता, बिजनेस मैन हमारे प्रेरणास्रोत हो सकते हैं लेकिन ध्यान रहे अपनी तुलना प्रेरणास्रोतों से न हो.अपनी राह स्वयं बनायें.*             *इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएँगे, और क्या पीएँगे, और न अपने शरीर के लिये कि क्या पहनेंगे, क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं? आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तो भी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनको खिलाता है। क्या तुम उनसे अधिक मूल्य नहीं रखते? तुम में कौन है, ज...

जातिप्रथा घिस जानी चाहिए..

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#वर्ण_व्यवस्था_और_वर्तमान_प्रासंगिकता.●●●◆◆          सवर्ण और बहुसंख्यक जिस वर्ण व्यवस्था पर यकीन करता है वह ना तब था और ना अब  विद्यामान है. जो प्राकृतिक सत्य, मौलिकता एवं नैतिकता के विपरीत है उसे मात्र शास्त्रों में उल्लेखित होने भर से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. वर्ण व्यवस्था को कर्माधारित कहकर डामेज कंट्रोल किया जाता है. यह कर्माधारित है तो इसे #कर्म_व्यवस्था कहो.           समाज में दलितों,आदिवासियों और शूद्रों पर अत्याचार,अन्याय, शोषण तब से होता आया है.बाबा अंबेडकर साहब के कई कटु अनुभव रहे. उनका मानना था कि अंग्रेजी शासन के जुल्म और ज्यादती की तुलना में दलितों और आदिवासियों पर हो रहे अन्याय, अत्यचार और शोसण कई गुना अधिक थे.दलित और आदिवासी असुरक्षा का अनुभव करते थे.            गाँधीजी यदि दलित घर में जन्म लेते और अंबेडकर सवर्ण परिवार में पैदा होते तो गाँधीजी बिलकुल वही करते जो अंबेडकर ने किया और अंबेडकर भी वही करते जो गाँधीजी ने किया.            समाज में प्रचलित वर्ण ...

हत्यारे गोडसे को जिंदा करने कोशिश हो रही है.!!

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       नाथूराम ऐसे आशिक की तरह थे जो अपनी प्रेमिका के चेहरे पर तेजाब फेंक कर अपनी आशिकी बिलख बिलख कर इजहार करते हैं.        महात्मा गांधी की हत्या कर गोडसे कोर्ट में जजों के सामने ऐसे ही बिलखकर इमोशनल ब्लैक मेल करने की कोशिश करते रहे थे. सुना है जज भी रोये.लेकिन कोर्ट के फैसले भावनाओं में बहकर नहीं होते. कोर्ट ने नाथूराम को हत्यारा करार दिया. और फाँसी दी गई.      आपत्ति उनसे है जो  गोडसे की अपराधी मानसिकता और ऐसी ही विचारधारा के वाहक हैं. आपत्ति उनसे है जो हत्या जैसी संगीन अपराधों को "#वध'" कहते हैं. आपत्ति उनसे है जो गोडसे की हत्यारी विचारधारा को कृत्रिम आक्सीजन देकर जीवित रखना चाहते हैं.      माना गोडसे और गांधी के विचार नहीं मिलते थे. ये माना कि मतभेद थे. लेकिन हत्या क्यों?!!!! निहत्थे अहिंसा प्रेमी बुजुर्ग को मारकर कौन सा हल मिला?? हत्या को वध कौन कह रहा है.?            भारत माता के चेहरे पर तेजाब फेंकने वाला,असहिष्णु, धर्म भीरु,हत्यारा नाथूराम देशभक्त कैसे हो सकता है? गोडसे को द...

ईसाइयों का परमेश्वर भेद भाव करता है. किसी को गरीब किसी को अमीर बनाता है.

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#ईसाइयों_का_परमेश्वर_भेदभाव_करता_है●●● कोई धनी है कोई गरीब है. यह पिछले जन्म के पापों का फल है.. यदि यह पिछले जन्म के पापों का फल नहीं है तो अमीर गरीब बनाकर ईसाईयों के परमेश्वर भेदभाव क्यूँ करता है..????         पुनर्जन्म जैसे मिथ्या कयासी अवधारणा को साबित करने के लिए #पूर्वाग्रही सवालों से स्वघोष विद्वता साबित नहीं कर पाओगे..... मालिक को नौकर की और नौकरी के लिए मालिक की जरूरत है. दोनों की जरुरतें एकदूसरे के साथ जुड़ी हैं... नौकरी करने वाला कल पुरुषार्थ से मालिक हो जाता है. और राजा भी अकर्मण्यता से फकीर हो जाता है. यह ईश्वरीय व्यवस्था है जो संतुलन बनाये रखने के लिए जरूरी है. यह ईश्वर का भेदभाव या पिछले कर्मों का फल नहीं है. सोचिये अगर सब मालिक और राजा हो जायें तो क्या होगा??मनन कीजिए यदि सब गरीब हों तो परिस्थितियाँ क्या होगी? निश्चय अव्यवस्था  होगी..पारिस्थितिक असंतुलन होगा.