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Showing posts from July, 2021

दयानंद से पहले सारे भाष्यकार मूर्ख थे??

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#मुण्डे_मुण्डे_मतिर्भिन्ना●●● एक ही वेद मंत्र भी एक और भावार्थ और भाष्य अनेक हो सकते हैं निर्भर करता है भाष्यकार और भावार्थ करनेवाले की मानसिकता पर क्योंकि वेद गेय है कविता है. इसीलिए जितने भाष्यकार उतने भाष्य हैं. अपनी जगह सभी भाष्यकार ठीक हैं. ऊवट,महिधर, सायणाचार्य, मैक्समूलर अपनी जगह ठीक हैं. दयानन्द अपनी जगह ठीक हो सकते हैं.         दयानन्द ने तो नकल भर मारा है. हम सायणाचार्य के भाष्य को ही प्रमाणिक मानते हैं. सायणाचार्य ही एकमात्र ऐसे भाष्यकार थे जिन्होंने संपूर्ण वेद का भाष्य किया. वेदमंत्रों के अर्थ तीन प्रकार से किये जाते हैं-#आधिभौतिक, #आधिदैविक और #आध्यात्मिक. वेदों का भाष्य अति प्राचीन काल से होता आया है. सायणाचार्य के अतिरिक्त किसी भाष्यकार ने चारों वेदों का पूर्ण भाष्य नहीं कर पाया. प्राचीन वेद भाष्यकारों में स्कन्द स्वामी, उद्गीथ, बररूचि,वेंकटमाधव,आत्मानंद, भरतस्वामी आदि का नाम उल्लेखनीय है.  सायणाचार्य के वेद भाष्यों में व्याकरण का भी ध्यान रखा गया है. सायणाचार्य भाष्य के आधार पर ही कुछ भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने वेद भाष्यों की रचना की है. ...

स्लीपिंग पैरालाइसिस..

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#स्लीपिंग_पैरालिसिस या मन का भ्रम.... क्या आपने कभी महसूस किया है कि आधी रात को अचानक आपकी नींद खुलती है. ऐसा लगता है कि आपके आसपास कोई मौजूद है. आप हिलने की कोशिश करते हैं, लेकिन शरीर का कोई अंग हिला नहीं पाते हैं. डर लगता है, चीखना चाहते हैं, लेकिन आवाज ही नहीं निकलती. ऐसा लगता है, जैसे किसी ने आपको कसकर बांध रखा है, आप जकड़े या जमे हुए हैं.ऐसा कभी आपके साथ भी हुआ है। मुझे आज भी याद है जब भी कभी मुझे बुरा सपना आता था तो अचानक मेरा शरीर जाग उठता है। लेकिन मुझे पता लगता की मेरी आंखे नही खुल पा रहीं। मै आवाज लगाने की कोशिश करता कि कोई आकर मुझे उठा दे। हाथ पैर पर शरीर एक लाश की तरह चुप सुन्न पडा होता था। बुरे सपने की वजह से ऐसा लगता की शायद किसी ने मुझे काबू कर रखा है। मै रो जाता था की अब क्या होगा लेकिन मेरी आंखो से आंसू नही निकलते थे। धड़कन तेज हो जाती थी घबराहट होने लगती थी लेकिन मैं 4-5 मिनट बाद उठ जाता था जो महसूस करता है वो अपनी जिन्दगी मे जीने के लिये लड़ रहा होता है खुद से की मै उठूँगा। उसे पता होता है की कोई भी उसे नही उठा सकता। लेकिन मुझे धीरे धीरे इस चीज़ की आदत हो गयी। कभी कभी ऐ...

कौन थे आर्य??

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डामेज कंट्रोल के लिए आर्य शब्द को पदवी कहा गया. दरअसल आर्य कबीले थे.आर्य जाति है पदवी नहीं. स्वयं #दयानंद ने भी इसे जाति ही माना है.#बाल_गंगाधर तिलक जैसे विद्वानों ने भी आर्यों को विदेशी बताया है.               #दयापंथी हिंदुत्व को पाखंड बताकर सिंधु घाटी में जो उनके पूर्वजों द्वारा यहाँ के बाशिंदों के साथ किया वही आज भी करते हैं.     वेदों से इनका कोई सरोकार नहीं ये भड़काऊ ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश लेकर मूलशंकर को राम जी से बड़ा बनाने की फिराक में हैं. वास्तव में टुकड़े टुकड़े गैंग यही दयापंथी हैं. देश में धार्मिक उन्माद फैलाना,महापुरुषों की निंदा, हिंदू देवताओं को नकली नोटों का चलन बताना,ईसाईयत और इस्लाम को कोसना तो इनका पेशा है.           धर्म के नाम पर लड़ना लड़ाना, बाँटना इनका परम धर्म है. अंग्रेजों के बाद यही फूट डालो और राज करो को चरितार्थ कर रहे हैं. नेपथ्य में रहकर ये हिंदू मुस्लिम के बीच कड़वाहट और दंगे के बीज यही दयापंथी बो रहे हैं. बाकी देश के आम हिंदु मुस्लिमों के बीच सद्भाव है,प्रेम है.     पता नहीं इतनी नफ...

सत्यार्थप्रकाश प्रक्षिप्त है..

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#सत्यार्थप्रकाश_भी_प्रक्षिप्त_है ●●●     यह चार पन्ने की पत्रिका थी.धीरे धीरे मोटी हो गई.        दयानंद की मृत्यु के पश्चात उनके तमाम पूर्वाग्रही शागिर्दों ने #सत्यार्थ प्रकाश में दयानंद की शैली नकल कर अपनी दुराग्रह को जोड़ा है. दयानंद की मृत्यु के बाद अग्रवाल बंधुओं का आर्य समाज पर प्रभाव और एकाधिकार होता गया. और ब्रहमणवाद को कुचलने के लिए नीतियां और योजनाएं बनने लगीं.तात्कालिक और वर्तमान घटनाएं लोग जानते हैं. यहीं से आर्यसमाज असहिष्णु, असंयमी और असंसदीय होता गया.समीक्षा के नाम पर महापुरुषों, धर्म शास्त्रों, संप्रदायों पर आक्षेप,विरोध बढ़ता गया. और यह नारा भी बुलंद किया कि"आर्य समाज दौड़ता रहेगा तो हिंदू समाज चलता रहेगा, आर्य समाज चलता रहेगा तो हिंदू समाज बैठ जायेगा और आर्य समाज बैठ जायेगा तो हिंदू समाज सो जायेगा, आर्य समाज सो गया तो हिंदू समाज मर जायेगा"            लाला लाजपतराय और तात्कालिक आर्य समाज पर अग्रवाल बंधुओं का एकाधिकार था.मालवीय आदि के समाज पर विचार उनसे मिलते थे आर्य समाज के प्...

वैदिक कालीन ऋषि कैसे थे??

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वैदिककाल मे ऋषि-मुनि चाहे जितना ही तपस्वी क्यों न थे, पर वे महिलाओं के जाल मे जरूर फंस जाते थे। यानि भले ही वे दावा करते थे कि हमने काम, क्रोध, मोह और लोभ, सब पर विजय पा ली है, पर सुन्दर महिला देखते ही उनका भी लंगोट गीला होने लगता था। एक ऐसी ही कथा रामायण-काल मे घटित हुई है। त्रेतायुग मे एक महाऋषि थे जिनका नाम ऋंग था। ये ऋंग रामजी के बहनोई और दशरथ के जमाता थे। (वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड, सर्ग-9, श्लोक-11 जैसा कि सबको पता ही है कि राजा दशरथ के चार पुत्रों के अलावा एक पुत्री शांता भी थी। (वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग-11/3-5 दशरथ ने अपनी पुत्री शांता को अपने निःसंतान मित्र रोमपाद को दे दिया था! एक बार रोमपाद से कोई पापकर्म हो गया और उनके राज्य मे अकाल पड़ गया। राजा रोमपाद ने अपने तमाम ऋषियों और पुरोहितों को बुलाकर अकाल से निवारण का उपाय पूँछा! तब पुरोहितों ने बताया कि यदि ऋषि ऋंग को आप अपने महल मे बुलाकर उनका सत्कार करें और अपनी पुत्री शांता का वैदिकरीति से उनसे विवाह कर दें, तो आपके राज्य मे वर्षा जरूर होगी। राजा पुरोहितों की बात मानकर तैयार हो गये, पर अब समस्या यह थी कि ऋंगऋषि सदैव वन ...

नियोग क्या है??

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पुराणों मे ऐसे कई प्रकरण मिल जायेंगे जब किसी राजा या अन्य को संतान न होने पर ऋषियों से यज्ञ-हवन करवाने या आशिर्वाद प्राप्त करने से संतानोत्पत्ति हो जाती थी। रामायण काल मे देखा जाये तो राम और उनके चारों भाइयों का जन्म भी ऐसी ही पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाने से हुआ था। महाभारत काल मे तो कर्ण, पाँचों पाण्डव, पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर समेत कई महापुरुष देवताओं या ऋषियों के आशिर्वाद से ही पैदा हुये हैं।                अब हम संतानोत्पत्ति के दूसरे पहलु पर आते हैं। प्राचीनकाल मे सनातनियों मे नियोग प्रथा आम बात थी। पूर्वकाल मे जब किसी महिला को अपने पति से संतान नही पैदा होता था तो वह किसी ऋषि या देवता से नियोग करके संतान पैदा करती थी। आगे चलकर इसी प्रथा को मनु ने धार्मिक नियम बना दिया था। मनु ने मनुस्मृति-9/59 (चित्र-1) मे लिखा है- "देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ् नियुक्तया।   प्रजेप्सिताधिगन्तव्या    सन्तानस्य  परिक्षये।।"                अर्थात- अपने पति और गुरूजनों की आज्ञा से संतान न होने प...

शाप,वरदान और चमत्कार बकवास है??

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पुराणों मे एक बड़े प्रतापी राजा हुये थे, जिन्हे राजा सुदास कहा जाता है। राजा सुदास का वर्णन ऋग्वेद मे भी आया है, और अम्बेडकर ने भी अपनी किताब "शूद्र कौन थे" मे इनका जिक्र किया है। अम्बेडकर ने यहाँ तक लिखा है कि सुदास और पैजवन शूद्र राजा थे और सुदास ने तो ऋग्वेद के कुछ मंत्रों की रचना भी की थी।         सुदास राजा के पुत्र का नाम था सौदास! राजा सौदास की कथा विष्णुपुराण के खण्ड-4, अध्याय-4 मे लिखी है।           एक बार वशिष्ठ जी ने किसी कारण से राजा सौदास को बारह वर्ष के लिये नरभक्षी राक्षस हो जाने का श्राप दे दिया। उनका श्राप तीन दिन मे फलीभूत हुआ और राजा सौदास तीसरे दिन राक्षस हो गये।  राक्षस होने के बाद वे वन मे चले गये और वहाँ विचरण करने वाले मानवों को मारकर खाने लगे। एक दिन उसी वन मे एक ऋषि अपनी पत्नि के साथ सम्भोग कर रहे थे, तभी राक्षसरूपी राजा वही आ धमके। राजा को देखते ही ऋषि और ऋषि-पत्नि अपना कार्यक्रम आधे-अधूरे मे ही छोड़कर जान बचाने के लिये भागे। राजा ने भी उनका पीछा किया और तेजी से झपटकर ऋषि को पकड़ लिया।       अप...

गांधारी के सौ पुत्र...

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#गांधारी_के_सौ_पुत्र.... महाभारत के अनुसार धृतराष्ट्र की पत्नि गांधारी ने सौ पुत्रो को जन्म दिया था, जिन्हे कौरव कहा जाता है! अब सवाल यह उठता है कि क्या कोई महिला अपने जीवनकाल मे सौ बच्चो को जन्म दे सकती है? अगर गांधारी ने प्रत्येक बच्चे नौ महीने के अन्तराल मे पैदा किये तो भी सौ पुत्र पैदा करने मे नौ सौ महीने अर्थात 75 साल लगेगे......एक महिला कम से कम 12 वर्ष की उम्र के बाद ही माँ बनने की क्षमता रखती है तो क्या गांधारी 90 वर्ष की उम्र तक बच्चे पैदा कर रही थी! यह बात ना तो तार्किक और ना ही धार्मिक तौर पर मानने योग्य है! विज्ञान मानता है कि महिला को कम से कम 10 वर्ष की उम्र मे माहवारी शुरू होती है और 50 वर्ष तक सूख जाती है, जब महिला 18 से 35 वर्ष के मध्य होती है तो उसे 5 से 7 दिनो ऋतुकाल रहता है, पर 35 की उम्र पार होते ही 2 से 3 दिन ही रह जाता है! मतलब साफ है कि 40 की उम्र तक ही महिला के गर्भाशय मे अण्डे तैयार होते है, और इसी उम्र तक पैदा हुये बच्चे स्वस्थ और निरोग होते है.....50 वर्ष की उम्र के बाद हार्मोंस क्षीण हो जाते हैं अतः महिला बच्चो को स्तनपान कराने मे भी सक्षम नही रहती! अब गांध...

ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं??

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परमेश्वर का अस्तित्व है या नहीं?हम कैसे यकीन करें कि परमेश्वर हैं और यदि हैं तो इसका क्या प्रमाण है?? परमेश्वर पर यकीन करने के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है केवल दृढ़ विश्वास की आवश्यकता है,                      प्रमाण पत्र की आवश्यकता तब पड़ती है जब कहीं पर संलग्न करना हो या किसी को दिखाना हो, स्वयं के लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं है केवल दो ही चीज हैं या तो मानें अथवा ना मानें .....           बीच में रहने वाला व्यक्ति भ्रमित,अशांत और परेशान रहता है और परमेश्वर के मानने वालों पर आक्षेप कर भड़ास निकालता है.ऐसा मैं नहीं अध्यात्म जगत कहता है और यही इस उत्तर का मूल स्रोत है.....       ईश्वर अनुभूति का विषय है तर्क और प्रमाण का नहीं...    प्रमाण की आवश्यकता क्या है और प्रमाण मिल जाने के बाद आप क्या कदम उठाएंगे ? ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार आपको यह कतई जरूरी नहीं है कि आप यकीन करें, सफलता के नियम कहते हैं जैसा आपको अच्छा लगे वैसा करें चाहे तो ईश्वर को मानें चाहे तो ना मानें क्योंकि जीवन...

नफरत के बदले प्यार..

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नफरत_के_बदले_प्यार ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️ *अगर गड्ढे खोदने वालों के लिए गड्ढे खोदे जायें तो धरती गड्ढों से भर जायेगी, कांटे बिछाने वालों के लिए कांटे बिछाये जायें तो धरती कांटों से पट जायेगी....* *ईसा मसीह उस समय इस धरती पर तशरीफ़ लाये जिस समय छोटी छोटी बातों के लिए घात किया जाता था, जरा सी बात के लिए पत्थर,लठैत, हथियार उठाये जाते थे. एक वाकया याद आता है नगरवधू व्याविचार करते पकड़ी गई. भीड़ उस महिला को ईसा के पास ले आई. परखने के लिए महिला पर पत्थर वाह की मांग करने लगे.ईसा ने कहा"जो निष्पाप हो वही पहला पत्थर चलाये"भीड़ एक एक करके सरकती गई. यहाँ कौन निष्पाप है??लेकिन तौभी हमें दूसरों की खामियां ढूंढने से फुर्सत नहीं. धर्म का दिखावा करके लोग किसे छल रहे हैं?ईसा को यही दिखावा करनेवाले ढोंगी कथित धर्म अगुवे षड्यंत्रों से सूली तक ले आये. लेकिन ईसा ने अपने लिए खुदे गड्ढे को नम्रतापूर्वक पाटने का काम किया, राहों पर बिछे कांटों का ताज अपने सर पर लिया,जलील हुआ पर श्राप नहीं दिया,बर्छे और तलवार के बदले प्यार दिया, दाढ़ी नोची गई और मुंह पर थूका गया. लेकिन हाय और उफ् के बदले माफी दी.*      *आज हम ...

पृथ्वी की आयु निर्धारण पर वैदिक धर्मियों का संदिग्ध ज्ञान..

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स्वामी दयानंद जी ने सृष्टि का आदि 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 52 हज़ार 9 सौ 76 वर्ष पुराना बताया है और मनुस्मृति को सृष्टि के आदि में होना माना है। ये दोनों ही बातें ग़लत हैं। हमारी आकाशगंगा की आयु वैज्ञानिकों के अनुसार 13.2 अरब वर्ष से ज़्यादा है और इससे भी ज़्यादा आयु वाली आकाशगंगाएं सृष्टि में मौजूद हैं। धरती की उम्र भी लगभग 4.54 अरब वर्ष है। वैज्ञानिकों धरती पर 1 अरब वर्ष पहले तक भी किसी मानव सभ्यता का चिन्ह नहीं मिला। देखिए वैज्ञानिक तथ्यों को प्रदर्षित करता एक चित्र, जिसमें वैज्ञानिकों ने दर्शाया गया है कि एक अरब छियानवे करोड़ वर्ष पहले धरती पर मनुष्य नहीं पाया जाता था।   स्वामी जी सृष्टि की उत्पत्ति का काल जानने में भी असफल रहे ‘चारों वेद सृष्टि के आदि में मिले।’ स्वामी जी ने बिना किसी प्रमाण के केवल यह कल्पना ही नहीं की बल्कि उन्होंने ़ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्तिविषयः, पृष्ठ 16 पर यह भी निश्चित कर दिया कि वेदों और जगत की उत्पत्ति को एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष हो चुके हैं। स्वामी जी इस काल गणना को बिल्कुल ठीक बताते हुए कहते हैं- ‘…आर्यों ने एक क्ष...

पुनर्जन्म तथ्य या मिथ्या??

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पुनर्जन्म तथ्य या मिथ्या?? भाग 3 नित नए विचारों का जन्म होता है ना कि आत्मा या शरीर का।      पुनर्जन्म थ्यौरी मिथ्या है सत्य नहीं. पुनर्जन्म से संबंधित तमाम ऐसे वीडियो,ऑडियो सामने आये जो जांच में झूठे साबित हुए हैं. जैसे 1:एक बालक पुनर्जन्म लेकर अपने हत्यारों को पकड़वाया.2:राजस्थान का एक बालक जिसे पिछले जन्म की सारी बातें याद हैं..वगैरह.ऐसे खबर जरूर सुर्खियों में रहे लेकिन अफवाह साबित हुए.         यादाश्त मस्तिष्क में संधारित होता है. व्यक्ति की मृत्यु के बाद मस्तिष्क भी खाक हो जाता है. माना पुनर्जन्म होता है आत्मा नए शरीर में प्रवेश करती है. यहाँ आत्मा का आना और जाना हुआ ना कि पुनर्जन्म. आत्मा जिस शरीर में प्रविष्ट हुई उसमें नया मस्तिष्क, नया ह्रदय और शरीर के तमाम इंद्रियां नई हैं ऐसे में पिछले जन्म की यादाश्त होना कतई संभव नहीं.आत्मा पिछले जन्म में राम पर थी अब रहीम की शरीर पर है. आत्मा पहले कीर्तन करती थी अब कलमा पढ़ती है...इसी संदर्भ में आर्य बंधु से चर्चाओं का हिस्सा प्रस्तुत है.. आर्य: हमारे आसपास जो कुत्ता-सुअर आदि पशु हैं वे नरक का जीवन जी रहे है...

मसीह की दुल्हन बदसूरत हो गई..

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"इसलिए कि तू गुनगुना है, और न ठण्डा है और न गर्म, मैं तुझे अपने मुँह से उगलने पर हूँ" प्रकाशितवाक्य 3:16        आत्मा की यह चेतावनी कलीसियाओं के लिए हैं. रब्बी ईसा ने जिस कलिसिया को अपने लहु से सींचा उस कलीसिया की आज दुर्दशा देख लीजिए. ईसा चाहते थे कि उसकी दुल्हन निष्कलंक, पाक आचरण वाली, झुर्रियां से रहित खूबसूरत और ईश्वर की आज्ञाकारी बनी रहे.          निस्संदेह लदौकिया की कलीसिया के लिए यह संदेश था.लेकिन अफसोस आज की कलिसियायें उससे भी जरजर और तंग होती जा रही हैं. कलिसियायें अगर विश्वास में पुख्ता हो,शैतानी युक्तियों से बची रहे,निष्कलंक सिद्ध हो तो लिखा है"जो जय पाये, उन सभों के लिए एक ईनाम रखा है"...      दुर्भाग्य यह है कि कलिसियायें आज सच्ची कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं, जहाँ आत्मिकता में बढ़ना चाहिए वहाँ सांसारिकता पैठ जमा रही है. सांसारिकता विनाश के दरवाजे खोलती है जो परमेश्वर की दृष्टि में भी मृतप्राय है. कलीसियाओं में नाम के मसीहियों का जमावड़ा है. मसीह की आत्मा कहती है."मैं तुझे उगलने पर हूँ"...बेस्वाद उगला ही जाता है.  ...

ईसा मसीह सृष्टि के पूर्व भी थे.

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आदि में वचन था, वचन परमेश्वर के साथ था. सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ....... भारतीय दर्शन इसी तथ्य को ब्रह्मसूत्र में स्वीकारता है."शब्दात् प्रभवति जगत्, शब्दपूर्विका सृष्टि:"(ब्रह्मसूत्र१.३.२८)अर्थात सृष्टि शब्द से उत्पन्न हुई. सृष्टि के पूर्व केवल शब्द था।।      बाईबल में सृष्टि रचना में तीन शक्तियों का जिक्र है 1:परमात्मा(god)    2:वचन(शब्द, फ्रिक्वेंसी) 3:पवित्र आत्मा(होली स्पिरिट) वचन(frequency)परमात्मा की प्रेरणा से झंकृत होकर सृष्टि का कारक बना.वचन से ही सृष्टि हुई.      सृष्टि के पूर्व वह अंधियारा था,जिससे ज्यादा अंधियारा हो ही नहीं सकता. सृष्टि से पहले वह सन्नाटा था, जिससे बड़े सन्नाटे की कल्पना भी नहीं की जा सकती. इसी सन्नाटे और अंधियारे के बीच वचन प्रेरित हुआ और सृष्टि का धमाका हुआ. अंधियारा चौंधियाया और सन्नाटा भंग हुई.अंधियारे में frequency,वचन शब्द रश्मियां उद्दीप्त हुईं और तमाम सृष्टियाँ हुईं. इसी महान घटना को विज्ञान "बिग बैंग"कहती है.     आज वैज्ञानिक शोधों में यही साफ हो रहा है. शब्द के छोटे रूप फ्रिक्वेंसी और सूक्ष्म...

वो आतंकवादी फादर स्टेन स्वामी..

एक आतंकवादी जो नौ महीने से कस्टडी में था.मगर उससे पूछताछ भी नहीं हुई. अरे भाई पूछें भी तो कैसे पूछें पूछने के लिए कुछ था भी नहीं.    फादर स्टेन स्वामी ने एक रिसर्च जारी किया था जिसमें फर्जी नक्सली, आतंकवादी के केस में आदिवासी, दलितों को फँसाकर जेलों में सड़ाया जा रहा है.        अधिकतर केस आदिवासियों और दलितों पर हैं. जो फर्जी हैं. ये राजनीतिक बंदी हैं. स्टेन स्वामी इन्हीं के हक की आवाज थे.    अफसोस कि उन्हें उसी झूठे केस में फंसाकर उनकी आवाज को खामोश कर दिया गया. https://m.youtube.com/watch?v=qYJKwE801Us&feature=youtu.be

बाईबल में ईश्वर कितने हैं?

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बाईबल में ईश्वरों शब्द का जिक्र है. ईश्वरों शब्द ही बहुवचन हैं. इसका मतलब ये हुआ कि बहुत सारे ईश्वर. आपने सवाल किया है- बाईबल में कई आयतों में ईश्वरों शब्द का जिक्र है. भाषा कोई भी हो अनुवाद में भाव बदल नहीं जाते.हमारे यहां लोकल बोली में आम को टटेख़ा कहते हैं.आपके सवाल- मैं आम खाता हूँ  मैं आमा खाथों हाम अंबा खाउछी. I eat mango.    यहाँ आम के लिए अलग भाषा में अलग अलग शब्द आये हैं.ठीक इसी तरह हिब्रू में ईश्वरों के लिए #אלים शब्द है. अनुवादित बाईबल का रेफरेंस देखो..क्यूँकि ख़ुदावन्द तुम्हारा ख़ुदा इलाहों का इलाह #ख़ुदावन्दों का ख़ुदावन्द है, वह बुज़ुर्गवार और क़ादिर और मुहीब ख़ुदा है, जो रूरि'आयत नहीं करता और न रिश्वत लेता है।  इस्त 10:17  परमेश्वर दिव्य सभा में खड़ा है: वह #ईश्वरों के बीच में न्याय करता है। भजन संहिता 82:1 जो ईश्वरों का परमेश्वर है, उसका धन्यवाद करो, उसकी करुणा सदा की है। भजन संहिता 136:2 हिब्रू में देखो...כי יהוה אלוהיך הוא אותו אלוהים ואלוהי האדונים, האל הגדול והירא הגדול, שאינו מעדיף איש ואינו לוקח שוחד. (מעשי השליחים 10:34, רומ '2:11, גל 2: 6,...

दयानंद का जन्मस्थान कहाँ है?

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स्वामी दयानन्द जी का जन्म स्थान अज्ञात है...      स्वामी जी ने स्वकथित जीवनचरित्र में संवत् 1881 विक्रमी में गुजरात के मोरवी नगर में औदीच्य ब्राह्यण परिवार में अपना जन्म होना बताया है। स्वामी श्रद्धानन्द जी की पुस्तक ‘आर्यपथिक लेखराम’ पृष्ठ 80 से ज्ञात होता है कि लेखराम जैसे श्रद्धालुओं ने सन 1892 ई. में मोरवी नगर के साथ टंकारा में भी स्वयं जाकर ढूंढा लेकिन वे उनका कुल तो क्या, जन्मस्थान तक न ढूंढ पाए। उन्होंने किस जाति में और कहां जन्म लिया?, इसे कोई नहीं जानता। वास्तव में उनका जन्म स्थान आज तक अज्ञात है। दयानद था या मिस्टर इंडिया!??

अगले जन्म में●●●

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अगले_जन्म_में◆◆◆ एक बार क्या हुआ कि एक चमार काला काशी बनारस पहुँचा था.वह सनातन संस्कृति की बाहरी रीति रिवाज को देखते हुए काशी के एक ब्राह्मण से प्रार्थना की कि वह ब्राह्मण बनना चाहता है.इसके लिए उसे क्या करना होगा??क्योंकि वह ब्राह्मण की उच्चता को समझ चुका था.उसकी सनातन धर्म में बड़ी श्रद्धा थी.वह सनातन धर्म का सच्चा सिपाही भी था.पर वो ब्राह्मण बनना चाहता था. ब्राह्मण देवता ने कहा..तुम्हें सौ यज्ञ कराने होंगे, ब्रह्म भोज और ब्राह्मणों को गौ स्वर्ण दान करने होंगे..घर बार सब दान करने होंगे. इतना सुनकर चमार बोला...फिर मैं ब्राह्मण तो बन जाऊँगा ना!?? ब्राह्मण ने कहा इतना सब कुछ करने के बाद तू ब्राह्मण तो बन जायेगा लेकिन इस जन्म में नहीं अगले जन्म में.एक काम करो अब जाओ और गंगा में यह इच्छा धर कर कि अगले जन्म में मेरा ब्राह्मण कुल में जन्म हो कूदकर जान दे दो...... अगले जन्म में तुम्हारा जन्म ब्राह्मण कुल में अवश्य होगा. सवाल नं. १:जाति और कुल में क्या भेद है? २:चमार ब्राह्मण हो सकता है? ३:कर्म से यदि चमार ब्राह्मण हो सकता तो जन्म से ब्राह्मण परिवार से रोटी बेटी का संबंध रख सकत...

अहंकार...

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#अहंकार.. नाश होने से पहले मनुष्य के मन में घमण्ड, और महिमा पाने से पहले नम्रता होती है।नीतिवचन 18:12 अहंकार हमारे कंधों पर बैठे शैतान की तरह है. यह हमारे कंधों पर बैठकर हमारा ही विरोधी है. यह हमारी तमाम असुरक्षा, भय,घृणा, गलत धारणा और बुराईयों को पालता पोसता है. यही हमारी नायकत्व का सबसे बड़ा दुश्मन है. यही हमें नाश के अंधेरे रास्ते की ओर धकेलता है, यही हमारे प्रकाश के लिए अंधेरा है. अहंकार दरअसल एक अपरिपक्व, हाथपैर मारनेवाला, रोने और तेज चिल्लाने वाला बच्चा है. यह हम सभी के पास है... इससे निजात पाने का उपाय क्या हो सकता है??? निश्चय वह उपाय #नम्रता है. क्योंकि नाश होने से पहले मनुष्य के मन में घमण्ड, और महिमा पाने से पहले नम्रता होती है। शरीर के काम तो प्रगट हैं, अर्थात् व्यभिचार, गंदे काम, लुचपन, मूर्ति पूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध, फूट, विधर्म, डाह, मतवालापन, लीलाक्रीड़ा, और इनके जैसे और-और काम हैं, इनके विषय में मैं तुम को पहले से कह देता हूँ जैसा पहले कह भी चुका हूँ, कि ऐसे-ऐसे काम करनेवाले परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे। पर आत्मा का फल...

चुटिया नागपुर

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यदि किसी नगर, स्थल, पठार, पहाड़ आदि का प्राचीन नाम आप बदल रहे होते हैं तो समझिए कि इतिहास के एक प्रकार के पुरावशेषों को आप नष्ट-भ्रष्ट कर रहे होते हैं। ब्रिटिश काल में छोटा नागपुर ( झारखंड ) को चुटिया नागपुर कहा जाता था। आपने चुटिया नागपुर को छोटा नागपुर में बदल दिया। ऐसे में इसका इतिहास बिगड़ गया। चुटिया नागपुर को चुटु नागवंशियों ने बसाया। पूर्व में ये लोग कर्नाटक में शासन करते थे। प्रथम सदी से आगे कम से कम दो सौ साल से अधिक वहाँ इनका शासन रहा। फिर माइग्रेट किए। चुटु नागवंश के शासक बौद्ध थे। इनके अधिकांश सिक्के शीशे के बने हैं। सिक्कों पर चाप वाला स्तूप है, बोधिवृक्ष है, त्रिरत्न है। तस्वीर में देखिए।

सत्यार्थप्रकाश की सच्चाई और दयापंथी

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#सत्यार्थप्रकाश ■■ ✳✳✳✳✳ निंदा निंदनीय है, आलोचना आईना है निंदा दंभ लाती है और आलोचना निखार लाती है।     यूं तो "सत्यार्थ प्रकाश" को धर्मसमीक्षा किताब का नाम दिया गया है,लेकिन इसी की समीक्षा की जाये तो यह एक एक अलहड़ी भाषा प्रयोग की विरोध/निंदा कृति मात्र जान पड़ता है जहाँ ब्याधिन्ह दिमाग के विचारों को बलात् सत्य मनवाने का प्रपोजल है। समीक्षा के नाम पर यहाँ अर्थ का अनर्थ और विघटनकारी विष परोसी गई है, खुद के ब्यक्तिगत विचारों को अंतिम सत्य कहने के चक्कर में विचारक अपनी दंभी और कुत्सित मानसिकता को असंयमी भाषा में लिपीबद्ध नवाचार करने हेतु प्रयोग करता नजर आयेगा. इस पुस्तक को न समीक्षा मानी जा सकती है न आलोचना कहा जा सकता है.            आलोचना इस बात का अन्वेषण है कि सत्य क्या है, सत्य कैसा है?आलोचना बहुत कठोर हो सकती है क्योंकि कभी कभी असत्य को काटने के लिए कृपाण का उपयोग होता है असत्य की चट्टानों को तोड़ने के लिए सत्य के हथौड़े और छैनियां बनानी पड़ती है।                 लेकिन यहां तो छैनियां ही भोत्थर और हथौड़े ही ...

सत्य और दयानन्द

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#जो_जैसा_है_उसे_ठीक_वैसा_ही_कहना_सत्य_है●●● फिर दयानन्द और दयापंथी संदिग्धज्ञान को ही अंतिम सत्य क्यूँ प्रचारते हैं?? " जिस समय मैने यह ग्रन्थ बनाया था उस समय और उससे पूर्व संस्कॄत भाषण करने ,पठन,पाठन में संस्कॄत ही बोलने और जन्मभूमि की भाषा गुजराती होने के कारण मुझको इस भाषा का विशेष ज्ञान नही था ." _ स्वामी दयानन्द (द्वितीय संस्करण) यहाँ यह बात स्पष्ट है कि स्वामीजी को हिंदी का समुचित ज्ञान नही था , जिस समुचित दो भाषा का ज्ञान स्वामीजी को था उनमें गुजराती और क्षेत्रीय भाषा थी और संस्कॄत आम बोलचाल की भाषा नहीं थी. यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि स्वामीजी ने \"सत्यार्थ प्रकाश \" से पहले हिंदू,जैन, बौद्ध , ईसाई आदि धर्मों की पुस्तकों का अध्ययन किया तो वह किस भाषा में किया ...?? यहां यह भी विचारणीय है कि किसी नई भाषा सीखने वाला व्यक्ति साहित्यिक दृष्टी से संभल कर बोलेगा और लिखेगा न कि उस भाषा की गाली गलौच और अभीष्ट शब्द सीखेगा ..!!! किसी विद्वान और धार्मिक व्यक्ति की भाषा कभी मर्यादाहीन ,अहंकार पूर्ण और विद्वेष पूर्ण नही होती . \"सत्यार्थ प्रकाश\" को प...

आप कमजोर नहीं हैं..

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आप कमजोर नहीं हो... """""'''''''''''''''''''''''''''"""""""'''''"""'''''''''''''''''''' बुराई का देवता शक्तिशाली नहीं है, आप दुर्बल हो. जरा गौर करें एक दफा अपने अंदर झांक लीजिए... अंधेरा कितना घना है तब आप टटोल पायेंगे कि आपकी आत्मा किसी बियाबान के  खोह में पड़े पंछी नाई हूक रही है.स्मरण रखिए बुराई का देवता(शैतान)वाकई इतना शक्तिशाली नहीं है जितना आप समझते आ रहे हैं..... ये जान लीजिए कि सांप का फन कुचला जा चुका है बस पूंछ छटपटा रही है.अगर आप पाप में गिरते हैं तो इसमें शैतान का दोष नहीं है. आप गिरे हो अपनी दुर्बलताओं के कारण.जैसे सूखे जड़ वाला वृक्ष आंधियों में गिर जाता है. आंधी न भी आता तो उसे गिरना ही था. आंधी तो बहाना हुआ.आंधी न भी आये तो ये दरख्त अपनी दुर्बलताओं के कारण गिर जायेंगे. आज देखने की बारी आपकी है ...

ईसा मसीह का अधिकार..

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मत्ती 28:18 में प्रभु अपने शिष्यों से कहते हैं, “मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है”। क्या हम इस सत्य पर विश्वास करते हैं? क्या मैं विश्वास करता हूँ कि सभी लोगों, परिस्थितियों, घटनाओं तथा जगहों पर येसू का पूरा-पूरा अधिकार है। येसु का मौसम, प्रकृति, बीमारी और अशुद्ध आत्मा पर भी अधिकार हैं? प्रभु येसु अधिकार के साथ बोलते थे। मत्ती 7:28-29 में हम पढ़ते हैं, “जब ईसा का यह उपदेश समाप्त हुआ, तो लोग उनकी शिक्षा पर आश्चर्यचकित थे; क्योंकि वे उनके शास्त्रियों की तरह नहीं बल्कि अधिकार के साथ शिक्षा देते थे।” मारकुस 1:22 में भी इसी बात पर जोर दिया गया है। संत मारकुस 2:1-12 में हम देखते हैं कि जब कुछ लोगों ने विश्वास के साथ एक अर्धांग रोगी को एक चारपाई पर लिटा कर छत खोल कर येसु के सामने उतारा, तब येसु ने अर्धांगरोगी से कहा, “बेटा! तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं”। यह सुनकर वहाँ खडे शास्त्री सोचने लगते हैं कि यह ईश-निन्दा करता है। ईश्वर के सिवा कौन पाप क्षमा कर सकता है? इस पर प्रभु शास्त्रियों से प्रश्न करते हैं, “अधिक सहज क्या है- अर्धांगरोगी से यह कहना, ’तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं’,...

दानिएल नबी का अजीबोगरीब स्वप्न..

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दानियेल की अजीबोगरीब स्वप्न मूर्ति को लेकर की गई भविष्यवाणियां और सिकंदर महान.... सामान्य युग पूर्व 336 में जब सिकंदर III सिर्फ 20 साल का था तब वह मकिदुनिया की राजगद्दी पर बैठा। वह पूरी दुनिया पर फतह पाना चाहता था और अपनी इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए वह अपनी फौजों को लेकर दुनिया जीतने निकल पड़ा। युद्धों में बेमिसाल महारथ दिखाने की वज़ह से उसे सिकंदर महान कहा जाने लगा। वह एक के बाद एक जंग जीतकर फारस के साम्राज्य में घुसता चला गया। जब उसने सा.यु.पू. 331 में दारा III को गौगमेला में हराया, तब से फारस का साम्राज्य खत्म होना शुरू हो गया और सिकंदर ने यूनान (ग्रीस) को नई विश्‍वशक्‍ति बना दिया।  गौगमेला की जंग जीतने के बाद सिकंदर ने फारस की चारों राजधानियों को यानी बाबुल, शूशन, (सूसा) पर्सेपोलिस, और अहमता (इकबाताना) को जीत लिया। फारस के बाकी साम्राज्य को अपने कब्ज़े में लेने के बाद वह हिन्दुस्तान की तरफ बढ़ चला। जहाँ-जहाँ वह जीतता गया वहाँ-वहाँ यूनानी उपनिवेश बसते गए। इस तरह यूनान (ग्रीस) की भाषा और संस्कृति दुनिया-जहान में फैल गयी। दरअसल यूनान से पहले कोई भी साम्राज्य इतना नहीं फैला था। ठीक ...

वैदिक धर्म क्या कहता है??

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वेदों में कहा गया है कि नास्तिकों से रहो। शूद्रों से दूर रहो। मलेच्छों से दूर रहो। विधर्मियों से दूर रहो। दयापंथियों के स्वामी ने भी कहा है चण्डाल घिन्न बसाते हैं   चमारों के साथ मत रहो.  व्यक्ति यदि चमड़े का कार्य करने के पश्चात नहा धोकर जनैऊ टीका इत्यादि लगाकर दयाजी के पास आते तो क्या वे उन्हें गले लगा लेते। ऐसा कहीं उनका कथन है??? इस्लाम इशाईयत बौद्ध सिख आदि के प्रवर्तकों ने कहा नास्तिकों को समझाओ, शूद्रों को गले लगाओ, गरीबों की मदद करो, अशिक्षितों को शिक्षित करो। विधर्मियों को धर्म के मार्ग पर लाने का यत्न करो। तो आज के आर्यनमाजी दयापंथी वेद का उल्लंघन कर किस मुँह से दलितों पिछड़ों आदिवासियों के बीच जाना चाहते हैं??? इशाईयत इस्लाम बौद्ध सबका दुनिया में बिस्तार हुआ और दैनंदिन बिस्तार होता जा रहा है। लेकिन वैदिक विलुप्त हो गए।इसके लिए क्यों रोना रोते हैं??दूर रहो दूर रहो दूर रहो....का वैदिक मंत्र ही तो जिम्मेवार हैं इनके संपूर्ण समाज से कट जाने का। समस्त छुआछूत जातपांत ऊँचनीच का फर्मूला इसी वैदिक सूत्र में है। आगे व्यास स्मृति में इन्हीं वैदिक सूत्रों को बिस्त...

दयापंथियों को विवेकानंद चुभते हैं.

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 इतने बड़े धर्म धुरंधर दुनिया भर में धर्म ध्वजा फहराने वाले विवेकानंद के खिलाफ #दयापंथी इसलिए हैं क्योंकि ये शूद्र हैं।उन्हें जीते जी मनुवादियों ने काफी परेशान किया था।       शूद्र भी कर्म से ब्राह्मण बन सकता है और ब्राह्मण भी शूद्र हो सकता है. यह कह देना आसान है. यह स्टंट ही है.                     दलितों शूद्रों, आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अत्याचार और ऊँच नीच पर ये कथित #आर्य सामने आकर दलितों का पक्ष क्यों नहीं लेते. उन मंदिरों से जहाँ प्रवेश द्वार पर ही शूद्रों का प्रवेश वर्जित लिखे नोटिसों को क्यों नहीं हटवाते.       जिन्हें दलितों की लंबी मूँछें चूभती है उनका इलाज क्यों नहीं करते.!? दलित के घोड़ी पर बारात निकलने से जिन्हें पीड़ा होती है वहाँ दर्द निवारक औषधि क्यों नहीं पहुँचाते??       आये दिन अखबारों के हेडलाइनों पर दलितों आदिवासियों, पिछड़ों पर भेदभाव और अत्याचार की खबरें क्यों आते हैं.                 दरअसल दयापंथी कुनबा वही पुराना कुनबा है ज...

आखिर औरत चाहती क्या है??

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#स्त्री_आखिर_चाहती_क्या_है??? “पुराने समय की बात है। एक विद्वान को फांसी लगनी थी। राजा ने कहाः बताओ कि आखिर औरत चाहती क्या है? जान बख्श देंगे, यदि सही उत्तर मिल जाये। विद्वान ने कहाः हुजूर, मोहलत मिले तो पता कर के बता सकता हूँ। एक साल की मोहलत मिल गई। बहुत घूमा, कहीं से भी संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। आखिर में किसी ने कहा कि दूर एक चुड़ैल रहती है, वही बता सकती है। चुड़ैल ने कहा कि एक शर्त है। यदि तुम मुझसे शादी कर लो तो जवाब बताउंगी। उसने सोच-विचार किया। जान बचाने के लिए शादी की सहमति दे दी। शादी होने के बाद चुड़ैल ने कहाः चूंकि तुमने मेरी बात मान ली है, तो मैंने तुम्हें खुश करने के लिए फैसला किया है कि 12 घंटे मैं चुड़ैल और 12 घन्टे खूबसूरत परी बनके रहूंगी। अब तुम ये बताओ कि दिन में चुड़ैल रहूँ या रात को? विद्वान वाकई में बुद्धिमान था। उसने सोचा यदि वह दिन में चुड़ैल हुई तो दिन नहीं कटेगा, रात में हुई तो रात नहीं कटेगी। अंततः वह बोलाः जब तुम्हारा दिल करे परी बन जाना, जब दिल करे चुड़ैल बन जाना। यह बात सुनकर चुड़ैल ने प्रसन्न होकर कहाः चूंकि तुमने मुझे अपनी मर्ज़ी से जीने की छूट दी है, इसलिये मैं 2...

बाईबल में औरतों का महत्व..

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#बाइबिल_में_औरत_का_दर्ज़ा ............................... अगर आदम का अकेला रहना खुदा को भाया होता तो खुदा ने कभी हव्वा को ना बनाया होता अगर रखना होता हव्वा को कमतर आदम से तो उसने हव्वा को आदम की पसली से नहीं पाँव के अँगूठे से बनाया होता अगर देना ना होता इज़्ज़्त का दर्ज़ा औरत को तो सारा को बुढ़ापे में माँ ना बनाया होता अगर भरना ना होता रूह-ए-पाक से औरत को तो खुदा का बेटा मरियम के हरम में ना समाया होता अगर होता ना पाक रिश्तों का शाफी तो पतरस की सास का बुखार ना भगाया होता अगर माफी होती जागीर सिर्फ मर्दो की तो गुनाहगार औरत को पत्थराव से ना बचाया होता अगर देनी होती दोज़ख़ की आग औरत को तो सामरी औरत को ज़िंदगी का पानी ना पिलाया होता अगर पैदा होकर बेटी बोझ होती माँ बाप पर तो मुर्दा लड़की को यीशु मसीह ने ना जिलाया होता अगर होती पाबंदी आशा पर तिलावते कलाम की तो जी उठने का पहला पैगाम औरतों ने ना पहुंचाया होता.! *सभी महिलाओं को समर्पित*

बाईबल क्या है?

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बाइबल एक इतिहास की पुस्तक है.यह मनोविज्ञान आधारित पाठ्य पुस्तक, या एक विज्ञान आधारित लेख नहीं है। बाइबल परमेश्वर के द्वारा अपने विषय में दिया हुआ ऐसा विवरण है कि वह कौन है? और मानवजाति के लिए उसकी क्या योजनाएँ और परियोजनायें हैं। इस प्रकाशन का विशेष भाग यह है कि पाप के कारण इंसान परमेश्वर से अलग कैसे हो गया.. और पाप से इंसान और परमेश्वर के बीच उत्पन्न खाई को पाटने के लिए ईसा मसीह के क्रूस पर बलिदान के द्वारा संगति को पुन: स्थापित करने के समाधान की दास्तान है। गुनाहों से तौबा करने के लिए हमारी आवश्यकता कभी नहीं बदलती है। और न ही परमेश्वर की अपने साथ हमारा मेल करने की इच्छा कभी बदलती है।  बाइबल में बहुत बड़ी मात्रा में शुद्ध और प्रासंगिक जानकारियाँ हैं। बाइबल का सबसे महत्वपूर्ण संदेश  #छुटकारे – का है जो कि विश्वव्यापी और चिरस्थाई रूप से मानव जाति के ऊपर लागू होता है। परमेश्वर का वचन कभी भी पुराना या अप्रचलित नहीं होता है, न इसका स्थान कोई और चीज ले सकती है और न ही इसे अधिक उन्नत बनाया जा सकता है। सस्कृतियाँ बदलती है, व्यवस्थाएँ या कानून बदलते हैं, पीढियाँ आती और जाती रहती है, प...

अहंकार

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#अहंकार●●●  अनगिनत पापों को जन्म देने वाला अहंकार आत्म प्रशंसा के बीज से उत्पन्न होता है.खुद को सर्वोच्च, श्रेष्ठ मान लेने का भाव यहीं से पैदा होता है. ऐसी स्थिति में ब्यक्ति निंदा, विरोध, दुराग्रह में बड़ा रस लेता है. घृणा, द्वेष, क्रोध, प्रतिशोध, गलौच,अशांति आदि मनोविकारों से वह पीड़ित होता है.       इन मानस रोगों का नाश करनेवाली औषधियाँ दया,क्षमा, करुणा, प्रेम,धैर्य, नम्रता, आनंद,भलाई, शांति आदि हैं. इनसे अहंकारी वंचित होता है. अहंकार हमारी पर्सनैलिटी को उसी प्रकार धुँधला किये रहता है जैसे धधकते अंगारों पर जमी राख की परत होती है. अहंकार तुच्छ प्रकार की मनुष्यता है. अहंकार सदैव दूसरों की कमजोरी एवं बुराई को ही देखता है. यह हमेशा दूसरों को नीचा दिखाने की कोशिश करता है. अहंकारी हमेशा दूसरों को नीचे गिराकर आगे बढ़ने की सोचता है.. जब कभी वह ऊंचाई पर पहुँचता है उसका दंभ भी शिखर पर होता है. ऐसे में वह भूल जाता है कि एक दिन उसका पतन भी होगा और वह नीचे गिरेगा... तब उसका साथ देने वाला कोई नहीं होगा.

विनाश का पुत्र(Anti Christ)

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#विनाश_का_पुत्र◆◆◆ 👹👹👹👹👹 विनाश का पुत्र वह है जो मसीह का विरोध, निंदा करता है।उसका आना इस संसार में तय है।इसकी भविष्यवाणी परमेश्वर के खास जन और स्वयं ईसा ने की है.            आज मसीह विरोधी मुखर हैं. ठट्ठा करने वालों की भरमार है. झूठे शिक्षकों की फौज है जो दिन रात बाईबल की शिक्षाओं के विपरीत भरमा रहे हैं.अंत के दिन अधर्म का नाश करने परमेश्वर हाथ बढ़ायेगा. शैतानी ताकत भी अधर्मियों और ईश विरोधी तत्वों को बल देगा कि वे दुनिया पर राज करें।(प्रका.वाक्य13:2)       उस समय दुनिया तमाम समस्याओं से जूझ रहा होगा, सारी ब्यवस्था, कानून और प्रशासनिक अमले अराजक हो जायेंगे, अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी होगी, आम लोगों का जीना दूभर हो जायेगा, समाज में अशांति, अनैतिकता, अपराध बढ़ जायेंगे, खाद्यान्नों की कमी हो जायेगी, ब्यापार और ब्यवसाय के अवसर कम हो जायेंगे, इंसान के काम मशीनें करेंगी. ऐसी विषम परिस्थितियों में शक्तिशाली राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्ष भी झल्लाकर कहेंगे"यदि शैतान भी आकर हमें इस विश्वब्यापी समस्याओं से,अराजकता से बचाता है तो वह भी हमें स्वीकार्य होगा...

सत्यार्थ प्रकाश क्या है??

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सत्यार्थ प्रकाश ✳✳✳✳✳ निंदा निंदनीय है, आलोचना आईना है निंदा दंभ लाती है और आलोचना निखार लाती है।     यूं तो "सत्यार्थ प्रकाश" को धर्मसमीक्षा किताब का नाम दिया गया है,लेकिन इसी की समीक्षा की जाये तो यह एक एक अलहड़ी भाषा प्रयोग की विरोध/निंदा कृति मात्र जान पड़ता है जहाँ ब्याधिन्ह दिमाग के विचारों को बलात् सत्य मनवाने का प्रपोजल है। समीक्षा के नाम पर यहाँ अर्थ का अनर्थ और विघटनकारी विष परोसी गई है, खुद के ब्यक्तिगत विचारों को अंतिम सत्य कहने के चक्कर में विचारक अपनी दंभी और कुत्सित मानसिकता को असंयमी भाषा में लिपीबद्ध नवाचार करने हेतु प्रयोग करता नजर आयेगा. इस पुस्तक को न समीक्षा मानी जा सकती है न आलोचना कहा जा सकता है.            आलोचना इस बात का अन्वेषण है कि सत्य क्या है, सत्य कैसा है?आलोचना बहुत कठोर हो सकती है क्योंकि कभी कभी असत्य को काटने के लिए कृपाण का उपयोग होता है असत्य की चट्टानों को तोड़ने के लिए सत्य के हथौड़े और छैनियां बनानी पड़ती है।                 लेकिन यहां तो छैनियां ही भोत्थर और हथौड़े ही कमज...

दयानन्द का संदिग्ध ज्ञान..

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#स्वामी_दयानंद_संदिग्ध_ज्ञान.. पुनर्विवाह, पुनर्निर्माण, पुनर्जागरण, पुनर्वास ठीक वैसे ही #पुनर्जन्म है. चतुर्थ समुल्लास में स्वामी दयानंद ने मनुस्मृति के कुछ श्लोकों द्वारा परलोक के सुख हेतु कुछ उपाय बताए हैं. यहाँ स्वामी जी ने परलोक और पुनर्जन्म दोनों को एक ही अर्थ में लिया है. मनुस्मृति के जो श्लोक उन्होंने उध्दृत किये हैं वे परलोक की सफलता पर केंद्रित हैं न कि आवागमनीय #पुनर्जन्म पर.... इस प्रकार गहन अध्ययन से स्वामी जी की धारणाओं और तथ्यों में प्रचुर विरोधाभास है. ऐसा प्रतीक होता है कि वेद विषयों पर स्वामी जी की जानकारी संदिग्ध थी.यही वजह है कि दयानंद जी की वेद भाष्यों पर भी संदेह होता है. दयानंद जी ने सायणाचार्य और महिधर मैक्समूलर के भाष्यों की ही नकल कर उसमें अपने निजी विचारों की मिलावट करी है.एक दर्जी जिस तरह अपने हिसाब से कपड़ों की कांटछांट करता है ठीक उसी तरह दयानंद जी भी वेदों के साथ किया है. उनकी भाष्यों में शब्दार्थ और भावार्थों में समानता नहीं है.

पुनर्जन्म का सच??

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#पुनर्जन्म_मिथ्या_या_सत्य??? मेरा नाम रजनीश है। अब इसका मतलब यह हुआ कि मेरे भीतर इस वक्त जो आत्मा है, वह पहले किसी राकेश, सुरेश सा प्रकाश के शरीर में रही होगी। या हो सकता है कि किसी गधे, शेर अथवा हाथी के शरीर में। यानी की यह आत्मा इस समय मेरे शरीर में अस्थायी तौर पर निवास कर रही है। यहाँ पर मुख्य सवाल यह कि मैं क्या हूँ? क्या मैं आत्मा हूँ? या फिर मैं शरीर हूँ? जाहिर सी बात है मेरी पहचान मेरे शरीर से ही है, इसलिए मैं का मतलब मेरा शरीर भर है। अब मान लीजिए मेरा देहान्त हो जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि मेरा शरीर मर गया। क्योंकि आत्मा कभी मरती नहीं, वह अजर अमर है। मान लेते हैं कि मेरे मर जाने के बाद आत्मा जिस शरीर में प्रवेश पाती है, उस शरीर के माँ-बाप उसका नाम राजेश रखते हैं। तो अब यह बताइए कि क्या राजेश के रूप में वह रजनीश का पुनर्जन्म होगा? यदि ऐसा है तब तो फिर प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी का पुनर्जन्म होता है। लेकिन अगर ऐसा होता, तब तो हर व्यक्ति अपने पिछले जन्म के बारे में दावा करता घूमता। जबकि ऐसा नहीं होता है। ऐसा दावा कभी साल दो साल में कहीं एक व्यक्ति कर देता है। अब आप ही सोचिए कि ...

तुम वेटिकन के गुलाम हो..

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#तुम_काले_अंग्रेज_हो!! #तुम_गद्दार_हो. #तुम_वेटिकन_के_गुलाम_हो. ईसा मसीह के अनुयायी बनने से कोई वेटिकन का गुलाम कैसे हो जाता है!?वेटिकन की खिलाफत सबसे अधिक इशाइ महापुरुषों ने ही किया है.हम भी कई मौकों पर पादरियों की गलत नीतियों और विचारों की मजम्मत करते आये हैं. देश क्या है??? बर्मा जापान इंडोनेशिया बुद्धिस्ट देश हैं क्या वे भारत के गुलाम हैं या नेपाल के गुलाम हैं???पाकिस्तान अफगानिस्तान क्या अरब के गुलाम हैं???         बेबुनियाद आरोप लगाकर दयापंथी अपनी खाज मिटाते हैं. धर्म परिवर्तन का आरोप भी गलत है.  #धर्म_परिवर्तनीय_नहीं_है.. लेकिन चलिए आपकी बातें मान भी लिया जाये तो भी..  धर्म परिवर्तन बड़े बड़े लोग महज अपनी पत्नी के रहते दूसरी शादी के लिए कर लेते हैं।इतनी नीचता के बावजूद भी ऐसे लोग हिंदुओं के बीच सम्मान पाते हैं। दयापंथी उनके आगे दुम हिलाते हैं। धर्म परिवर्तन का हौवा सिर्फ दलितों,आदिवासियों, पिछड़ों के लिए खड़ा किया जाता है।क्योंकि दलितों आदिवासियों ने यदि धर्म परिवर्तन किया तो कथित सवर्णों के अस्तित्व पर खतरा नजर आने लगता है। विरोध धर्म परिवर्तन का नहीं ज...