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Showing posts from September, 2021

किंकर्तव्यविमूढ़ दयानंद की कालगणना..

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स्वामी दयानंद जी ने सृष्टि का आदि 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 52 हज़ार 9 सौ 76 वर्ष पुराना बताया है और मनुस्मृति को सृष्टि के आदि में होना माना है। ये दोनों ही बातें ग़लत हैं। हमारी आकाशगंगा की आयु वैज्ञानिकों के अनुसार 13.2 अरब वर्ष से ज़्यादा है और इससे भी ज़्यादा आयु वाली आकाशगंगाएं सृष्टि में मौजूद हैं। धरती की उम्र भी लगभग 4.54 अरब वर्ष है। वैज्ञानिकों धरती पर 1 अरब वर्ष पहले तक भी किसी मानव सभ्यता का चिन्ह नहीं मिला। देखिए वैज्ञानिक तथ्यों को प्रदर्षित करता एक चित्र, जिसमें वैज्ञानिकों ने दर्शाया गया है कि एक अरब छियानवे करोड़ वर्ष पहले धरती पर मनुष्य नहीं पाया जाता था।   स्वामी जी सृष्टि की उत्पत्ति का काल जानने में भी असफल रहे ‘चारों वेद सृष्टि के आदि में मिले।’ स्वामी जी ने बिना किसी प्रमाण के केवल यह कल्पना ही नहीं की बल्कि उन्होंने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्तिविषयः, पृष्ठ 16 पर यह भी निश्चित कर दिया कि वेदों और जगत की उत्पत्ति को एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष हो चुके हैं। स्वामी जी इस काल गणना को बिल्कुल ठीक बताते हुए कहते हैं- ‘…आर्यों ने एक ...

माँसाहार पर दयापंथियों के मासूम बहाने..

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#दयापंथियों_के_मासूम_बहाने●●●● "जो जो प्रमाण आपने प्रस्तुत किया है वह सब ठीक हैं ये सब हमारे ग्रंथों में मिलते हैं. लेकिन ये वामपंथियों,मुगलों ईसाईयों द्वारा बाद में इसमें घुसेड़ दिया गया😓😓यह प्रक्षिप्त है यह मिलावट है. यह गंदगी तुम जैसे विधर्मी लोग हमारे ग्रंथों में मिलावट कर दिये"😓😓😓 यह बहाने स्वीकार्य नहीं हैं. क्योंकि प्राचीन भारत में ही नहीं बल्कि अभी पिछली कुछ सदियों तक शिक्षा परंपरागत रुप में गुरुमुख से ही प्राप्त की जाती थी. श्रुतियों में ये शिक्षाएँ थीं.यह ब्राह्मणों के अधिकार क्षेत्र में थे,छापेखाने थे नहीं. ग्रंथ गुरुओं के आश्रमों या राजाओं के पुस्तकालयों में सुरक्षित रखे जाते थे. क्या दयापंथी यह कहना चाहते हैं कि ब्राह्मणों गुरुओं ने ही इसमें मिलावट की हैं!!? फिर वामपंथी,मुगलों और ईसाईयों को घढ़ियाली आँसुओं के साथ कोसना दयापंथियों का स्वांग है,ढोंग है?? दयापंथी बतायेंगे ऐसे सुरक्षित श्रुतियों, ग्रंथों की हर भीतरी प्रतियों में तथाकथित वाममार्गियों ईसाईयों मुगलों ने गोहत्या और माँसाहार विषयक श्लोक, मंत्र,दोहे,सोरठे और अध्याय कैसे घुसेड़ दिया?? दूसरे प्राचीन टीकाका...

परमेश्वर झूठ बोलता है. शैतान को बनाने वाला भी वही है.

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#आर्य समाजियों द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले सवाल.. 🤔यहोवा ने भले बुरे ज्ञान के फल को आदम से झूठ बोलकर दूर क्यों रखा? 🤔ईसाइयों का ईश्वर सर्वज्ञ है,तो धूर्त शैतान को क्यों बनाया? 🤔वह पूर्व जन्म नहीं मानता तो  बिना अपराध के शैतान को अपराधी क्यों ठहराया?         🤔शैतान को ईश्वर ने ही बनाया तो शैतानी कामों का भागीदार ईश्वर भी है.         समाजी बंधुओं बाईबल समझने के लिए संपूर्ण बाईबल का अध्ययन आवश्यक है. खंडित आयतों से नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता. जिस तरह पके आम का स्वाद जानने के लिए आम के बौराने, फलने और पकने का इंतजार करना होगा. आम के बौर खा लेने से पके आम के स्वाद का अनुमान लगा पाना मुश्किल है. दयानंद जी ने यही हड़बड़ी की है. उन्होंने आम की पत्तियां चबाकर पके आम का स्वाद अनुमान और कयास बताया है.          ईश्वर ने शैतान कभी नहीं बनाया ऐसे में यह कहना कि शैतान और उसके शैतानी कार्यों का भागीदार ईश्वर भी है. यह सर्वथा अनुचित है, गलत है. पूर्व जन्म मिथ्या है, कयास है अतः इस पर बातें करना ही समय जाया करना है.बाईबल के अनुसार ...

वेद अपौरुषेय कैसे है??

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     वेद अपौरुषेय ग्रंथ है.!!!? जिसे वेद समझा गया उसे अनुभव करनेवाले बोलने बतानेवाले चंद दो चार ऋषि ही थे.उन्हीं की वाणी के संकलनों को वेद समझा गया..!!! दरअसल जिसे वेद समझा गया है वह प्राचीन ऋषियों के निजी अनुभव हैं. यह ऋषियों के काब्यों, प्रवचनों, प्रार्थनाओं, याचनाओं, आयुर्ज्ञानादि का संकलन मात्र है.             जब शास्त्र लिखा जाता है तो सामाजिक व्यवस्था के नियम और तात्कालिक बातों को भी लिख दिया जाता है.महापुरुषों,ऋषियों के नाम पर जनता उसे भी ईश्वरीय ज्ञान मान लेती है यद्यपि धर्म से उसका दूर दूर तक संबंध नहीं.        आधुनिक युग में मंत्रियों के आगे पीछे घूमकर साधारण नेता भी पहुंच के नाम से अपना काम करा लेता है.जबकि मंत्री ऐसे नेताओं को जानते तक नहीं हैं.इसीप्रकार सामाजिक व्यवस्थाकार महापुरुषों की ओट में जीनेखाने की व्यवस्था भी ग्रंथों में लिपिबद्ध कर देते हैं.उनका सामाजिक उपयोग तत्सामयिक ही होता है.वेदों के संबंध में भी यही है.          वेद के दो भाग हैं:        #कर्मकांड और ...

तृतीय विश्वयुद्ध यहीं से शूरु होगी.

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@विनाश का पुत्र🔯:11 😈👹👹👹👹 पौलुस ने प्रथम शताब्दी में अपनी पत्री में जिस बात की भविष्यवाणी की थी वो आज वर्तमान समय में होते हुए दिख रहे हैं "अधर्म का भेद अब सर उठा रहा.."2थिस्स2:7 पढ़ें गुप्त योजनाकार पूरे विश्व में धर्म का नाश करके आधुनिकता, शिक्षा और अर्थव्यवस्था के द्वारा समाज और देश की कानून पर भारी आघात कर रहे हैं.          ख्रीस्त विरोधी(विनाश का पुत्र )के प्रकटन के वक्त संसार में धार्मिकता क्षीण हो जायेगी.(2थिस्स2:3) संसार के सब बड़े धार्मिक शिक्षाओं में मिलावट आ जायेगी,सभी धर्मों के झूठे शिक्षक उठ खड़े होंगे. ईसाई धर्म में झूठे वक्ता, झूठे शिक्षकों की बाढ़ सी आयेगी.ये झूठी भविष्यवाणियां करेंगे, बाईबल की आयतों, वचनों, कलामों को तोड़मरोड़कर पेश करेंगे.वचनों की जगह चंगाई, चमत्कार, भविष्यवाणी पर जोर देंगें तमाम भरमाने वाली मंडली, कलिसियायें आयेंगी2थिस्स अध्याय पढ़ें।        ईसाईयत के बाद इस्लाम सबसे बड़ा धर्म है इस धर्म में कट्टरता बढ़ेगी और जेहाद के नाम पर उग्रवादी उठ खड़े होंगे.खून खराबे की घटनाओं में इजाफा यूंह...

तुम ईसाई क्यों बने???

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आप ईसाई क्यों बने??येशु ने ऐसा कौन सा मार्ग बतलाया जो वैदिक धर्म में नहीं बतलाया गया है???         मेरे अजीज़ आर्य मित्र अक्सर यही सवाल करते हैं.           आर्य बंधुओं मेरे पूर्वज शूरु से ही प्रकृति पूजक रहे. हमने वेद,पुराण, रामायण, गीता आदि शास्त्र पढ़ा है. गीता को हम संपूर्ण वेदों का सार मानते हैं.वेद में जो भी कुछ दिखता है सब से यही प्रकट होता है कि मानव ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है या अपने आराध्य का वर्णन कर रहा है, कहीं यह नहीं दिखता कि ईश्वर मानव को संबोधित करके कुछ कह रहा है।     नासदीय सूक्त में भी यही है.वेदों में ईश्वर की खोज जारी है.ईश्वर कौन??इसकी खोज जारी है.    हम वेदों की कद्र जानते हैं.हम वेद विरोधी नहीं हैं. महर्षियों ने प्रकृति, मानव जीवन और ईश्वर के सम्बन्ध में चिन्तन करते हुए कुछ प्रार्थनाएँ व नीतियाँ लिखीं जिन्हें वेदों में संकलित किया गया है वेदों के प्रति हमारी श्रद्धा किसी आर्यसमाजी से ना पौराणिकों से कम है.          हमने बाईबल भी पढ़ा इसमें मानव और ईश्वर के बीच संबंध और म...

सत्यार्थप्रकाश का कच्चा चिट्ठा

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#सत्यार्थप्रश निंदा निंदनीय है, आलोचना आईना है निंदा दंभ लाती है और आलोचना निखार लाती है।     यूं तो "सत्यार्थ प्रकाश" को धर्मसमीक्षा किताब का नाम दिया गया है,लेकिन इसी की समीक्षा की जाये तो यह एक अलहड़ी भाषा प्रयोग की विरोध/निंदा कृति मात्र जान पड़ता है जहाँ ब्याधिन्ह दिमाग के विचारों को बलात् सत्य मनवाने का प्रपोजल है। समीक्षा के नाम पर यहाँ अर्थ का अनर्थ और विघटनकारी विष परोसी गई है, खुद के ब्यक्तिगत विचारों को अंतिम सत्य कहने के चक्कर में विचारक अपनी दंभी और कुत्सित मानसिकता को असंयमी भाषा में लिपीबद्ध नवाचार करने हेतु प्रयोग करता नजर आयेगा. इस पुस्तक को न समीक्षा मानी जा सकती है न आलोचना कहा जा सकता है.            आलोचना इस बात का अन्वेषण है कि सत्य क्या है, सत्य कैसा है?आलोचना बहुत कठोर हो सकती है क्योंकि कभी कभी असत्य को काटने के लिए कृपाण का उपयोग होता है असत्य की चट्टानों को तोड़ने के लिए सत्य के हथौड़े और छैनियां बनानी पड़ती है।                 लेकिन यहां तो छैनियां ही भोत्थर और हथौड़े ही कमजोर हैं। यहा...

आर्यों को विदेशी माना जाये..

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#तो_आर्यों_को_बाहरी_विदेशी_मान_लिया_जाये????●●● पहला हाथी हड़प्पाइयों का है। दूसरा हाथी मौर्यों का है। हड़प्पाइयों को, मौर्यों को हाथी की जानकारी थी। किंतु आर्यों को हाथी की जानकारी नहीं थी। मध्य एशिया के पूरे इलाके में हाथी नहीं थे। आर्य लोग जब भारत आए, तब वे हाथी से परिचित हुए। वे आश्चर्य में थे कि भारत में ये कैसा पशु है? इसको तो हाथ है। वे सूंड़ की तुलना हाथ से किए और हाथी का नाम मृग हस्तिन रख दिए। वे मृग ( पशु ) से परिचित थे। किंतु हाथी से नहीं थे। मृग हस्तिन का अर्थ हुआ - हाथ वाला पशु। मृग का प्राचीन अर्थ पशु है। बाद में इसका अर्थ हिरण हुआ। शाखामृग ( बंदर ), मृगराज ( सिंह ) जैसे शब्दों में मृग हिरण का नहीं, पशु का वाचक है। मृग हस्तिन ही हस्तिन, फिर संस्कृत में हस्ती ( हाथी ) हुआ। अशोक काल में हाथी को गज कहा जाता था। दूसरे चित्र में हाथी के नीचे ब्राह्मी में गजतमे लिखा हुआ है। यह अभिलेख अशोक का है। जैसा कि आप जानते हैं कि अरब के लोग इमली से परिचित नहीं थे। भारत आकर जब वे इमली से परिचित हुए, तब वे इमली का नाम अरबी में तमर - ए - हिंद रखा। तमर - ए - हिंद का मतलब हिंद ( भारत ) का खजूर...

जिसने खुद को नहीं बचा पाया वह दूसरों को क्या बचायेगा

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"#तुम_लोग_यीशु_को_भगवान_बोलते_हो_पर_अगर_वो_भगवान_होते_तो_अपने_आप_को_क्रूस_पर_चढ़ने_से_क्यों_नही_बचा_पाए ? वो तुम्हें क्या बचाएंगे जो अपने आप को नहीं बचा पाए।" (यह सवाल आज से २००० वर्ष पहले भी उठा था, फेसबुक पर नहीं, पर क्रूस पर कीलों से जकड़े,  लहूलुहान मरते प्रभु यीशु के सामने खड़े, जन समूह ने उठाया था - देखें आगे)  लोग और सरदार भी ठट्ठा कर करके कहते थे, कि इस ने औरों को बचाया, यदि यह परमेश्वर का मसीह है, और उसका चुना हुआ है, तो अपने आप को बचा ले।  सिपाही भी ठट्ठा करके कहते थे। यदि तू यहूदियों का राजा है, तो अपने आप को बचा।  जो कुकर्मी लटकाए गए थे, उन में से एक ने उस की निन्दा करके कहा; क्या तू मसीह नहीं तो फिर अपने आप को और हमें बचा।  - लूका २३:३५-३९ भाई हम भी, आपके समान प्रभु यीशु को मात्र एक आम 'इंसान' या एक 'गुरु' या उस समय के धार्मिक ठेकेदारों  की तरह 'धोखेबाज़, ही मान लेते।  यदि●●● प्रभु यीशु मरने के बाद जीवित नहीं होते,  और तब आप का कहना भी सच होता जो स्वयं कब्र में हैं वह किसी को कैसे बचाये वो कैसे परमेश्वर के प्रतिरुप कहलाते ? और सवाल ये भी ...

विनाश का पुत्र...

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☦विनाश का पुत्र☠ कड़ी:40 कयामत के दिनों की शुरुआत में दस चिन्ह प्रकट होंगे उन चिन्हों में से दूसरा यह है. जिसका जिक्र बाईबल में है. 2:"#धर्म का त्याग:-वर्तमान में संसार विनाश की ओर तेजी से बढ़ रहा है. सभी देश आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, राजनैतिक अस्थिरता और पड़ोसी देशों के बीच कड़वाहट और गुटबाजी बढ़ रही है. देश की नागरिकों में असंतोष और धर्म के प्रति अनास्था और उदासीनता बढ़ती जा रही है.            वर्तमान में स्कूली शिक्षा में नैतिक शिक्षा को उतनी तवज्जो नहीं दी जा रही है जितनी मिलनी चाहिए. आज का युवा इंटरनेट, फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप,वीडियो गेम और लेपटॉप मोबाइल में,गंदे साईट्स पर अपना अधिकतर समय खर्च रहा है. वर्चुअल दुनिया में खोया आज का युवा वास्तविक दुनिया से कटा कटा सा रहने लगा है. युवाओं को चाहिए था कि अपना समय जिस रचनात्मक कार्यों में लगाये लेकिन अफसोस इन गैजेटों का दुर्पयोग अपराध,फ्रोड, हैकिंग और सेक्स स्कैंडल के लिए हो रहा है.         वर्तमान समय में संयुक्त परिवारों का टूटना, बुजुर्गों और अभिभावकों के प्रति युवाओं का असम्मान, मादक प...

बाईबल में भी नियोग है??

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#दयापंथी बाईबल में भी नियोग खोदकर #नियोग को पुण्य कर्म साबित करने की कोशिश में हैं.बाइबिल में बड़ा लंबा कानून है  पति धर्म निभाना पड़ता है.          नियोग नियोगियों के लिए बड़ी सुविधाएं मुहैया कराती है कि उस में पति धर्म निभाना ही नहीं पड़ता ....         #नियोगी मौज लेते रहें जब गर्भ ठहरे निकल लें       ऐसा तो बाईबल में कतई नहीं है. जिनके महर्षि और स्वामी ने ऋषियों को देवर की भूमिका निभाने वाले बताते हैं वो भला ऐय्याशी मानसिकता कहाँ छुपा पायेंगे.           नियोग वह कार्य है जहाँ पुण्य का पुण्य, मज़े का मज़ा!!! न भोग्या स्त्री की कोई Responsibility न होने वाले बच्चे की.विध्वा जिसके पति की चिता अभी बुझी भी नहीं है और उसे नियोग के लिए उठाया जाता है हे विध्वे उठ!!रोना धोना बंद कर नियोग कर....!!! घोर आश्चर्य! आर्य (अ)सभ्यता सच मुच बड़ी सुविधा जनक है |  मगर #दयापंथियों को शर्म नहीं आती बेशर्मी से सेरोगेसी को नियोग का नया संस्करण बताते हैं. और यह तथ्य छुपाते हैं कि नियोग मे देशी घी का इस्तेमाल होता है....

वैदिक संस्कृति में सहोदर वैवाहिक संबंध होते थे

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वैदिक काल से पहले ही भाई अपनी बहन का पतिभाव से भरण पोषण करता था. किं_भ्रातासद्यद`नाथं भवति किमु स्वसा यन्निरृतीनिर्गछित्। काममूति बह्वे३तद्रपामि तन्वां मे तन्व सं पिंपृग्धि।। अथर्ववेद१८:१:१२        यहाँ भ्राता लक्ष्य है भातृ और भर्तृ ये दोनों शब्द भृ या भरना पालन करना मूल धातु से निकले हैं.इन दोनों शब्दों का अर्थ है पालन करनेवाला,रक्षण करनेवाला इसमें भ्रातृ रूप भर्तृ रुप से पुराना है.भाई का भ्रातृ नाम अति प्राचीन वैदिक काल से ही प्रचलित है.भाई पति भाव से बहन का भरण पोषण रक्षण करता था.          स्वसृ शब्द भी यही इतिहास बताता है.स्वान् सरति अनुगच्छति इति स्वसा. स्वयं के कुल में उत्पन्न भाईयों का जो अनुसरण करती है वह स्वसृ है.भाई से वह पतिभाव से रह सकती है.इस सहोदर वैवाहिक संबंध की वजह से वह सनाथ अर्थात सुरक्षित हुआ करती थी.यही मूल इतिहास है.     आज दयापंथी ऐतिहासिक तथ्यों को झुठलाकर सत्य से मुँह चुराते हैं.

क्या आप इस शख्स को पहचानते हैं??

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ये जो सज्जन बैठें है {ज्याँ द्रेज} रोड पर असाधारण सहजता के साथ और वहीं बैठ कर खाना खा रहे है , जब उनसे पूछा गया कि 'सर और रोटी चाहिए, तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि -'नही, सबको दो ही रोटी मिल रही है , तो मैं भी दो रोटी ही खाऊंगा। कौन हैं ये जानते हैं इनको ? आइए बताते हैं।              यूपीए शासनकाल के दौरान नेशनल एडवाइजरी कमिटी के मेंबर थे। मनरेगा की ड्रॉफ्टिंग इन्होंने की थी। आरटीआई लागू करवाने में इनका हाथ था। बेल्जियम में पैदा हुए, लंदन स्कूल ऑफ इकॉनिमिक्स में पढ़ाया और अब भारत में हैं। इलाहाबाद यूनीवर्सिटी के जीबी पंत सोशल साइंस में विजिटिंग प्रोफेसर रहे। इलाहाबाद में तो झूंसी से विश्वविद्यालय तक साईकिल से आते जाते थे। हिंदी में बात करते थे . नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के साथ डेवलपमेंट इकॉनिमी पर किताब लिख चुके हैं। दुनिया भर में सैकड़ों पेपर पब्लिश हो चुके हैं। पिछले दिनों रांची में इनकी बाइक पुलिस वाले थाने उठा लाए। भाजपाई इनको नक्सलियों का समर्थक कहते हैं। पहले बुराई/मज़ाक और फिर बाद में नरेंद्र मोदी जिस नरेगा की तारीफ...

समस्याओं से भागना कायरता है.

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*समस्याओं से भागना कायरता है|* ✝✝✝✝✝✝✝✝✝ प्रकाशितवाक्य 21:8 में लिखा है --"-डरपोंक आग़ की झील में डाले जायेंगे|"     विश्वासी कभी डरपोक नहीं हो सकता.डरता वही है जो गलतियां करता है. चोर उजाले से डरता है मगर अंधेरे में वह सीना तानकर चलता है.एक विश्वासी को डर कैसा?और अगर विश्वासी डरपोक है तो समझो खोट है.                      कलाम कहता है कि धर्मी जवान सिंहों के समान हैं| यहुन्ना अपनी पत्री में लिखता है, जो भयभीत रहता है वह प्रेम में सिद्ध नहीं हुआ है| किसी धर्मवैज्ञानिक का कथन है--या तो भय विश्वास को ख़त्म कर देगा; या विश्वास भय को| दोनों में से एक ही का वज़ूद संभव है| भजन 55:4 में लिखा है ---मेरा मन भीतर ही भीतर संकट में है; और मृत्यु का भय मुझमें समा गया है| पद छ: में लिखा है ---मैंने कहा भला होता कि मेरे कबूतर के से पंख होते; तो मैं उड़ जाता और विश्राम पाता| समस्याओं के दौरान आपके पास दो ही विकल्प होते हैं| पहला—पलायनवाद| समस्याओं से भागना| दूसरा—समस्यों का सामना करना| समस्या कितनी भी बड़ी हो.अगर राई के दाने के बराबर भी ईमान बच...

अजीबोगरीब मेले..

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#मेले●●● अजीबोगरीब मेले लगे हैं यहाँ. तरह तरह की दुकानें सजी हैं, बाजार में कड़वे सच के खरीददार कम हैं. नमकीन झूठ बेचने वाली दुकानों में रौनक है. नफरत बेचने की दुकानों के स्पोंसर्स तमाम बड़े लोग हैं. इस मेले में शिरकत करने वाली भीड़ किसी न किसी बीमारी से बीमार हैं. बीमारी है तो हकीम तमाम हैं. शहर में चिकित्सक की जरूरत तभी होती है जब लोग बीमार पड़ते हैं.             आज समाज बीमार है, लोगों की आस्थायें कुपोषित है, ईमान कमजोर हुआ जा रहा है, धर्म आखिरी सांस ले रही है, यहाँ इंसानियत, भाईचारा, सहिष्णुता बीमार और दुर्बल हो चुकी है.बीमारी न हो तो चिकित्सक का क्या औचित्य है....परंतु बीमारी जाये तो जाये कैसे? इस मर्ज की दवा क्या है?या लाईलाज है?       अब चिकित्सक ऊपर से बीमारी का ईलाज करता मालूम पड़ता है लेकिन भीतर से उसकी कामना हिलोरें मारती है कि बीमारी बनी रहे. लोग बीमार पड़ते रहें. चिकित्सक जीता है लोगों के बीमार पड़ने से. उसका धंधा बड़ा उल्टा और परस्पर विरोध लिये है.उसकी प्रार्थना तो ये होती है कि लोग बीमार पड़ते रहें. जब फ्लू, डेंगू,मलेरिया जैसी बीमारियों...

वैदिक धर्म में नारियों की हैसियत.

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#वैदिक_धर्मियों के बीच स्त्री की क्या हैसीयत थी यह छुपा नहीं है.       आर्य खुले आम सबके सामने मैथुन करते थे.इनके ऋषि कुछ धार्मिक अनुष्ठान करते जिन्हें वामदेव-विरत कहा जाता था.. यह यज्ञ भूमि पर ही की जाती थी. यदि कोई स्त्री पुरोहित के सामने करने की इच्छा प्रकट करती तो वह उसके वहीं सबके सामने रति क्रीड़ा करता था. #महर्षि ने इसीलिए भी पुजारियों को ब्याविचारी और पुजारिनों को परपुरुष गामी बताया है. उदाहरणार्थ पराशर ने सत्यवती और घिर्घत्मा के साथ यज्ञ स्थल पर ही संभोग किया. आर्यों में योनि अयोनि नामक प्रथा प्रचलित थी. तात्कालिक में योनि अर्थात #घर_अयोनि का अर्थ ऐसा गर्भ जो घर के बाहर ठहराया गया हो. अयोनि प्रथा तत्समय में गलत नहीं मानी जाती थी. सीता और द्रौपदी का जन्म अयोनि प्रथा से ही हुई थी.        आर्यों में औरत को भाड़े(किराये) पर दिया जाता था. #माधवी प्रसंग इसका स्पष्ट प्रमाण है. राजा ययाति ने अपनी बेटी माधवी को अपने गुरु गालव को भेंट दे दिया था. गालव ने माधवी को तीन राजाओं को भाड़े पर दिया. इसके पश्चात गालव ने माधवी का विवाह व...

बाईबल की भविष्यवाणियाँ और सच.

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बाईबल की भविष्वाणियों का असर संपूर्ण मानव जातियों पर होता आया है. चाहे वह किसी भी जाति, मजहब धर्म का मानने वाला ही क्यों न हो.धीरे धीरे ही सही दुनिया अब बाईबल की रहस्यमयी भविष्वाणियों पर आज रिसर्च कर रही है और तमाम कयास और अनुमान लगाये जा रहे हैं. बाईबल हरेक ज्ञान को परमेश्वर की ओर से और परमेश्वर का बताती है. चाहे वह सांसारिक ज्ञान हो या आध्यात्मिक. इंसान जैसे जैसे ज्ञान का संचय और चंद आविष्कार करता गया.ज्ञान और विज्ञान में तरक्की की ईश्वर को चुनौतियां करने लगा.उसके अस्तित्व पर सवाल करने लगा.     लोग वैज्ञानिक भविष्वाणियों, पुस्तकों और फिल्मों से उत्तेजित हो रहे हैं जिसमें संसार के पूर्ण विनाश की बातें प्रसारित की गई हैं. इसमें दुनिया के खत्म होने की तिथियां और दिनों की घोषणाएँ होती हैं. परंतु वे तिथियां आईं और चली गईं लोगों ने देखा कि दुनिया जैसी थी वैसे ही बनी हुई है. बातें अफवाह निकलीं. यही झूठी भविष्यवाणियाँ बाईबल की चेतावनियों को अनदेखी और ठट्ठे के लिए अवसर दे गई हैं.       ईश्वर का ज्ञान और सनातन ऊर्जा सृष्टि की शुरुआत से ही धरती पर बिखरी हुई थी. इंसान इसे...

परमेश्वर को आपकी चिंता है..

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#खुदा_को_आपकी_फ़िकर_है◆◆●  दुनिया के पहले मोबाइल का बुनियादी काम सिर्फ कॉल करवाना था.... इस में कोई दूसरा आप्शन न था.... फिर एस एम एस एड हुआ....एम एम एस फिर इंटरनेट.... फिर दुनिया की हर चीज़ को मोबाइल में शिफ्ट कर दिया गया.... आज मोबाइल से दुनिया का शायद ही कोई ऐसा काम हो जो न लिया जा रहा हो..... मगर यह मोबाइल आज भी अपना बुनियादी काम नहीं भूला.... आप कोई गेम खेल रहे हों, या फिल्म देख रहे हों, इंटरनेट सर्फिंग कर रहे हों, या विडियो बना रहे हों या फिर एक वक़्त में दस काम भी क्यों ना कर रहे हों..... तो जैसे ही कोई कॉल आए मोबाइल फौरन से पहले सबकुछ छोड़ कर आपको बताता है कि कॉल आ रही है यह सुन लें, वह अपने सारे काम रोक लेता है....               और एक इंसान जिसे परमेश्वर ने अपनी संगति के लिए बनाया और सारी कायनात को उसकी खिदमत के लिए सजा दिया, वह खुदा की कॉल पर दिन भर में कितनी बार अपने काम रोककर ईश्वर की सुनता है??        वह खुदा की ओर पीठ किये है. काश इंसान मोबाइल से इतना सा ही सबक़ सीख ले ले.जिसे हमने खुद इजाद किया और एक लम्हा भी खुद ...

कलयुगी एकलब्य अंगूठा नहीं ठेंगा देगा.

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#अलोक_पदड़ी_तुम_वेद_क्यों_पढ़ते_हो? #तुममें_वेद_पढ़ने_समझने_की_योग्यता_नहीं_है. Bhimsinghbhimsingh Arya जी इतने दिनों तक आपके पूर्वज वेदों पर कुण्डली मारकर बैठे रहे. अब यह सर्वसुलभ आम जनमानस के पहुँच पर है. अब हम वेद पढ़ने समझने लगे हैं तो आपको परेशानी होने लगी है.         वेद समझना जानना इतना जटिल है!?? वेद को ईश्वर की वाणी कहा जाता है. ऐसे में वेद को सर्वसुलभ, और सरल होना चाहिए.यदि ऐसा है तो वेद अनपढ़ों को भी समझ में आ जानी चाहिए.         क्या ईश वाणी केवल योग्यता धारियों के लिए ही है?? वेद ज्ञान सबके लिए समान है चाहे पुरुष हो या नारी, ब्राह्मण हो या शूद्र सबको वेद ज्ञान पढ़ने और यज्ञ करने का अधिकार है. देखें – यजुर्वेद २६.१(26.1), ऋग्वेद १०.५३.४(20.53.4), निरुक्त ३.८(3.8) इत्यादि.                           दरअसल सच्चाई ये है कि जिसे आप वेद समझने की भूल करते हो वह ऋषियों के अनुभवों का काव्यात्मक संग्रह मात्र हैं.इसमें झोल भी है. जिसे छुपाने के लिए ही आपके पूर्वज #धर्मसूत्र रचते थे यदि को...

मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना◆◆◆

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#मुण्डे_मुण्डे_मतिर्भिन्ना●●● एक ही वेद मंत्र और भावार्थ और भाष्य अनेक हो सकते हैं भावर्थ और भाष्य कैसा हो यह भाष्य भावर्थ करनेवाले की मानसिकता पर निर्भर करता हैं क्योंकि वेद गेय है कविता है. इसीलिए जितने भाष्यकार उतने भाष्य हैं. अपनी जगह सभी भाष्यकार ठीक हैं. ऊवट,महिधर, सायणाचार्य, मैक्समूलर अपनी जगह ठीक हैं. दयानन्द अपनी जगह ठीक हो सकते हैं.         दयानन्द ने तो नकल भर मारा है. हम सायणाचार्य के भाष्य को ही प्रमाणिक मानते हैं. सायणाचार्य ही एकमात्र ऐसे भाष्यकार थे जिन्होंने संपूर्ण वेद का वेदमंत्रों के अर्थ तीन प्रकार से किये जाते हैं-#आधिभौतिक, #आधिदैविक और #आध्यात्मिक. वेदों का भाष्य अति प्राचीन काल से होता आया है. सायणाचार्य के अतिरिक्त किसी भाष्यकार ने चारों वेदों का पूर्ण भाष्य नहीं कर पाया. प्राचीन वेद भाष्यकारों में स्कन्द स्वामी, उद्गीथ, बररूचि,वेंकटमाधव,आत्मानंद, भरतस्वामी आदि का नाम उल्लेखनीय है.  सायणाचार्य के वेद भाष्यों में व्याकरण का भी ध्यान रखा गया है. सायणाचार्य भाष्य के आधार पर ही कुछ भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने वेद भाष्यों ...

अंग्रेजों के आने से पहले यहाँ अद्भुत वैमानिक तकनीकी, इंटरनेट मिसाइल आदि थे!!?

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👉बहुत समय पहले की बात है। देश आजाद नही हुआ था। न कोई संविधान बना था। और न ही कोई आरक्षण था। तब हमारे पुष्पक विमान उड़ते थे। हमारे पास मिसाइलों की भरमार थी। इंटरनेट था। बच्चे कभी हवा से, पानी से, तो कभी मछली से बच्चे पैदा कर लिए जाते थे। उस समय हमारी महिमा इतनी थी कि , हमने तो खीर से भी बच्चे पैदा किये थे। 👉एक ऐसा रामराज्य था, जहाँ डाल- डाल पे सोने की चिड़िया रहा करती थी। रामराज्य में औरते खुश थी। साधु - ऋषि सबको ज्ञान ही ज्ञान था , चारो तरफ ज्ञान की नदियां बह रही थी। गणेश जी चूहे पे बैठ के उड़ जाया करते थे। मनु का विधान चलता था। जिसमे औरते और शूद्र सब खुश थे। चारो तरफ खुशहाली ही खुशहाली थी। 👉फिर देश आजाद हो गया और अब मनु का विधान बंद हो गया। संविधान लागू हो गया। अब शूद्रों को आरक्षण मिल गया। बस यहां से देश बर्बाद होना शुरू हो गया। संविधान/आरक्षण की वजह से  पुष्पक विमान के पहिये पंचर हो गये, अब वो उड़ नही पा रहा है।  संविधान/आरक्षण की वजह से मिसाइलों में जंग लग गई है। संविधान/आरक्षण की वजह से अब बच्चे हवा और पानी से पैदा नही हो रहे हैं। संविधान/आरक्षण की वजह से मछली को अपने पेट ...

ईसाई मिशनरी गरीब आदिवासी बस्तियों में ही क्यों जाते हैं??

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#ईसाईकसाई_गरीब_दलित_बस्तियों_में_ही_क्यों_जाते_हैं?                   चंगाई कोइ नया चीज नहीं है।देहातों में यह झाड़फूंक के रूप में हजारों वर्षों से प्रचलित है। यह साइकिक ट्रिटमेंट है।और इसके लाभ भी होते हैं।इसलिए आदिवासी,दलित, पिछड़े समाज में पैठ बनाने के लिए मिशनरी को उन्हीं की तरह होना पड़ता है। कोइ बहुत बड़ा विद्वान शिक्षक भी अगर बच्चे को पढ़ाते हैं तो उन्हें बच्चों के स्तर पर आना होता है।      बच्चा शिक्षित होकर शिक्षित होकर स्वविवेक का इस्तेमाल कर सकता है।ईसाईयत के गुण गा सकता या नास्तिक बन सकता है या फिर सनातन संस्कृति अपना सकता है वह स्वतंत्र है।                     ईसाईयत का काम है दमित,शोषित, पिछड़े असहाय, निसहाय, रोगी निर्बल और जरुरतमंदों अनाथों को सबल बनाये और ईसाईयत बखूबी अपना धर्म निभा रहा है.         जितने साधू संत पुजारी पंडित मठ आश्रम हैं, बड़े धार्मिक संगठन हैं.वेदों की ओर लौटने का आह्वान करनेवाले हैं वे अगर गरीब गंदी बस्तियों में जाकर कपड़े राशन बाँ...

दयानंद की कमअक्ली.. मूर्ति पूजकों को दयानंद व्याविचारी क्यों बताते हैं??

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मूर्ति पूजा प्रतीक मात्र है इसके त्राटक ध्यान से मन को एकाग्र किया जाता है जैसे किसी बच्चे को आम के बारे में कुछ बताना या समझाना हो तो उसे आम या उसका चित्र दिखाना पड़ता है ठीक उसी तरह मूर्ति पूजा अध्यात्म विग्यान का प्रथम चरण है यह पहली कक्षा है.अध्यात्म के अगले चरण अर्थात उच्च कक्षा में प्रवेश करने पर मूर्ति की आवश्यकता नहीं रह जाती ध्यान में मूर्ति अर्थात ईष्ट अर्थात लक्ष्य, उसके आदर्शों या सद्गुणों के समुच्चय पर मन केन्द्रित होने लगता है.               कथित महा ऋषि पहली जमात के विद्यार्थियों को महाविद्यालय के लेक्चर करने निकलते थे. वहाँ भी वो तोड़मरोड़ पढ़ाते!!! और विद्यार्थियों को मूर्ख,जाहिल,अनपढ बताते फिरते थे.स्वामी जी चूहे लड्डू के चलते गणेशजी या शिवजी की भक्ति छोड़ दिये.क्योंकि उनका तर्क था कि जो शिव गणेशजी अपनी लड्डू की रक्षा नहीं कर सके वे हमारी रक्षा कैसे करेंगे??? तर्क तो बुद्धिसंगत है... लेकिन ये जो हवन यज्ञ में मंत्र पढे़ उसपर उन्होंने तर्क किया??? अब ये देवताओं से हवन के समय प्रार्थना मंत्र जपते हैं कि हे फलाँ देव आओ सोमरस पीओ.और हमारे लिए प...

तुम ईसाई क्यों बने??

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#आलोक_कनखजूरे_तुमने_ईसाईयत_क्यों_स्वीकारा? 👉सच सच बताओ तुम्हारे साथ कौन से चमत्कार हुए थे? 👉तुम्हें कितने पैसे मिले?ईसाई बनाने के कितने पैसे मिलते हैं? 👉दो बोरी चावल और पैसे में तुमने धर्म बदल दिया!!थू है तुम पर....सच्चाई बताओ???            हम कैथोलिक ईसाई परिवार में ही जन्मे और बड़े हुए. ताऊ पादरी भी हैं.लेकिन कभी हमारा लगाव ईसाईयत से नहीं रहा.मैंने कभी बाईबल ढंग से नहीं पढ़ी.विशेष त्यौहारों में ही घरवालों के कहने पर ही बेमन से चर्च जाता था.              संगीत प्रेमी होने के कारण गाँव और दूर से भी रामायण मण्डली के लोग मुझे आमंत्रित करते थे.हम ढोलक और तबले पर संगति करते करते रामचरित मानस के टीके भी कहने लगे.            वहाँ मुझे बड़ा सम्मान मिलता था और लोग तारीफ भी करते कि देखो इसके ताऊ पादरी हैं और ये रामायण के टीके कहता है, ढोल तो अच्छा बजाता ही है. इतनी तारीफ सुनकर मुझे अच्छा लगता..       हर टीके के बाद चिलम घुमाया जाता,बीच बीच में मुनक्के की चाय बंट जाती.     ...

धर्म क्या है??

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#सच्चा_धर्म◆◆◆ धर्म मनुष्य का मूलभूत स्वभाव है. लेकिन आमतौर पर लोग धर्म के अर्थ को लेकर दिग्भ्रमित होते हैं. दरअसल वे धर्म को एक खास चश्मे से, अपनी विशिष्ट धारणा के वशीभूत होकर देखते हैं....          लेकिन धर्म का अर्थ कोई विशिष्ट परंपरा या संप्रदाय नहीं है और ना यह धारण करने वाली कोई वस्तु है कि धारण कर लिया या उतार दिया या फिर बदल दिया.       इसका संबंध किसी विशिष्ट पूजा पद्धति या प्रणाली अथवा किसी विशिष्ट दर्शनशास्त्र से भी नहीं है.         धर्म का सीधा अर्थ है जो जैसा है उसको वैसा ही खोजना, उसको जानना उसे व्यवहार करना है. इसे हम धर्म यात्रा कहते हैं. धर्म एक सीढ़ी है जिसपर निरंतर चढ़ते हुए व्यक्ति ऊँचा उठते जाता है,आत्मोन्नति करता जाता है.        धर्म आस्था नहीं है क्योंकि आस्था कभी भी अनास्था में बदल सकती है. धर्म कभी बदलता नहीं है ना ही इसे कोई बदल सकता है. यह परिवर्तनीय नहीं है.          धर्म विश्वास भी नहीं है क्योंकि यह भी बदल सकता है. सत्य सदैव समरस एकरस होता है जो बदलता नहीं...

ईसा मसीह के बारह से तीस साल कहाँ बीते? क्या ईसा मसीह ने कश्मीर आकर बौद्ध मठों में दीक्षाएं ली थी??

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#ईसा_12_से_तीस_बरस_तक_कहाँ_रहे? #ईसा_इस_दौरान_कश्मीर_में_आकर_वेदाध्ययन_किया●●●●●●●      यह सवाल अक्सर पूछा जाता है.    बाइबल में इंसानों के लिए परमेश्वर, उसके राज्य, उसके साथ हमारे संबंध, उसके कार्य, गुण, कार्यविधि, नियम, आज्ञाओं इत्यादि के विषय में बहुत कुछ दिया गया है, किन्तु परमेश्वर और उसके बारे में सब कुछ नहीं दिया गया है; क्योंकि बाईबल में इंसानों के लिए वही सब लिखा गया है जो हम जानें और मानें और जिससे हम उसकी निकटता में आएँ, उद्धार पाएँ और उसके परिवार का भाग बन जाएँ।आदम से ईसा तक तात्कालिक और असार्वकालिक आदेश और विधान थे.ईसा को वह अधिकार मिला कि ईसा लोगों के लिए सार्वभौमिक, सार्वकालिक ईश्वरीय विधान परिमार्जित करे.इसे नया विधान कहा जाता है. यद्यपि बाइबल में ईसा के लड़कपन से लेकर उनके सेवकाई आरंभ करने (12 से 30) की आयु तक का विवरण नहीं दिया गया है, किन्तु बाइबल इसके विषय में बिलकुल खामोश भी नहीं है। यह परमेश्वर और ईसा के विरोधियों द्वारा फैलाया गया भ्रम है कि बाइबल उनके 12 से 30 वर्ष की आयु के बारे में कुछ नहीं बताती है; और अपने द्वारा फैलाए गए इस भ्रम के आध...

वेदों में वैमानिकी तकनीक है सच या झूठ??

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#वेद_बनाम_विज्ञान◆◆◆ कुछ लोग कहते हैं कि प्राचीन भारत में विमान बनाने की उन्नत प्रौद्योगिकी उपलब्ध थी। चूँकि रामायण में पुष्पक विमान का बड़ा मनोहर चित्रण है, इसलिएहमारे पूर्वजों के पास वास्तव में विमान प्रौद्योगिकी उपलब्ध थी, ऐसा दावा किया जाता है। परंतु हमें इसे सिद्ध करने के लिए सम्पूर्ण तकनीकी साहित्य की आवश्यकता है, रामायण जैसे काव्यात्मक विवरण की नहीं। दरअसल, विमान एक जटिल उत्पाद है, इसके निर्माण में अत्यधिक उन्नत प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होती है। अगर हमें यह सिद्ध करना है कि प्राचीन भारत में विमान प्रौद्योगिकी उपलब्ध थी, तो विमान के चित्र, बैठे हुए यात्रियों के तस्वीर दिखाना भ्रामक हो सकता है जबकि सिद्ध करने के लिए यह ढूढ़ना पड़ेगा कि क्या उस समय वायुगतिकी का सिद्धांत, विमान बनाने का डिजाईन, विमान की बॉडी बनाने हेतु सम्मिश्र का निर्माण आदि का ज्ञान उपलब्ध था। इन सभी तकनीकी विवरणों के अभाव में यह दावा करना कि रामायण काल के लोगों को विमान प्रौद्योगिकी का ज्ञान था सर्वथा असंगत है।                    प्राचीन भारत में विमान प्रौद्योगिकी के...

सोमरस नशीला पेय है.

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वनस्पति शास्त्र और आयुर्वेद में एक लता का वर्णन है जिसे सोमवल्ली कहते हैं। इसे महासोम, अंसुमान, रजत्प्रभा, कनियान, कनकप्रभा, प्रतापवान, स्वयंप्रभ, स्वेतान, चन्द्रमा, गायत्र, पवत, जागत, साकर आदि नामो से भी जानते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम Sarcostemma Acidum  है, और यह Apocynaceae परिवार का सदस्य है.इसे कूट पीसकर रोयेंदार चमड़े से छाना जाता है. सोमरस बनाने की विधि वेदों में भी इसमें दूध और दही मिलाकर शीतल बनाया जाता था.  दही में लैक्टिक एसिड होता है.   सोमरस में कड़वी, सफेद क्रिस्टलाभ एल्केलाइड क्षराभ तत्व होता है जो मनोस्फूर्तिदायक,उत्तेजक तत्व होता है. जिसका प्रभाव अस्थाई रूप से आलस्य दूर करने और सतर्कता बहाल करने में होता है. इसमें हल्की खुमारी के साथ पौरूष शक्ति वर्धक तत्व भी होता है. (ऋग्वेद-1/5/5) ...हे वायुदेव! यह निचोड़ा हुआ सोमरस तीखा होने के कारण दुग्ध में मिश्रित करके तैयार किया गया है। आइए और इसका पान कीजिए।। (ऋग्वेद-1/23/1)  जिस स्वर्ग को दयापंथी काल्पनिक बताते हैं.उसी स्वर्ग से सोम उतरी है..अग्नि की भांति सोम भी स्वर्ग से पृथ्वी पर आया। 'मातरिश्वा ने तुम में स...

स्वामी का अनर्थ नियोग.

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#दयापंथियों_के_स्वामी_का_अनर्थ■■■ उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि। हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ॥ ~ऋ० {मं० १०, सू० १८, मं० ८} “हे (नारि) विध्वे तू (एतं गतासुम) इस मरे हुए पति की आशा छोड़ के (शेषे) बाकी पुरुषों में से (अभि जीवलोकम) जीते हुए दूसरे पति को (उपैहि) प्राप्त हो और (उदीष्र्व) इस बात का विचार और निश्चय रख कि जो (हस्तग्राभस्यदिधिषो:) तुम विध्वा के पुनः पाणिग्रहण करने वाले नियुक्त पति के सम्बन्ध् के लिये नियोग होगा तो (इदम्) यह (जनित्वम्) जना हुआ बालक उसी नियुक्त (पत्युः) पति का होगा और जो तू अपने लिये नियोग करेगी तो यह सन्तान (तव) तेरा होगा। ऐसे निश्चययुक्त (अभि सम् बभूथ) हो और नियुक्त पुरुष भी इसी नियम का पालन करे”#महर्षि_भाष्य यहाँ #नियोग कहाँ है कि महर्षि ने नियोग बता दिया?? ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ हे (नारि)= स्त्री, तेरे पति मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं इसलिए, (उदीर्ष्व)= उठ और इस, (जीवलोकम् अभि)= जीवित संसार अपने पुत्रादि और घर-परिवार का तू ध्यान कर, इस प्रकार (गतासुम)= गत प्राण, (एतम्)= इस पति के, (उपशेष)= समीप बैठ शौक करने का क्या लाभ? (एहि)= उठ और ...

राधाकृष्ण चोर थे??

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राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 में तेलुगू भाषी  परिवार में हुआ, उनके पूर्वज आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले के सर्वपल्ली गांव में रहते थे। सर्वपल्ली राधाकृष्णन को दर्शन के क्षेत्र में प्रसिद्धि 1923 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘भारतीय दर्शन’ से मिली। इसी पुस्तक पर शोध-छात्र जदुनाथ सिन्हा ने उनके ऊपर साहित्यिक चोरी का आरोप लगाया। मामला यह था कि जदुनाथ सिन्हा ने पीएचडी डिग्री के लिए ‘भारतीय दर्शन’ नामक अपने शोध को 1921 में तीन परीक्षकों क्रमशः डाॅ. राधाकृष्णन, डॉ. ब्रजेंद्रनाथ सील व डाॅ. बी. एन. सील के समक्ष प्रस्तुत किया। वे अपनी पीएचडी डिग्री की प्रतीक्षा करने लगे।  जदुनाथ सिन्हा की डिग्री देने में लगभग दो साल का समय लगाया डॉ. राधाकृष्णन ने लंदन से इस पीएचडी को पुस्तक के रूप में अपने नाम से प्रकाशित करा लिया और पुस्तक छपने के बाद जदुनाथ सिन्हा को पीएचडी की डिग्री भी उपलब्ध करा दी जिससे साहित्यिक चोरी का इल्जाम साबित न हो सके। जैसे ही किताब बाजार में आई जदुनाथ तो स्तब्ध रह गए वो पुस्तक उनके पीएचडी की हूबहू कॉपी थी उनसे ये बर्दास्त न हुआ और उन्होंने बीस हजार रुपये का दावा कर केस ठोक...

शिक्षक दिवस अमर रहे...

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👨🏽‍🏫गुरू और शिक्षक।।👨🏽‍🏫     मुझे व्यक्तिगत तौर पर बड़ा अफसोस होता है कि आज दुनियाभर में गुरूओं का अकाल है और शिक्षक अपना व्यवसाय निभा रहा है. शिक्षक और गुरू में बड़ा भेद है. अंतर है.शिक्षक शिक्षा के बदले में दक्षिणा,अर्थ की चाह करता है और गुरु अपनी शिक्षाओं को शिष्य तक नि:स्वार्थ पहुंचा कर उसे उसके व्यवहार में देखकर धन्य महसूस करता है.शिक्षक से छात्र ज्ञानी बनकर निकलता है जबकि गुरु से शिष्य रूपांतरित हो जाता है।      आज गुरु का टोटा है और गुरूघंटाल बाजारों में ब्यवसाय कर रहा है. भारतवर्ष में भी चौथी पांचवीं, छठी सदी तक बड़े गुरु हुए. तब भारत विश्व गुरू कहलाता था. आध्यात्म हब या केंद्र हुआ करता था. आर्यभट्ट, चाणक्य, कबीर आदि सच्चे अर्थों में यहां गुरु हुए. एक समय था जब शिष्य गुरू को दक्षिणे में अंगूठे तक कुर्बान करते थे. आज छात्र शिक्षक को अंगूठा दिखाते हैं.      पूरे विश्व में एक यूनीक गुरू,रब्बी भी हुए जिनकी तालीमें सर्वकालिक, सर्वभौमिक,आध्यात्मिक तौर से आज भी प्रासंगिक हैं. "कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे उसे दूसरा भी फेर दो,बुराईयों से त...

वेदों में परस्पर विरोधी बातें..

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#वेदों_में_परस्पर_विरोधी_बातें◆◆◆◆◆◆◆ न तस्य प्रतिमा ऽ अस्ति यस्य नाम महद् यशः। हिरण्यगर्भ ऽ इत्य् एषः। मा मा हिमसीद् इत्य् एषा। यस्मान् न जात ऽ इत्य् एष॥ ~यजुर्वेद {३२/३} कासीत् प्रमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं किमासीत्परिधिः क आसीत्। छन्दः किमासीत्प्रौगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वे॥ ~ऋग्वेद {१०/१३०/३} सबकी यथार्थ ज्ञानबुद्धि कौन है और प्रतिमा मूर्ति कौन है, और जगत का कारण कौन है, और घृत के समान सार जानने योग्य कौन है और सब दुःखों का निवृत्ति कारक और आनंद युक्त प्रिति का पात्र परिधि कौन है और इस जगत् का पृष्ठावरण कौन है और स्वतंत्र वस्तु और स्तुति करने योग्य कौन है, यहाँ तक तो इसमें प्रश्न है अन्त में सबका उत्तर इसमें है कि जिस परमेश्वर मूर्ति को इंद्रादि ने पूजा, पूजते है और पूजेंगे वह परमात्मा प्रतिमा रूप से जगत् में स्थित है और वो ही सारभूत घृतवत् स्तुति करने योग्य है ये प्रश्नोत्तर क्रम है इसे वाकोवाक्य भी कहा जाता है, समझने वालों को तो इतने से ही समझ लेना चाहिये, और न मानने वाले को तो साक्षात् परमात्मा भी नहीं समझा सकता प्रमाण रावण कंस शिशुपालादि को कहाँ समझा पाये। औरों की तो ...

विनाश के पुत्र के आगमन की तैयारियां-2

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👹👿👿👿👿👹 विनाश के पुत्र के आगमन की वैश्विक तैयारियां... कड़ी:36      Wcc एक छद्मवेशी संस्था है. जो मसीहियत की आड़ में मसीह विरोधी कामों कामों को अंजाम दे रही है.यह संस्था विश्व के सभी प्रमुख धर्मों के मतों का संकलन कर सर्व धर्म सभा का आयोजन कर सभी धर्मों के प्रतिनिधि और धर्म गुरूओं को अपनी वार्षिक सभा में प्रतिनिधित्व करने के लिए आमंत्रित करती है. और अपने एजेंडे के मुताबिक एक वैश्विक धर्म मंच तैयार कर रही है. जहाँ सभी प्रमुख धर्मों के मान्य शिक्षाओं और ज्ञानों को प्रोत्साहित करने के आडंबरों के साथ प्रत्येक वर्ष भिन्न भिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों को Wccका अध्यक्ष बनाती है. हमारे देश भारत से भी हिंदू धर्म के प्रतिनिधि इस संस्था की सभा में आमंत्रित होते हैं. स्वामी विवेकानंद जी भी इस सभा में शिरकत कर चुके हैं. वर्तमान में विश्व हिंदू परिषद के सदस्य भी इस संस्था के लिए अपना योगदान दे रहे हैं.      यूरोपीय संघ और यही एक परोक्ष संस्था है जो संपूर्ण विश्व में एक वैश्विक अर्थव्यवस्था, बाजार, एक वैश्विक मुद्रा और एक विशिष्ट धर्म के एजेंडे पर काम कर रही है. इसके अल...

कौन हैं जो लालच देकर धर्मांतरण कराते हैं??

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https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=673345523022641&id=100010415979362   मसीहियत का जीवन इतना सरल भी नहीं जितनी दुनिया समझती है.क्योंकि लिखा है "तुम सभाओं में पेश होगे,प्रताड़ित होगे, अनादर होगे"लोग आसानी से कह जाते हैं लालच में आकर लोग मसीहियत कबूल रहे हैं. सच तो ये है कि ये उसी प्रताड़ना, अपमान और दमनात्मक कार्रवाहियों के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं.जैसा ईसा ने सहा है कष्ट और अनादर निश्चय ही उन सब के जीवन में आयेंगे जो मेमने के पीछे पीछे चलने का प्रयत्न करते हैं। हरेक के लिये इस कष्ट का बाहरी रूप अलग अलग हो सकता है और इसकी गहराई कम या ज्यादा। परमेश्वर को पता है कि वह क्या कर रहे हैं और हमारी आवश्यकता के अनुरूप ही इसे होने देंगे। इस लिये हमारे कष्टों के कारण हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है और न ही हमें दूसरों से अपनी तुलना करनी चाहिये जिनका जीवन हमसे अच्छा दिखता हो। बल्कि हमें उन्हें वैसे ही स्वागत करना चाहिए जैसे हम कैन्सर से छुटकारा दिलाने वाले सर्जन की छुरी का करते हैं। ये स्वर्ग में रहने वाले पिता के द्वारा भेजे गये हैं जो अपने बच्चों का भला चाह...